Monday, June 29, 2020

चीन समर्थक जयचंदों की गर्दन मरोडो

राष्ट्र-चिंतन
देशद्रोहियों की उगती जहरीली फसल/ बाहरी दुश्मनों से नहीं बल्कि आतंरिक दुश्मनों, जयचंदों और देशद्रोहियों से ही देश तबाह होता है/ विदेशी धन लेने के कानून कडे कर देने चाहिए/दुश्मन देश से धन लेना अपराध माना जाना चाहिए/ आतंरिक जयचंदों के संहार का यह सही समय है।

          चीन समर्थक जयचंदों की गर्दन मरोडो

         विष्णुगुप्त


हर देश में देशद्रोहियों की उगती फसल पर कानून का डंडा चलता है, देशभक्ति के लिए खतरनाक माना जाता है, पर भारत ऐसा अकेला देश है जहां पर देशद्रोहियों और जयचंदों पर कानून खामोश ही रहता है, राजनीति उदासीनता का चादर ओढी रहती है, इतना ही नहीं बल्कि देशद्रोहियों और जयचंदों की फौज सरेआम-खुलेआम देश हित को लहूलुहान करने से बाज  नहीं आते है। देशद्रोहियों की जहरीली फसल किस प्रकार से हमारे देश में उगती है, देशहित को नुकसान करती है, देशहित को अपमानित कराती है, देश को एक खूंखार व संहारक के तौर पर स्थापित करती है, देश की सुरक्षा को खतरे में डालती है,दुश्मन देश के हित को साधती है, दुश्मन देश की उंगलियों पर नाचती है, फिर भी ऐसी जमात शान से रहती है, देश का कानून उस पर हाथ तक नहीं डाल पाता है, राजनीति सिर्फ अपनी गोटियां सेकती रहती है और अततः आरोपों-प्रत्यारोपों में यह प्रसंग दब कर रह जाता है।      
                               जयचंदों और देशद्रोहियों की राष्टविरोधी करतूतें बहुत ज्यादा है, इनकी फेहरिस्त भी बहुत लंबी है, दुश्मन देश को लाभार्थी बनाने के भी अनेकानेक उदाहरण है। कुछ उदाहरण बहुत ही चिंताजनक है और राष्टकी संप्रभुत्ता को चोट पहुंचाने वाले हैं। उदाहरणों को जानकर आप भी आश्चर्य में पड़ जायेंगे और यह सोचने के लिए विवश होंगे कि ये पार्टियां, क्या ये राजनीतिज्ञ, क्या ये हस्तियां देशहित को बलि चढा कर खुश क्यों होती है, क्या इन्हें देशहित को बलि देने के लिए पाला-पोशा गया, लोकतत्र में बढ़ने का अवसर दिया गया है? खासकर हस्तियां की बात छोड़ भी दे, क्योंकि हस्तियां तो बिकती ही रहती हैं, पर जब राजनीतिक पार्टियां जो देश की सुरक्षा और देश के विकास की बुनियाद पर खड़ी होती है और ऐसी राजनीतिक पार्टियों को जनता इसलिए लोकतांत्रिक पद्धति में शक्ति प्रदान करती है ताकि वदेश की सुरक्षा सुनिश्चित हो और देश दुनिया में चमकते रहे तथा खासकर दुश्मन देशों को सबके सिखाते रहें। पर जनता की यह आशा राजनीतिक पार्टियां लगातार और सरेआम तोड़ती रहती हैं।
                              उदाहरण शरद यादव के घर का है। नेपाल के तत्कालीन प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टाराई भारत दौरे पर आये थे। बाबूलाल भट्टाराई नेपाल की माओवादी सरकार का नेतृत्व कर रहे थे और वे खुद माओवादी रहे हैं, पुष्पकमल दहल प्रचड के बाद दूसरे नंबर के नेता रहे हैं। बाबूराम भट्टाराई के भारत दौरे पर शरद यादव ने अपने दिल्ली स्थित आवास पर एक स्वागत समारोह का आयोजन किया था। उस स्वागत समारोह में तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार के कई मंत्री, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मोतीलाल बोरा, जर्नादन द्विवेदी, मोहन प्रकाश, तत्कालीन विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज और मुरली मनोहर जोशी सहित कम्युनिस्ट नेता प्रकाश करांत और अमरजीत कौर भी उपस्थित थे। शरद यादव और कांग्रेस तथा भाजपा के नेताओं ने बाबूराम भट्टाराइ्र के स्वागत में देशहित का पूरा ख्याल रखा और नेपाल के साथ प्राचीन संबंध पर गर्व भी किया। पर जैसे ही प्रकाश करांत को बोलने का अवसर दिया गया वैसे ही प्रकाश करांत ने भारत हित के खिलाफ बोलना शुरू कर दिया। प्रकाश करांत का कहना था कि भारत नेपाल के हित का दमन कर रहा है, भारत का व्यवहार उपनिवेशवादी है, भारत नेपाल को अस्थिर करना चाहता है। प्रकाश करांत के इस वकत्व्य को सुन कर कांग्रेस और भाजपा के नेता ही नहीं बल्कि उपस्थित पत्रकार और अन्य राजनीतिज्ञ भी दंग थे। जब बोलने समय बाबूराम भट्टाराई का आया तो उन्होंने ऐसी कोई बात नहीं कि जिससे भारत की छवि एक उपनिवेशवादी की बनती है, उन्होंने कहा कि भारत मेरा बड़ा भाई है, हम साथ-साथ रहकर आगे बढेंगे। दूसरा उदाहरण अभी के नेपाल के प्रधानमंत्री ओपी शर्मा ओली के साथ का है। उस समय ओपी शर्मा ओली नेताल कम्युनिस्ट पार्टी के बड़े नेता थे। वे भारत नेपाल मैत्री पर आयोजित एक विचार संगोष्ठी में दिल्ली आये थे। प्रकाश करांत का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की नेता अमरजीत कौर भी भारत के खिलाफ बोलने और नेपाल को पीडि़त होने का आरोप जड़ दिया। ओपी ओली की मुस्कान उस समय देखने वाली थी। ओपी ओली की समझ यही रही होगी कि जो काम वे नहीं कर सकते थे वह काम तो भारत के नेता ही कर रहे हैं। जब चीन ने 1962 हमले में किये थे तब भी कम्युनिस्ट नेताओं ने चीन को आक्रमणकारी मानने से इनकार कर दिया था। आज तक कम्युनस्टि पार्टियां यह नही मानती हैं कि चीन ने 1962 पर हमला किया था बल्कि भारत को ही हमलावर मानती हैं।
                                      अभी-अभी चीन और नेपाल ने जो पैंतरेबाजी दिखायी है, भारत की सीमा का अतिक्रमण किया है, घोखे से हमारे सैनिकों का नरसंहार किया, हमारी सीमा भूमि पर कब्जा किया है, इस पर भी कम्युनिस्टों ही नहीं बल्कि अनेकानेक देशद्रोहियों की चीन की भाषा में बोलने के उदाहरण सामने आये हैं। एक टीवी चैनल के बहस में बड़े कम्युनिस्ट नेता सुनीत चौपडा ने सीधे तौर पर भारत को ही खलनायक बना दिया और कह दिया कि भारत ही चीन पर ज्यादती कर रहा है, पीडि़त चीन है, भारत पिछलग्गू बन कर अमेरिका का काम कर रहा है। अधिकतर कम्युनिस्ट नेता यह कहते हैं कि भारत अमेरिका के पक्ष में जाकर चीन के खिलाफ साजिश कर रहा है। इनकी भाषा के अनुसार हमें अमेरिका के साथ रिस्ते नहीं रखने चाहिए। क्या हम चीन का गुलाम है? क्या हमारी अपनी कोई स्वतंत्रता नहीं है? क्या हम अपने हितों का बलिदान देकर चीन का गुलाम बन जायें? 1962 में भी चीन ने इसी तरह की मानसिकता से आक्रमण किया था कि भारत अमेरिका के साथ दोस्ती क्यों बढा रहा है। हमारा जिससे हित सधता है उससे हमारी दोस्ती होगी। हम चीन के डर से कब तक अपनी स्वतंत्र और निडर सुरक्षा की व्यवस्था के साथ समर्पण करते रहेंगे। अगर ये बातें कम्युनिस्ट जमात और अन्य देशद्रोही जमात से पूछेगे तब भी ये चीन की भाषा ही बोलेंगे।
                                   कांग्रेस और राजीव गांयाी फाउडेशन का प्रसंग भी देश की जनता की चिंताओं को बढ़ाया है और यह विचार को मजबूत किया है कि असली दुश्मन और भेदिया तो घर में बैठे हुए हैं। कांग्रेस और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के बीच समझौते की बात सामने आ चुकी है। समझौतों की शर्ते क्या हैं? समझौतें की शर्ते जगजाहिर होनी चाहिए। कांग्रेस को समझोते की शर्ते को उजागर करनी चाहिए। सबसे बड़ी चिंता की बात राजीव गांधी फाउंडेशन को लेकर है। यह संस्थान अब तो अपनी छवि खो चुकी है, इस संस्थान की देशभक्ति पर आंच आ चुकी है। यह फाउडेशन अपनी वार्षिक रिपोर्ट में चीन से धन लेना खुद स्वीकार किया है। धन की राशि भी बहुत बडी है। कोई एक बार नहीं बल्कि कई बार चीन से धन मिले हैं। राजीव गांधी फाउडेशन को 90 लाख डॉलर का चीनी फंड मिला था। दुश्मन देश अपने हित साधने और अपने पक्ष में हवा बनाने के लिए पैसा पानी की तरह ही बहाते हैं। जनता को दिग्भ्रिमित करने के लिए तरह-तरह के हथकंडे फैलाते हैं। हथकंडे फैलाने के मोहरे भी इनके वित्तपोषक फांउडेशन और संगठन होते हैं। चीन देश के अंदर में राजीव गांधी फाउडेशन जैसे सैकड़ों संस्थान पोषित कर रखे हैं। ये चीनी पोषक संस्थान इस चीनी करतूत की दौर में भारत हित को ही लहूलुहान और अपमानित करने में लगे हुए हैं।
                                                         आज के कुछ साल पहले गुलाम फई का प्रसंग भी देशद्रोहियों को नंगा किया था, बेनकाब किया था। गुलाम फई आईएसआई का एजेंट था पर वह अमेरिकी नागरिक था। अमेरिकी नागरिक होने के कारण वह भारत विरोधी जिहाद का काम आसानी से कर रहा था। वह हर साल अमेरिका में कश्मीर पर सेमिनार आयोजित करता था। सेमिनार आयोजन का मुख्य उदे्देश्य पाकिस्तान के हित को प्रमुखता के साथ उठाना और पाकिस्तान के आतंकवाद पर पर्दा डालना तथा कश्मीर के अंदर भारत को खलनायक के तौर पर प्रस्तुत करना था। सेमिनार में वह हर साल भारत के बुद्धिजीवियों, पत्रकारों और लेखकों को आमंत्रित करता था और इन पर पैसा पानी की तरह बहाता था। भारतीय बुद्धिजीवी, पत्रकार और लेखक भी मौज करते थे, उनके लिए मनोरंजन की सभी संसाधन उपस्थित किये जाते थे। इसके बदले में ये भारतीय बुद्धिजीवी गुलाम फई की उंगलियों पर नाचते थे, उनके गुलाम बन जाते थे। सेमिनार में ये भारतीय बुद्धिजीवी, लेखक और पत्रकार पाकिस्तान की भाषा बोलते थे, पाकिस्तान के हित साधने वाले, कश्मीर को आजाद करने वाले तथा भारत को मानवाधिकार का घोर हननकारी बताने वाले जैसे प्रस्ताव पारित करने में मदद करते थे। अमेरिकी गुप्तचर एजेंसी सीआईए को जब भनक लगी तब उसने जांच की। जांच आगे जैसे बढी वैसे ही अमेरिकी कानूनो के हनन की बात सामने आयी। गुलाम फई और इनके पेसों पर पलने वाले भारतीय बुद्धिजीवी, लेखक, पत्रकार बेनकाब हो गये। गुलाम फई को अमेरिकी कानून तोड़ने के खिलाफ जेल की सजा हुई। भारत में भी गुलाम फई और पाकिस्तान के हित साधने वाले भारतीय बुद्धिजीवियों, लेखकों व पत्रकारों पर कार्रवाई करने की मांग उठी थी। पर मनमोहन सिंह सरकार ने कार्रवाई करने से इनकार कर दिया था।
                               कोई भी देश बाहरी आक्रमण या फिर बाहरी दुश्मनों से कम और आतंरिक दुश्मनों, देशद्रोहियों व जयचंदों से ज्यादा पीडि़त होता है, कमजोर होता है, भारत भी जयचंदों के कारण बार-बार तबाह हुआ है। इसलिए भारत को असली खतरा देश के जयचंदों से ही है। इसलिए देश के जयचंदो पर कठोर कार्रवाई की जरूरत है। केन्द्रीय सरकार को विदेशी धन ग्रहण करने के कानून कड़े कर देना चाहिए। खासकर दुश्मन देश से धन लेने पर दंड का विधान होना चाहिए। जिस मद् में धन लिया गया उस मदृ में खर्च हुआ कि नहीं, इस पर भी निगरानी होनी चाहिए। आतंरिक दुश्मनों, देशद्रोहियों-जयचंदों पर संहार करने का यह सही समय है। 


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विष्णुगुप्त
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Wednesday, June 24, 2020

तुम्हें कभी नहीं मिलेगी आजादी

कहानी 
*    .     तुम्हें कभी नहीं मिलेगी आजादी   * 
एक नवयौवना को जीवन का मर्म समझाता मेरा यह पत्र
आचार्य श्री विष्णु गुप्त
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......   तुम एक दिन कही थी कि न जाने कब तुम्हे आजादी मिलेगी। मैंने तुम्हे कहा था कि तुम्हे कभी नहीं मिलेगी आजादी।
...... आज न कल तुम्हारी शादी हो जायेगी, शादी या तो तेरे अभिभावकों की मर्जी से होगी या फिर तुम अपनी मर्जी से करोगी
... .  .  शादी के बाद कुछ दिन तक तुम आजाद महसूस जरूर करोगी पर वह समय मनोरंजन काल होगा, मनोरंजन काल अल्प अवधि का होगा, मनोरंजन काल में तुम सिर्फ आजादी महसूस करोगी, आजाद नहीं होगी
...... अनिवार्य परम्परा के अनुसार मनोरंजन अवधि में ही तुम्हारे पति, सास ससुर, समाज की वंशवादी अनिवार्य विचार प्रवृति तुम पर हावी हो जाएगी, तुम उस जकड़न व घेराबंदी में कैद हो जाएगी
.......दुनिया की रीत के अनुसार तुम पर सांसारिक जीवन के दायित्व का बोझ  उत्पन्न होना निश्चित है
....... प्रतिफल तुम मा बनोगी, मा बनने की खुशी तुम्हारे उपर हावी हो जाएगी, बच्चे को ही अपना संसार और अपना जीवन समझ लोगी, अपना सबकुछ बच्चे पर लूटा दोगी
      ...... बच्चे को बड़ा करने और बच्चे को  पढ़ाने, बच्चो को कामयाब बनाने में जिंदगी वृदधावस्था में पहुंच जाएगी
  ......ऐसी अवस्था आने पर मनोरंजन प्रवृति भी समाप्त हो जाती है, जीवन की सभी  इच्छाएं समाप्त हो जाती है, जीवन का उत्साह समाप्त हो जाता, कई बीमारियां आगोश में ले लेती हैं, इसके बाद जिंदगी आश्रित हो जाती है, फिर जिंदगी का कोई मूल्य नहीं बचता है
..... फिर बहू का साम्राज्य स्थापित हो जाता, बहू सास ससुर के लिए सीधे यमराज हो जाती है
..... बच्चे बाहर या विदेश चले गए तो फिर अकेलापन और अवसाद का हमला भी असहनीय पीड़ा देती है, बच्चो को लौटने की आस में वृद्ध आत्माएं तिल तिल कर मरती है
........ सरदार भगत सिंह, मंगल पांडेय, चन्द्रशेखर आजाद, तात्या टोपे , आदि अगर मनोरंजन प्रवृति में फसते, परिवार मोह में डूबते तो फिर क्रांति के सूत्रधार नहीं बनते, प्रेरक नहीं बनते। मै खुद भी इसी श्रेणी में सक्रिय हू।
..... पेट और परिवार पालने वाले लोग कभी भी क्रांति के सहचर नहीं बनते, विश्वसनीय नहीं होते, हमेशा धन और परिवार मोह में वर्जित कार्य के अभियुक्त होते हैं
........   पृथ्वी पर आना न आना किसी कि इच्छा पर निर्भर नहीं करता है, लेकिन पृथ्वी पर आने के बाद अपने अनुसार जीवन संसार बनाया जा सकता है
.......   यह मेरा विचार है, मेरा यह विचार तुम्हारे सिर का बोझ नहीं बनेगा,
.....  मेरी बात सकारात्मक है, मेरी यह बात पेट और परिवार पालने वालो के लिए नहीं है
.....  मेरी यह उक्ति सामान्य रूप से लडको पर भी लागू होती है।
...... *तुम निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हो* 

   ******     तुम्हारी शुभैषी.  *****

,,,,,,,      आचार्य श्री विष्णु गुप्त   ,,,,,,

Monday, June 22, 2020

तिब्बत की आजादी को अचूक हथियार बनाओ

 राष्ट्र-चिंतन
नेहरू और अटल बिहारी वाजपेयी की मूर्खता का दुष्परिणाम है चीन की गुंडई
तिब्बत की आजादी को अचूक हथियार बनाओ
    
       विष्णुगुप्त



तिब्बत  पर नेहरू और अटल की भूलें और कूटनीतिक मूर्खता अब हमारी सीमा की सुरक्षा पर संकट कारण और हमारे जवानों की जानं गंवाने के कारण बन गयी हैं। जवाहरलाल नेहरू पर तो चीन की दोस्ती का भूत सवार था, चीन और पाकिस्तान परस्ती उन पर हावी थी जिसके  कारण उन्होनंे तिब्बत की स्वतंत्रता को अक्षुण नहीं रख सके और तिब्बत पर चीन का कब्जा होने दिया। जब चीन भारत पर आक्रमण कर, हमारी सीमा पर कब्जा करने की साजिश कर रहा था तब उस समय जवाहरलाल नेहरू हिन्दी-चीनी भाई-भाई का नारा दे रहे थे, सीमा की सुरक्षा और सेना की मजबूती उनके एजेंडे से बाहर ही था। नेहरू की गलतफहमी थी कि चीन की कम्युनिस्ट तानाशाह माओ त्से तुग तिब्बत की तरह हमारी सीमा भूमि पर न तो कब्जा करेेगा और न ही हम पर आक्रमण करेगा। माओ त्से तुंग कहा करता था कि सत्ता और शक्ति बन्दूक की गोली से निकलती है, जिसने तिब्बत की आजादी को लहूलुहान कर कब्जा किया था, जिसने तिब्बत पर कब्जा करने के लिए हजारों निहत्थे बौद्ध भिक्षुओं का नरसंहार किया था, बौद्ध धर्म गुरू दलाई लामा को भारत भागने के लिए बाध्य किया था, जिसके लिए शांति और सौहार्द कोई नीति नहीं थी उस पर विश्वास करना ही नेहरू की मूर्खता थी। हमारे लिए नेहरू की मूर्खता कितना घातक, कितना खतरनाक और कितना वीभत्स साबित हुई थी, यह भी उल्लेखनीय है। माओ त्से तुंग ने न कवेल भारत पर आक्रमण किया था बल्कि हमारी 90 हजार वर्ग भूमि पर कब्जा कर लिया था, पांच हजार से अधिक हमारे सैनिकों को मार डाला था। चीन की दादागिरी और गुडई देखिये कि हमारी कब्जाई भूमि को वह छोड़ने के लिए तैयार नहीं है पर वह लद्दाख और सिक्किम-अरूणाचल प्रदेश को भी अपना अंग मानने की धुर्तता करने से बाज नहीं आता है।
                               दूसरी मूर्खता अटल बिहारी वाजपेयी ने की थी। अटल बिहारी वाजपेयी की मूर्खता हमारे लिए बहुत भारी पड़ी है। जवाहरलाल नेहरू के रास्ते पर अटल बिहारी वाजपेयी क्यों चले? नेहरू का हिन्दी-चीनी भाई-भाई की कूटनीति का हस्र वाजपेयी को क्यों नही मालूम था? चीन की विश्वासघाती चरित्र , अटल बिहारी वाजपेयी को क्यों नहीं मालूम था? चीन हमारा असली शत्रू है, यह अटल बिहारी वाजपेयी को क्यों नहीं मालूम था? जबकि पूरा देश यह मानता है कि हमारा असली दुश्मन चीन ही है। अटल बिहारी वाजपयी के मंत्रिमडल में शामिल और तत्कालीन रक्षा मंत्री जार्ज फर्नाडीस बार-बार कहते थे कि हमारा असली दुश्मन पाकिस्तान नहीं है बल्कि असली दुश्मन तो चीन है, चीन से ही भारत को असली खतरा है, पाकिस्तान के आतंकवाद और पाकिस्तान की युद्धक मानसिकता के पीछे चीन ही है। इसलिए चीन पर विश्वास करना भारत को महंगा पडेगा। अब यहां यह प्रश्न उठता है कि तिब्बत के प्रति अटल बिहारी वाजपेयी की कूटनीतिक मूर्खता क्या थी? उनकी कूटनीतिक मूर्खता तिब्बत को चीन का अंग स्वीकार करने की थी। अटल बिहारी वाजपेयी ने 2003 में चीन के साथ एक समझौता किया था उस समझौते में अटल बिहारी वाजपेयी ने तिब्बत पर चीन का अधिकार मान लिया था और यह भी शर्त्र स्वीकार कर ली थी कि भारत भविष्य में कभी-भी तिब्बत की आजादी का प्रश्न नहीं उठायेगा। जब यह समझौता सामने आया था तब देश में हाहाकार मच गया था। राजनीतिज्ञों और सुरक्षा विशेषज्ञों के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गयी थी और इस मूर्खता को देश की सुरक्षा के लिए घातक मान लिया गया था। उस समय तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने यह तर्क दी थी कि चूंकि सिक्किम पर चीन ने भारत का अंग स्वीकार कर लिया है, इसलिए तिब्बत की आजादी का प्रश्न हमनें छोड़ दिया। सिक्किम तो हमारा अभिन्न अंग है। इसलिए इस पर चीन के दावे का प्रश्न ही कहां उठता था? फिर चीन की कारस्तानी देखिये, विश्वासघाती चरित्र देखिये। अब फिर चीन सिक्किम को अपना अंग कहने लगा है।
                                        चीन के खिलाफ तिब्बत का हमारा अचूक हथियार होता था। जब भी चीन हमारे खिलाफ बोलता था, जब भी चीन पाकिस्तान के समर्थन में बोलता था, जब भी चीन अतंर्राष्टीय मंचों पर भारत के खिलाफ बोलता था, चीन जब भी कश्मीर पर पाकिस्तान की भाषा का इस्तेमाल करता था तब भारत तिब्बत की आजादी का प्रश्न उठा कर चीन की बोलती बंद कर देता था। तिब्बत में मानवाधिकार का घोर उल्लंघन का प्रश्न हमारे लिए अति महत्वपूर्ण होता था, तिब्बत में घोर मानवाधिकार हनन का प्रश्न हम दुनिया के सामने लाकर चीन का असली चेहरा दिखा देते थे। तिब्बत की आजादी और तिब्बत का स्वतंत्र आकार हमारे देश की जनता चाहती रही हे। राममनोहर लोहिया और समाजवादी तबका चीन के खिलाफ हमेशा सक्रिच रहते थे और तिब्बत की आजादी का प्रश्न उठाते रहते थे। राममनोहर लोहिया की मृत्यु के बाद जार्ज फर्नाडीस ने तिब्बत की आजादी का मशाल जलाते रहे थे। पर धीरे-धीरे समाजवादियों और गांधी जनों का जातीय और क्षेत्रीय करण होता चलेगा और उनकी मित्रता उस कम्युनिस्ट जमात से हो गयी जिस कम्युनिस्ट जमात ने चीनी आक्रमण और अपने सेनिकों के नरसंहार का समर्थन किया था और माओ त्से तुंग के अपना प्रधानमंत्री माना था, आक्रमणकारी चीनी सैनिकों के समर्थन और स्वागत में बैनर आदि लगाये थे, सिर्फ इतना ही नहीं आयुघ कारखानों में हड़ताल भी करायी थी ताकि भारतीय सैनिकों के पास हथियार न पहुंच सके।
                                   हमारी सरकारों की मूर्खता यहीं तक सीमित नहीं है। मूर्खता और भी हैं। जिनका परीक्षण होना चाहिए। देश की जनता को यह जानना चाहिए कि तिब्बत और चीन की कसौटी पर मूर्खता की एक लंबी फेहरिस्त है। पीवी नरसिंह राव और मनमोहन सिंह की मूर्खता भी बहुत आघात वाली है और अभी-अभी जो हमारे 20 से अधिक सैनिक चीन के हाथों मारे गये हैं उसके पीछे पीवी नरसिंह राव और मनमोहन सिंह की मूर्खता ही है। पीवी नरसिंह राव 1996 में चीन के साथ एक संधि की थी जिसमं लद्दाख के आस-पास सैनिकों के बीच तकरार के समय हथियारों का उपयोग नहीं करने की बात थी। उस समय देश का रक्षा मंत्री शरद पवार थे। इसी तरह की चीन के साथ एक संधि मनमोहन सिंह ने की थी। इन संधिचों के कारण भारतीय सैनिकों के हाथ बंधे हुए थे। जब राहुल गांधी ने प्रश्न दागा था कि भारतीय सैनिकों को हथियारों के उपयोग का आदेश क्यों नहीं दिया गया था। राहुल गांधी के इस प्रश्न का भारत के विदेश मंत्री जयशंकर ने जवाब देते हुए साफ कहा था कि कांग्रेस के राज में 1996 और 2005 में चीन के साथ संधि हुई थी, जिसके कारण भारतीय सैनिक हथियारों का प्रयोग नहीं कर सकते थे। एक तथ्य और भी है। अमेरिका नही चाहता था कि चीन संयुक्त राष्टसंघ की सुरक्षा परिषद का सदस्च बनें। एशिया क्षेत्र से अमेरिका ने भारत को सुरक्षा परिषद का सदस्य बनाना चाहता था, अमेरिका ने पेशकस भी की थी। पर जवाहरलाल नेहरू ने भारत को सुरक्षा परिषद का सदस्य बनाने से साफ इनकार कर दिया था और कहा था कि मेरा बड़ा भाई चीन है, इसलिए चीन को ही सुरक्षा परिषद का सदस्य बनाया जाना चाहिए। अगर भारत आज सुरक्षा परिषद का सदस्य होता तो निश्चित मानिये कि चीन की गुंडई का हम आसान शिकार कभी भी नहीं होते।
                                   चीन ने एक तरह से विश्वासघात किया है, सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि उसने संधि तोड़ी है। नुकीली छडि़यों और घातक रडों से हमला कर हमारे सैनिकों का नरसंहार किया है। ऐसे में हमें भी इन सभी संधियों से हट जाना चाहिए। तिब्बत की आजादी के प्रश्न को अब हमें उठाना ही चाहिए। तिब्बत में घोर मानवाधिकार हनन के प्रश्न को भी उठाना चाहिए। चीन का आईना दिखाना चाहिए तुम हमारी सीमाओं का अतिक्रमण करोंगे और कब्जा करोगे तो फिर हम अपने तिब्बत के अचूक हथियार का भी प्रयोग करेंगे। तिब्बत में बौद्ध भिक्षुओं के शांतिपूर्ण आंदोलन को समर्थन देंगे। लद्दाख के अंदर में हमारे सैनिकों ने जो वीरता दिखायी है वह हमारे लिए गर्व और प्रेरणा की बात है। पहली बार चीन के खिलाफ हमारे सैनिकों ने न केवल तन कर खड़ा हुए बल्कि चीनी सैनिकों को सबक भी सिखाया है। चीन के अगर पांच-दस सैनिक भी मरे होंगे तो फिर यह घटना चीन के लिए सबक देता रहेगा और उसकी यह खुशफहमी भी टूट चुकी है कि भारतीय सैनिक और भारत की सरकार पहले जैसा आत्मसमर्पण कारी होंगे। नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह से सैनिकों को छूट दी है और लद्दाख सहित अन्य क्षेत्रों की सीमा पर सैनिक और हथियारों की तैनाती शुरू की है, वह प्रशंसा की बात है। हमें उम्मीद है कि नरेन्द्र मोदी अब तिब्बत की आजादी का प्रश्न उठा कर चीन की हैकड़ी तोडने का काम करेंगे।
                                             



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Monday, March 2, 2020

हिन्दुओं के कत्लेआम क्यों देखते रहे भाजपा-मोदी

राष्ट्र-चिंतन
कत्लेआम से डरे हिन्दू संपत्ति बेच कर भागेंगे 

 संपत्ति कब्जाने और हिन्दुओं से भगाने के लिए पूर्व नियोजित था कत्लेआम
हिन्दुओं के कत्लेआम क्यों देखते रहे भाजपा-मोदी

     विष्णुगुप्त


दिल्ली देश की राजधानी है, जहां पर प्रधानमंत्री बैठते हैं, गृह मंत्री बैठते हैं, नरेन्द्र मोदी सरकार को हिन्दुओं की सरकार कही जाती है, कभी नरेन्द्र मोदी भी हिन्दुओ की अस्मिता के बल पर राजनीति के सिरमौर बने थे, प्रधानमंत्री भी नरेन्द्र मोदी हिन्दुओं की एकता के कारण बने थे। दिल्ली के हिन्दुओं ने 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में मोदी को समर्थन दिया था, इतना ही नहीं बल्कि दिल्ली की सातों लोकसभा सीटें भाजपा की झोली में डाली थी। दिल्ली के हिन्दुओं को यह कभी आशंका नहीं थी कि उन्हें संकट के समय में नरेन्द्र मोदी,अमित शाह और भाजपा मदद के लिए आगे नहीं आयेंगे, जब उनका सुनियोजित कत्लेआम किया जायेंगा तब नरेन्द्र मोदी की सरकार तमाशबीन बनी रहेगी, कत्लेआम करने वाले दंगाइयों को पूरी छूट दे देगी, नरेन्द्र मोदी की सरकार की पुलिस तमाशबीन रहेगी, नरेन्द्र मोदी सरकार की गुप्तचर एजेंसियां नाकाम रहेगी, उन्हें सुनियोजित कत्लेआम की पूर्व सूचना ही नहीं होगी?
                                   अब दिल्ली के हिन्दू दो तरह की सोच का उत्तर खोजने की कोशिश करने में लगे हैं। पहली सोच उनकी यह है कि अगर उनका कत्लेआम पूर्व नियोजित था तो फिर दिल्ली पुलिस और अन्य गुप्तचर एजेसियों को पूर्व सूचना क्यों नहीं मिल पायी थी? दूसरी सोच यह है कि अगर दिल्ली पुलिस और अन्य गुप्तचर एजेसियों को उनके कत्लेआम की पूर्व सूचना थी तो फिर उनके कत्लेआम को रोकने की जिम्मेदारी नरेन्द्र मोदी सरकार क्यों नहीं उठायी? तटस्थ हिन्दू भी डरे हुए हैं, जो तटस्थ हिन्दू भाजपा के समर्थक नहीं थे और कांग्रेस, कम्युनिस्ट और अरविन्द केजरीवाल के समर्थक थे उनकी भाषा बदल गयी है, वे भी अब अपने आप को असुरक्षित समझ रहे हैं। उनकी भी सोच यही है कि तथाकथित धर्मनिरपेक्षता क्या हिन्दुत्व को समाप्त करने के लिए है, हिन्दुओं के कत्लेआम कराने के लिए है।
                        स्वतंत्र समीक्षा यही है कि यह दंगा नहीं था बल्कि हिन्दुओं का कत्लेआम था। बन्दूकें किन लोगों ने चलायी, छोटे हथियार कौन लोग चलाये, देशी राॅकेट लांचर किन लोगों ने चलाये, आईबी के नौजवान के शरीर को चाकुओं से गोद कर छलनी करने वाले कौन लोग थे , दिल्ली की पुलिस के हवलदार रतन लाल की मौत किन लोगों की गोली से हुई, आईपीएस अधिकारी किन लोगों की पत्करबाजी में घायल हुए हैं? अब यह तो लाइव भी देखा गया है। किनके घरों में और किनके छतों पर देशी राॅकेट लांचर पाये गये है, किनके घरों और छतों पर गुलेल मिली हैं, किनके घरों के छतों पर पत्थर मिले हैं, कितने घरों और छतों पर पेट्रोल बमें मिले हैं, किनके घरों और किनके छतों पर ऐसिड मिली है? टयूशन गयी पांच हिन्दू लड़कियों को किन लोगों ने अपहरण करने की कोशिश की थी, यह भी स्पष्ट हो गया है। दंगे वाले क्षेत्र में एक वर्ग के बच्चे दंगों के दिन स्कूल क्यों नहीं गये थे, यह सब भी स्पष्ट हो गया है। सड़को पर इतने पत्थर पडे हैं जिन्हें उठाने में दिल्ली नगर निगम को बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड रहा है। दिल्ली नगर निगम के एक अधिकारी का कहना है कि सिर्फ कुछ ही सड़कों पर 50 टन से ज्यादा पत्थर और अन्य मलवा उठाया जा चुका है। कुछ ही सड़कों पर कोई एक नहीं बल्कि 50 टन पत्थर और अन्य मलवा मिलना क्या संकेत देता हैं? संकेत तो यही देता है कि यह दंगा, यह कत्लेआम कितना भयानक था, कितना पूर्व नियोजित था, ऐसे कत्लेआम करने वाले समूह के लोग क्या शांति के कभी पक्षधर हो सकते हैं?
                                              दंगे के दिन की परिस्थितियां सिर्फ कारण नहीं रही हैं? दंगे के दिन की परिस्थितियां को कारण मानने वाले लोगों को एक नहीं बल्कि कई परिस्थितियों और कई प्रश्नों का उत्तर देना होगा? सबसे बडी बात यह है कि कोई भी हथियार रातो-रात या फिर मिनटों-मिनटों में तैयार नहीं होते हैं, कई टन पत्थर कोई मिनटों-मिनट में जमा नहीं हो सकते हैं, गुलेंले कोई मिनटों-मिनट में तैयार नहीं होती हैं, देशी राॅकेट लाचरें कोई मिनटों में तैयार नहीं होते हैं, दीवारों में राॅकेट लांचरों को फिक्स करने का कार्य मिनटों में नहीं होते हैं, पेट्रोम बम मिनटों में तैयार नहीं होते हैं? सबसे बडी बात यह है कि कोई शांति प्रिय व्यक्ति इस तरह का खतरनाक विनाशक हथियार निर्माण नहीं कर सकता है और न ही इस तरह के विनाशक हथियारों का सग्रह कर सकता है। कोई आतंकवादी संगठन, कोई अपराधी समूह और कोई हिंसक समूह ही देशी राकेट लांचर, देशी गुलेंले, पेट्रोल बमें बना सकते हैं, ऐसे समूह ही ऐसिड जमा कर सकते हैं, ऐसे समूह ही ऐसिड अटैक कर सकते हैं। सबसे बडी बात यह है कि ये सभी खतरनाक और विनाशक हथियार जिससे हिन्दुओं का कत्लेआम हुआ है कोई सभी घरों में तो नहीं बनें होंगे, कहीं एक-दो जगहों पर ही बनें होंगे? फिर ऐसे खतरनाक और विनाशक हथियार कहां बनेंगे होगे, बनाने वाले कौन लोग होंगे और फिर ऐसे खतरनाक और विनाशक हथियार को घर-घर कैसे पहुंचाया गया होगा, घर-घर पहुंचाने वाले कौन लोग होंगे?
                                      अब जिन लोगों के नाम सामने आ रहे हैं, जिनके घरों में ये सभी हथियार मिले हैं और जिन पर हिन्दुओं के कत्लेआम के आरोप लगे हैं वे तर्क कैसे दे रहे हैं, यह भी देख लीजिये। उनका कहना है कि उनके घर में तबाही के जो खतरनाक और विनाशक हथियार मिले हैं वे कहां से आये , यह उन्हें नहीं मालूम है, उनके घरों के छतो से कौन लोग पत्थरबाजी कर रहे थे, कौन लोग राॅकेट लांचर फेक रहे थे, कौन लोग ऐसिड फेक रहे थे, यह भी नहीं मालूम है। ये कह रहे हैं कि बाहरी लोग थे, पर बाहरी लोग कैसे उनके घरों में जमा किये गये थे, ये यह बताने के लिए तैयार ही नहीं है। अब जो मीडिया में लाइव तस्वीरें आयी हैं और जो वीडीओ वायरल हुए हैं, उससे स्पष्ट है कि कोई एक दिन-दो दिन की यह कारस्तानी नहीं थी बल्कि यह महीनों से इसकी तैयारी थी। सिर्फ आम आदमी पार्टी का मुस्लिम नेता पार्षद ही नहीं बल्कि कांग्रेस के पूर्व पार्षद की दंगाई भूमिका के सारे प्रमाण हैं।
                                       अभी दिल्ली पुलिस दंगे में मारे गये लोगों के नामों का खुलासा नहीं कर रही है। पर जब खुलासा दिल्ली पुलिस करेगी तब लोग न केवल अंचभित होगे बल्कि उनके अंदर में डर भी कायम हो जायेगा। यह सबकों मालूम है कि 95 प्रतिशत हिन्दू ही कत्लेआम के शिकार है। मुस्लिम समूदाय से सिर्फ दो-चार लोग ही मृत्यु के शिकार होगे। जिस तरह का खेल पहले होता था उसी प्रकार का खेल अब भी हो रहा है। हिन्दुओं के कत्लेआम के गुनहगारों को बचाने की कोशिश हो रही है। कपिल मिश्रा को बलि का बकरा बनाया जा रहा है। जिस तरह के बयान कपिल मिश्रा ने दिया था उससे भी खतरनाक बयान तो रोज मुस्लिम नेता दे रहे थे, उस तरह के बयान तो शाहीन बाग में बैठे मुस्लिमों के नेता दे रहे थे। कपिल मिश्रा ने सिर्फ चेतावनी दी थी , दिन दिनों में रास्ते खुलवाने का अल्टिमेटम दिया था। कपिल मिश्रा के प्रदर्शन समूह पर पत्थरबाजी और दंगा तो मुस्लिम समूदाय के लोगों ने शुरू किया था।
                      दिल्ली के हिन्दू बेहद डरे हुए हैं। मुस्लिम बहुल क्षेत्रों से अपनी संपत्ति बेच कर भागने लगेंगे। कत्लेआम का शिकार कौन होना चाहेगा? मुश्किल बहुल क्षेत्रों में रहने का अब अर्थ कभी भी कत्लेआम शिकार होना हो गया है। मुस्लिम अपराधियों ने जिस तरह कैरान में हिन्दुओं के साथ सूलक किया था और कैराना से हिन्दुओं को खाली कराने की सफल भी हुए उसी तरह की स्थिति अब दिल्ली में बनी है।
                   हिन्दुओं के सामने अब विकल्प क्या है? पहले भाजपा और मोदी पर उन्हें विश्वास था। पर अब भाजपा और मोदी भी दिल्ली में हिन्दुओं के कत्लेआम पर तमाशबीन बनी रही। विपक्षी पार्टियां पहले से ही हिन्दू विरोधी और मुस्लिम पक्षी थी। अगर हिन्दुओं में डर का समाधान नहीं किया गया तो फिर हिन्दू भी कट्टरवाद के रास्ते पर चल सकते हैं। भाजपा और मोदी के लिए भी आत्मपंथन का समय है।



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Monday, November 25, 2019

यूरोप में खडी हो रही इस्लामीकरण और देशज संस्कृति की खतरनाक दीवार




राष्ट्र-चिंतन

यूरोप में खडी हो रही इस्लामीकरण और
देशज संस्कृति की खतरनाक दीवार


      विष्णुगुप्त



यूरोप के बढते इस्लामीकरण अब एक विस्फोटक राजनीतिक प्रश्न बन गया है और इस प्रश्न ने यूरोप की बहुलतावादी संस्कृति और उदारतावाद को लेकर एक नहीं बल्कि अनेकानेक आशंकाएं और चिंताएं खडी कर दी हैं। संकेत बडे ही विस्फोटक है, घृणात्मक है, अमानवीय है और भविष्य के प्रति असहिष्णुता प्रदर्शित करता है। जब इस्लामिक करण को लेकर यूरोप की मुस्लिम आबादी खतरनाक तौर अपनी भूमिका सक्रिय रखेगी और यूरोप की मूल आबादी अपनी संस्कृति के प्रति सहिष्णुता प्रकट करते हुए प्रतिक्रिया में हिंसक होगी, तकरार और राजनीतिक बवाल खडा करेगी तो फिर यूरोप राजनीति, कूटनीति और अर्थव्यवस्था की स्थिति कितनी अराजक होगी, कितनी हिंसक होगी, इसकी उम्मीद की जा सकती है। यूरोप के सिर्फ एकाद देश ही नहीं बल्कि कई देश इस्लामीकरण के चपेट में खडे है और यूरोप की पुरातन संस्कृति खतरे में पडी हुई है। यूरोप ने विगत में दो-दो विश्व युद्धों का सामना किया है, यूरोप के लाखों लोग दोनों विश्व युद्धों में मारे गये थे। दो विश्व युद्धों का सबक लेकर यूरोप ने शांति का वातावरण कायम रखने की बडी कोशिश की थी। यूरोप में लोकतंत्र सक्रिय रहा, शांति और सदभाव भी विकसित हुआ। धार्मिक आधार पर भी यूरोप सहिष्णुता ही प्रदर्शित करता रहा है। धार्मिक आधार पर भेदभाव यूरोप में नीचले कम्र पर ही रहा। मुस्लिम देशों और अफीका से पलायन कर गयी आबादी को यूरोप में पलने-फूलने का अवसर दिया गया, उन्हें लोकतांत्रिक अधिकार प्रदान किये गये। इसका सुखद परिणाम यह हुआ कि मुस्लिम देशों और अफ्रीका से गयी आबादी भी गोरी आबादी के सामने खडी हो गयी, उनकी समृद्धि भी उल्लेखनीय हो गयी, उनकी आबादी भी लोकतंत्र को प्रभावित करने की शक्ति हासिल करने लगी। स्थिति विस्फोटक तो तब हो गयी जब मुस्लिम आतंकवादी संगठन एक साजिश के तहत मुस्लिम आबादी को शरणार्थी के तौर पर यूरोप में घुसाने और यूरोप के लोकतंत्र पर कब्जा करने के लिए सक्रिय हो गये। आज पूरा यूरोप मुस्लिम आतंकवाद और इस्लामीकरण की आग में जल रहा है।
                                   वर्तमान में विस्फोटक स्थिति नार्वे में खडी हुई है, नार्वे की विस्फोटक स्थिति ने पूरी दुनिया का ध्यान खीचा है, पूरी दुनिया नार्वे की स्थिति को लेकर चिंतित हुई है और नार्वे की घटना का यथार्थ खोजा जा रहा है और यह चिंता व्यक्त की जा रही है कि नार्वे की विस्फोटक घटना की पुनरावृति ने केवल नार्वे में फिर से हो सकती है बल्कि इसकी आग यूरेाप के अन्य देशों तक पहुंच सकती है। समय - समय पर नार्वे जैसी स्थिति फ्रांस में भी हुई है, इटली में भी हुई है, जर्मनी में भी हुई है और मुस्लिम शरणार्थियो को लेकर नयी-नयाी विस्फोटक, खतरनाक और घृणात्मक सोच विकसित हो रही है जो किसी भी तरह शांति व सदभाव के लिए सकारात्मक नहीं माना जा सकता है। अब यहां यह प्रश्न उठता है कि नार्वे की घटना किस प्रकार से विस्फोटक है, नार्वे की घटना क्या है, नार्वे की घटना को लेकर मुस्लिम देशों की गोलबंदी के यथार्थ क्या है, नार्वे की घटना को लेकर मुस्लिम देशों की गोलबंदी को क्या इस्लामीकरण की पक्षधर नीति मानी जानी चाहिए, पाकिस्तान जैसे असफल और मुस्लिम आतंकवाद की शरण स्थली बना पाकिस्तान नार्वे के विवाद में क्यों कूदा, क्या पाकिस्तान इस विवाद में कूद कर मुस्लिम आतंकवाद, मुस्लिम अतिवाद को बढावा दे रहा है?
                                      नार्वे में अभी ‘ स्टाॅप इस्लामीकरण आॅफ नार्वे ‘ नामक अभियान और आंदोलन गंभीर रूप से सक्रिय है, यह अभियान और आंदोलन धीरे-धीरे हिंसक हो रहा है और असहिष्णुता को प्रदर्शित कर रहे हैं। नार्वे की स्थिति तो उस समय विस्फोटक हो गयी जब नार्वे के एक शहर में कुरान जलाने की अप्रिय और असहिष्णु घटना घटी। स्टाॅप इस्लामीकरण आॅफ नार्वे अभियान के नेता लार्स थार्सन ने कृश्चयनस्टेंड शहर में सैकडों प्रदर्शनकारियों के सामने कुरान जलाने जैसी अप्रिय घटना को अंजाम दे दिया। कुरान जलाने की घटना के खिलाफ नार्वे की मुस्लिम आबादी भी सक्रिय हो गयी। हम सबों को मालूम है कि मुस्लिम आबादी के लिए कुरान का महत्व कितना है। कुरान का अपमान मुस्लिम आबादी किसी भी परिस्थिति में स्वीकार नहीं करती हैं। दुनिया में जिसने भी कुरान का अपमान किया या फिर इस्लाम के प्रेरक पुरूषों के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणियां की, उसकी बर्बरता से हत्या कर दी गयी। इतिहास में दर्ज घटना के अनुसार इस्लाम पर आधारित कार्टून छापने वाली पत्रिका के पत्रकारों को मार डाला गया, अभी-अभी भारत में घटी एक घटना को भी संज्ञान में लिया जा सकता है। लखनउ के हिन्दू नेता कमलेश तिवारी ने विवादित टिप्पणी की थी, उस टिप्पणी को लेकर तत्कालीन अखिलेश यादव की सरकार ने कमलेश तिवारी को रासुका लगा कर जेलों में डाल दिया था। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार में बर्बरता पूर्ण ढंग से कमलेश तिवारी की हत्या हो गयी, हत्या तालिबानी और आईएस की शैली में हुई थी।
                                 कुरान का अपमान करने वाले लार्स थार्सन के खिलाफ भी पूरी दुनिया की मुस्लिम आबादी खडी हो गयी है, लार्स थार्सन को दंडित करने की मांग खतरनाक तौर पर उठी है। कई मुस्लिम देश भी इस विवाद मे कूद चूके है। खासकर तुर्की और पाकिस्तान आग में घी का काम कर रहे हैं। पाकिस्तान में इस घटना को लेकर खतरनाक विरोध शुरू हो गया है। पाकिस्तान में कई प्रदर्शन हो चुके हैं, प्रदर्शन कारी लार्स थार्सन की मौत की मांग कर रहे हैं, फतवे पर फतवे जारी हैं। पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने नार्वे के राजदूत को बुला कर कुरान का अपमान करने वाले लार्स थार्सन पर कार्यवाही करने की मांग ही नहीं की बल्कि चेतावनी भी दी कि ऐसी घटना नार्वे के लिए ठीक नहीं होगी। पाकिस्तान और तुर्की अभी दो ऐेसे देश है जो मुस्लिम दुनिया का नेता बनने के लिए मुस्लिम अतिवाद को न केवल बढावा देते हैं बल्कि मुस्लिम आबादी को आतंकवादी गतिविधियों के लिए प्रेरित करने के लिए इंधन का भी काम आते हैं। पाकिस्तान और तुर्की जैसे देश यह नहीं सोचते कि उनके खतरनाक और विस्फोटक समर्थन से यूरोप में निवास कर रही मुस्लिम आबादी के प्रति असहिष्णुता की खाई बढेगी?
                         इसके विपरीत दुनिया की जनमत और फतवा विरोधी शक्तियां भी सक्रिय हो गयी है, सलमान रूशदी जैसी हस्तियां भी हतप्रभ हैं। सलमान रूश्दी जैसी हस्तियो की चिंता लार्स थार्सन के सुरक्षित जीवन को लेकर है। एक विचार यह भी सक्रिय हो रहा है कि आखिर लार्स थार्सन ने ऐसी घटना को अंजाम देने के लिए बाध्य क्यों हुए हैं, ऐसी स्थितियां तो रातो रात उत्पन्न नहीं हुई, ऐसी स्थितियों के लिए किसी न किसी रूप से मुस्लिम आबादी भी जिम्मेदार है। नार्वे की यह आग ब्रिटेन और जर्मनी जैसे देशों तक पहुंच रही है। देशज शक्तियां भी इस्लामीकरण के खिलाफ गोलबंदी शुरू कर रही हैं। अगर ऐसा हुआ तो फिर यूरोप की स्थिति कितनी भयानक होगी, इसकी कल्पना की जा सकती है। एक तरफ मुस्लिम आबादी होगी तौर दूसरे तरफ ईसाई आबादी होगी। दोनों आबादी एक-दूसरे के खिलाफ मार-काट पर उतारू हो सकती है।
                                सिर्फ नार्वे की ही बात नहीं है बल्कि पूरे यूरोप की बात है। यूरोप का अति मानववाद अब गंभीर दुष्परिणम भुगतने की कसौटी पर खडा है। अति मानवतावाद के चक्कर में यूरोप की संस्कृति खतरे में हैं। यूरोप ने विगत में यह सोचा-समझा ही नहीं कि वे जिस आबादी का स्वागत कर रहे हैं वह आबादी उनके अस्तित्व और उनकी अस्मिता के लिए ही भस्मासुर बन जायेगी। मुस्लिम शरणार्थी सिर्फ स्वयं ही नहीं आते हैं बल्कि अपने साथ फतवा और कट्टरता की संस्कृति भी लेकर आते हैं, ऐसी आबादी जब तक कमजोर होती है तब तक इन्हें लोकतंत्र चाहिए, इन्हें शांति चाहिए। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब ऐसी आबादी अपने आप को सपूर्ण तौर पर शक्तिशाली समझ लेती है और लोकतंत्र को प्रभावित करने की शक्ति हासिल कर लेती है तब वह शरण देने वाली आबादी और देशों के लिए काल बन जाती है, फिर इन्हें लोकतंत्र नहीं चाहिए, इन्हें तो सिर्फ और सिर्फ मजहबी शासन चाहिए, इस्लामिक देश चाहिए। हर संभव मुस्लिम आबादी और ईसाई आबादी के बीच बढती खाई रोकी जानी चाहिए। यूरोप को इस्लामीकरण और देशज संस्कृति की खतरनाक दीवार नहीं बनने दिया जाना चाहिए।

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Monday, November 11, 2019

वह पागल साढ तो लोकतंत्र का रखवाला था

 


                           राष्ट्र-चिंतन

       भारतीय लोकतंत्र के हीरो थे टीएन शेषणवह पागल साढ तो लोकतंत्र का रखवाला था


        विष्णुगुप्त



टीएन शेषण की मृत्यु पर मीडिया और राजनीतिक हलकों में सीमित जगह ही क्यों मिली, क्या उन्हें विशेष जगह नहीं मिलनी चाहिए थी, उनकी लोकतात्रिक सुधार की वीरता पर विस्तृत चर्चा नहीं होनी चाहिए थी? देश की वर्तमान पीढी को यह नहीं बताया जाना चाहिए था कि टीएन शेषण की लोकतांत्रिक वीरता क्या थी, लोकतंत्र को उन्होंने कैसे समृद्ध बनाया था, वोट के महत्व को उन्होने कैसे समझाया था, वोट लूट को उन्होंने कैसे रोका था, बूथ कब्जा की राजनीतिक संस्कृति को उन्होंने कैसे जमींदोज की थी, लोकतंत्र का हरण कर राजनीतिक सत्ता पर विराज मान होने वाले लठैत-अपराधी किस्म के राजनीतिज्ञों की आंख के किरकिरी वे कैसे बने थे, फिर भी वे हार नही मानी थी, आज चुनाव सुधार की जितनी भी प्रक्रिया चल रही है, आज चुनाव सुधार के जितने भी कानून अस्तित्व में आये हैं, उसकी बुनियाद में टीएन शेषण की ही वीरता रही है। उसके पूर्व चुनाव आयोग को रीढविहीन, दंत विहीन संस्थान का दर्जा प्राप्त था, जिसके पास न तो कोई विशेष अधिकार थे और न ही चुनाव आयोग के सिर पर पर बैठे अधिकारियों की कोई अपनी पैनी दृष्टि होती थी, ये सिर्फ और सिर्फ सरकार के गुलाम के तौर पर खडा होते थे, सरकार की इच्छाओं को ही सर्वोपरि मान लेते थे। खास कर सत्ता धारी दल यह नहीं चाहता था कि चुनाव आयोग रीढशील बने, दंतशील बने, अगर ऐसा होता तो फिर सत्ताधारी दल के लिए फिर से सत्ता में लौटने की सभी आशाएं चुनाव से पूर्व ही समाप्त हो जाते। हथकंडों को अपना कर चुनाव जीतना सत्ताधारी पार्टी का प्रमुख राजनीतिक एजेंडा होता था। हथकंडों में विरोधी वर्ग और विरोधी क्षेत्रों में वोटर पंजीकरण में धांधली कराना, फर्जी वोटर पंजीकरण कराना, बुथ कब्जा कराना और कमजोर वर्ग के लोगों को मतदान केन्द्रों से दूर रहने के लिए षडयंत्र रचना शामिल थे।
                                        टीएन शेषण ने गुमनामी में शेष जिंदगी क्यों गुजारी, यह भी एक प्रश्न है? इस प्रश्न पर भी गंभीरता के साथ चर्चा करना जरूरी है। देखा यह गया है कि शीर्ष नौकरशाही के पद पर बैठा शख्त सेवा निवृति के बाद भी गुमनामी मे नहीं जाता है, ख्यात जिंदगी में ही वह सक्रिय होता है, कोई नौकरशाह राज्यपाल बन जाता है, कोई नौकरशाह प्राधिकरणों में जज हो जाते हैं, तो कोई नौकरशाह राज्य सभा और लोकसभा के सदस्य बन जाते हैं। इसके अतिरिक्त भी नौकरशाह खेल खेलते रहते है। कोई नौकरशाह रिलायंस का सलाहकार बन जाता है तो कोई नौकरशाह अडानी का सलाहकार बन जाता है, इनके बनाये संस्थानों का चीफ बन जाता है। इस प्रकार नौकरशाह शेष जिंदगी भी आराम और धाक के साथ गुजारता है। अब यहां यह प्रश्न भी उठता है कि सेवानिवृति के बाद भारत सरकार या फिर राज्य सरकारे भी टीएन शेषण की सेवाएं वैसी जगह क्यों नहीं ली जहां पर उनकी ईमानदारी, उनकी कर्मठता और उनके समर्पण की जरूरत थी और उनकी ईमानदारी, उनकी कर्मठता और उनके समर्पण से आम जनता को लाभ होता, आम जनता को न्याय मिलता? सेवा निवृति के बाद टीएन शेषण एक तरह से गुमनामी की जिंदगी जीने के लिए विवश थे। एक तरह से वे अकेलापन के शिकार थे। वे दिल्ली छोडकर चेन्नई चले गये थे। दिल्ली का पंच सितारा संस्कृति और लूट-खसौट की दुनिया उन्हें पंसद नहीं थी, उनकी ईमानदारी ये सब पंसद नहीं करती थी। चेन्नई में भी वे अकेला ही महसूस करते थे। उनका कोई परिवार नहीं था। उनके बच्चे नहीं थे। परिवार से भी उनका विशेष लगाव नहीं था। शायद उनका अपना कोई आवास भी नहीं था। अनाथालय में वे रहते थे, सेवानिवृति से मिलने वाली अंशराशि से उनका जीवन चलता था। जब आप ईमानदार होंगे, जब आप सिद्धातशील होंगे, जब आप लूट-खसौट की संस्कृति से दूर रहेंगे, किसी को वर्जित ढंग से लाभ नहीं करायेंगे तो फिर आपका इस दुनिया में कोई मित्र भी नहीं होगा, आपको पंसद करने वाला सीमित लोग होंगे। सीमित लोग भी आस पास नहीं होते हैं वे दूर-दूर रहकर ही प्रेरणा लेते हैं। ऐसी श्रेणी के वीर शख्त को भी लोग पागल कह कर अपनानित करते हैं। लूटेरे वर्ग और राजनीतिक हलका भी टीएन शेषण को पागल ही कहा करते थे।
                                           लेकतांत्रिक सेनानी होने के कारण मैंने ही नहीं बल्कि टीएन शेषण की वीरता को देखने वाली पीढी यह जानती थी कि लोकतांत्रिक पद्धति हमारी कितनी दुरूह और मकडजाल और फेरब से भरी पडी थी। कमजोर वर्ग चुनाव लडने का साहस नही कर सकता था, चुनाव पर बडे लोगों, बडी जातियों, धन पशुओं और अपराधियों का राज रहता था, ये जिसे चाहते थे वही चुनाव लड सकते थे, इनकी इच्छा के बिना कोई चुनाव नहीं लड सकता था। कोई चुनाव लडने का साहस करता तो उसकी हत्या होती , उसके प्रताडना निश्चित था, नामंकन प्रक्रिया को दोषपूर्ण ठहरा कर नामंकन रद करा दिया जाता था। सबसे बडी बात यह थी कि दलित, आदिवासी और कमजोर जातियों के क्षेत्र में मतदान प्रक्रिया में अपराधी हावी होते थे, बूथ कब्जा आम होता था। दलित, आदिवासियों और कमजोर जातियों को वोट देने के अधिकार से वंचित कर दिया जाता था। सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि चुनाव जीत चुके उम्र्मीदवारों को भी चुनाव जीतने के प्रमाण पत्र मिलने के पूर्व हेराफेरी में हरा दिया जाता था और हारे हुए प्रत्याशी को जीता दिया जाता था। इस अपराध क्रम की कहीं कोई सुनवाई नहीं होती थी, न्यायिक प्रक्रिया लंबी होने के कारण सब बअर्थ हो जाती थी। लोमहर्षक बात यह थी कि चुनाव कर्मचारी बेलगाम होते थे, उनकी मर्जी ही चुनाव नियम होती थी। इनकी मर्जी अनियंत्रित हुआ करती थी। इनके खिलाफ सुनवाई कहीं नहीं होती थी। केन्द्रीय चुनाव पूरे देश में एक ही दिन हुआ करते थे, राज्य चुनाव भी एक ही दिन हुआ करते थे। ऐसी स्थिति में चुनाव सुरक्षा नाम की कोई चीज नहीं हुआ करती थी।
                                    टीएन शेषण ने चुनाव आयुक्त के पद पर बैठते ही अपनी वीरता दिखायी। खास कर बिहार के जातिवादी राजनीति के उदाहरण लालू प्रसाद यादव से टकरा बैठे। उन्होने बिहार में चुनाव अधिकारियों को अपने हथियारों का डर दिखाया, पक्षपात करने पर दंड के भागीदार बनाने का हस्र दिखाया, कई चरणों में चुनाव प्रक्रिया करने की नियम बना डाला। कई चरणों में चुनाव होने की खबर सुनते ही बिहार ही क्यों देश भर में तहलका मच गया। लालू अपने व्यवहार के अनुसार प्रतिक्रिया दी थी, लालू ने कहा था कि इ शेषणवा पगला गया है, इ शेषणवा पागल सांढ हैं, इस पागल साढ को हम पकड कर कमरे में बंद कर देंगे या फिर गंगा में बहा देगे। पर टीएन शेषण पर इसका कोई प्रभाव नहीं पडा। टीएन शेषण ने चुनाव प्रक्रिया के दौरान अपराधियों को जेल भेजवाने का फरमान सुना दिया, चुनाव प्रक्रिया के दौरान अधिकारियों का स्थानंतरण या पदोन्नति को रोक दिया। लालू ही नहीं बल्कि अनेकानेक राजनीतिज्ञ टीएन शेषण के चुनाव सुधार दंड प्रक्रिया के शिकार हुए थे। हिमाचल प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल गुलशेर अहमद को अपना इस्तीफा सौंपना पडा था। उनका दोष था कि वे चुनाव के दौरान मध्य प्रदेश के सतना जाकर अपने पुत्र के लिए चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश की थी। राजनीतिज्ञ और केन्द्रीय मंत्री रहे कल्पनाथ राय को भी टीएन शेषण का कोपभाजना बनना पडा था। उस दौरान राजनीति में टीएन शेषण भयभीत करने वाले शख्त के तौर पर विराजमान थे। राजनीति में एक चर्चा आम थी कि राजनीतिज्ञ सिर्फ भगवान और टीएन शेषण से ही डरते हैं। एक नौकरशाह के रूप में भी उनकी ख्याति गजब की थी। मंत्री उनसे पीछा छुडाना चाहते थे और उनके अंदर काम करने वाले अधिकारी व कर्मचारी मुक्ति का मार्ग तलाशते थे।
                           हमें घोर आश्चर्य है कि टीएन शेषण की सेवाएं सरकारें उनकी सेवानिवृति के बाद भी क्यों नहीं ली उनकी सेवाएं ली जानी चाहिए थी। खास कर देश की अकादमियां उनकी सेवा ले सकती थी। टीएन शेषण देश की भावी पीढी को सजग, कर्मठ और ईमानदार बनाने की शिक्षा दे सकते हैं, उन्हें प्रेरक राह दिखा सकते थे। दुखद यह है कि उन्हें गुमनामी में जिंदगी गुजारने के लिए छोड दिया गया। अगर हम ईमानदारी और कर्मठता का सम्मान नहीं करेंगे तो फिर देश में भ्रष्टचार, बईमानी और वर्जित कार्य की बढती प्रवृति को कैसे रोक पायेंगे? यह एक यक्ष प्रश्न है। टीएन शेषण की लोकतांत्रिक वीरता को बच्चों के पाठय पुस्तक में शामिल किया जाना चाहिए।

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Thursday, November 7, 2019

भाजपा के पैरासूट नेताओं ने झारखंड को तबाह किया

 
राष्ट्र-चिंतन

भाजपा के पैरासूट नेताओं ने झारखंड को तबाह किया
 

     विष्णुगुप्त





झारखंड राज्य भाजपा की देन है, सर्वाधिक समय तक सत्ता की चाभी भाजपा के हाथों में रही है, इसलिए यह कहना सही होगा कि झारखंड को एक विकसित राज्य बनाना, झारखंड के नागरिको के भविष्य को सुंदर और प्रेरणादायी बनाना, वनांचल आंदोलन के महारथियों व संघर्षरत योद्धाओं का सम्मान करना ,खनिज संपदाओं का अंधाधुध दोहन रोकना, पर्यावरण की सुरक्षा करना, भ्रष्टचार का दमन करना, मूल निवासियों के अधिकारों और हितों को संरक्षित करने जैसै जिम्मेदारियां भाजपा की ही थी। अब यहां यह प्रश्न खडा किया जाना चाहिए कि भाजपा इन सभी जिम्मेदारियों का निर्वाहन ईमानदारी और वैज्ञानिक तथा नैतिकता की कसौटियों पर किया है या नहीं? अगर नहीं तो फिर भाजपा अंनत काल तक सत्ता में रहने की वीरता कैसे और क्यों दिखाती रहेगी?
                          निश्चित तौर पर झारखंड एक पूर्ण विकसित राज्य नहीं बन सका है, आदर्श और प्रेरक राज्य भी नहीं बन सका। मूल निवासियों की कल्पना-इच्छा की कसौटी पर झारखंड की कोई अच्छी तस्वीर खडी नहीं हुई है, विकास एक छलावा है, भ्रमित करने वाला है, झारखंड में बाहरी संस्कृति की घुसपैठ खतरनाक तौर पर हुई है, बाहरी संस्कृति का अर्थ झारखंड की मूल संस्कृति की घेराबंदी, लुटेरी संस्कृति का खतरनाक तौर पर उपस्थिति, भ्रष्टाचार का बोलबला, भष्टचार से आम जीवन का त्राहीमाम करना, झारखंड के मूल निवासियों का जीवन कठिन बना कर लहूलुहान करना, नौकरशाही को शासक का रूप देना, खनिज संपदाओं का अंधाधुध दोहन करना, झारखंड के खनिज संपदाओं की तस्करी को संरक्षित करना, जैसे अनेकानेक वर्जित कार्यों को प्राथमिकता मिली है।
लोमहर्षक,खतरनाक व तेजाबी संस्कृति का राजनीतिक प्रत्यारोपण है। बाहरी और पैरासूट नेताओं को सत्ता और पार्टी संगठन के केन्द्र विन्दु मे उपस्थित करना, प्रत्यारोपित करने का खेल खेला गया। इस खेल ने सबसे ज्यादा नकरात्मक प्रभाव झारखंड के मूल नेताओं पर पडा। सत्ता और पार्टी के केन्द्र में लुटरी और बाहरी तथा पैरासूट संस्कृति के नेताओं के प्रत्यारोपण के कारण झारखंड के मूल नेताओ की ईमानादारी, नैतिकता, कर्मठता और समर्पण निरर्थक बन गयी, उनकी राजनीतिक संभावनाओं को पूर्ण अवस्था में पहुंचने से पूर्व ही निरर्थक बना दिया गया, एक साजिश पूर्ण राजनीतिक कुकृत्य है। झारखंड की सत्ता पर इनके कब्जे स्पष्ट तौर देखा जा सकता है।
झारखंड-वनांचल आंदोलन में एक पर एक नेता थे जो ईमानदारी, कर्मठता और देशज संस्कृति के वाहक थे, जिन्होंने अलग झारखंड राज्य बनवाने में अपनी भूमिका निभायी थी। पर दो तरह के संकटों ने झारखंड और वनांचल आंदोलन के नेताओ को निरर्थक बनाया है। झारखंड आंदोलन के जो नेता थे, वे आपसी फूट के शिकार हो गये, भ्रष्टचार के आंकठ में डूब गये, वंशवाद के आंकठ में डूब गये। भ्रष्टचार के आरोप में शिबू सोरेन बार-बार जेल गये। मुख्यमंत्री रहते हुए शिबू सोरेन विधान सभा के चुनाव हार गये। शिबू सोरेन को उंचाइयों तक पहुंचाने वाले सूरज मंडल वंशवाद के मोह में निपटा दिये गये। शिबू सोरेन ने अपने बेटों के कारण सूरज मंडल को पार्टी से निकाल कर हाशिये पर चढा दिया। दुष्परिणाम यह हुआ कि सूरज मंडल तो निपट ही गये, इसके साथ ही साथ शिबू सोरेन का परिवार और झारखंड मुक्ति मोर्चा भी अपनी पुरानी शक्ति से हाथ धो बैठे। फलस्वरूप झारखंड की राजगद्दी पर भाजपा को बार-बार बैठने का अवसर प्रदान हुआ।
                                जहां तक भाजपा के मूल नेताओं की बात है तो उन्हें भाजपा के केन्द्रीय कृत और झारखंड की लुटेरी मानसिकता से ग्रस्त नेताओं ने ही निरर्थक और कमजोर बना कर हाशिये पर खडा कर दिया गया। कडिया मुंडा जैसे वरिष्ठ, ईमानदारी और राजनीति में विरले नेता को छोडकर , उन्हें दरकिनार कर बाबू लाल मरांडी को प्रथम मुख्य मंत्री बना दिया गया? कडिया मंुडा जैसे वरिष्ठ, ईमानदार और राजनीति के प्रेरक पुरूष को नजरअंदाज क्यों किया गया, उन्हें हाशिये पर क्यों ढकेला गया, उनकी प्रशासनिक और देशज संस्कृति की विशेषज्ञता क्यों नहीं सत्ता का साथ मिला ? इस प्रश्न का कोई जवाब आज की राजनीति में कोई खोजने की कोशिश ही नहीं करता? सच्चाई बडी ही खतरनाक है, साजिश की सुई भाजपा के बिहारी संस्कृति के नेताओं और भाजपा के केन्द्रीयकृत नेताओ की ओर घूमती है। बिहार से जब झारखंड अलग हुआ था तब भी बिहार के नेताओं ने अपनी लुटेरी मानसिकता को जारी रखने के लिए न केवल साजिश रची थी बल्कि मकडजाल भी बूने थे। इसकी पीछे की कहानी भी कम राजनीतिक लोमहर्षक नहीं है। भाजपा की बिहारी संस्कृति के नेताओं और केन्द्रीय नेताओं ने यह सोच विकसित की थी कि अगर झारखंड की सत्ता पर कोई मूल संस्कृति के समर्पित नेता या फिर कडिया मुंडा जैसे नेता की ताजपोशी हुई तो फिर उनकी लुटेरी मानसिकताएं जमीन पर नहीं उतर सकती हैं? झारखंड के पर्यावरण और खनिज संपदाओं के दोहन करने का अवसर नहीं मिलेगा, टाटा जैसी तमाम निजी कंपनियों की लूट की संस्कृति जारी नहीं रखी जा सकती है। इसी उददेश्य से बाबू लाल मरांडी की ताजपोशी हुई थी और कडिया मुंडा जैसे नेताओं को सत्ता से दूर रखा गया था। बाद में बाबू लाल मरांडी की कहानी भी सबके दृष्टांत में है ही। एक समय भाजपा में इन्दर सिंह नामधारी जैसे नेताओं की धाक होती थी जो भाजपा से बाहर जाने के लिए विवश हुए थे।
                                  भाजपा की सत्ता और पार्टी पर विराजमान प्रथम श्रेणी के नेताओं का आकलन कर लीजिये, आपको ज्ञात हो जायेगा कि झारखंड के साथ कितना अन्याय हुआ है और झारखंड की आज तो दुर्गति है, झारखंड देश का सबसे प्रेरक और आदर्श स्टेट क्यों नहीं बन पाया, इसकी पूरी कहानी, पूरी साजिश और पूरी लुटेरी मानसिकताएं आपको समझ में आ जायेगी? आज स्थिति यह है कि भाजपा में या तो मोहरे संस्कृति के नेता है या फिर बाहरी यानी पैरासूट संस्कृति के नेता है। अर्जुन मुंडा को मुख्यमंत्री बनाया गया था और आज केन्द्र में अर्जुन मुंडा मंत्री भी है, पर उनका वनांचल आंदोलन में कोई भूमिका नहीं थी, भाजपा को गांव-गांव तक ले जाने में उनकी कोई भूमिका नहीं थी, ये झारखंड मुक्ति मोर्चा में थे और दलबदल कर भाजपा में आ गये। झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास बाहरी है, ये जमशेदपुर में टाटा कंपनी में नौकरी करने आये थे और भाजपा के शिखर तक पहुंच गये। सरयू राय की कहानी और भी राजनीतिक बर्बर है, सरयू राय एक समय लालू के किचन कैबिनेट के सदस्य हुआ करते थे, ये भाजपा विरोधी थे, बिहारी संस्कृति के बाहुबली है। सरयू राय अचानक बिहार छोड कर झारखंड की राजनीति में आ गये, झारखंड की जातीय और झारखंड की लुटेरी मानसिकताओं पर सवार लोगों ने सरयू राय को चमका दिया। आज सरयू राय की झारखंड की राजनीति में मजबूत और सत्ता निर्धारण में भूमिका निभाने वाले नेता के रूप में गिनती होती है, बिहार में यही सरयू राय कोई चुनाव जीतता या नहीं पर आज झारखंड में इनकी धाक है।
                           झारखंड की मूल राजनीतिक संस्कृति की कसौटी पर भाजपा के सांसदों और विधायकों की पृष्ठभूमि जांच कर लीजिये, राजनीतिक लोमहर्षक कहानियां सामने आयेंगी। अनेकानेक झारखंड के भाजपा सांसद और विधायक बाहरी है। उदाहरण देख लीजिये। पलामू से सांसद बीडी राम मूल रूप से कांग्रेसी और बाहरी हैं, गोडा से सांसद निशिकांत दुबे, रांची से सांसद संजय सेठ, हजारीबाग के सांसद यशवंत सिंन्हा का बेटा, धनबाद का सांसद पशुपति नाथ सिंह, चतरा के सांसद सुनील सिंह, आदि बाहरी हैं। झारखंड में भाजपा को स्थापित करने वाले सूरज मनि सिंह, प्रवीण ंिसंह श्रवण कुमार, निर्भय कुमार सिंह जैसे सैकडो नेता आज हाशिये पर खडे हैं, इन्हें कभी विधायक और सांसद बनने का अवसर ही नहीं दिया गया। पार्टी के लिए चंदाखोरी करने वाले नेता गुलशन आजमानी भी गुमनामी में कैद हैं।
                            झारखंड राज्य बनाने का जो उद्देश्य था वह तो शायद अब कभी पूरा होगा? अगर झारखंड की सत्ता पर
झारखंड के लिए लडने वाले शिबू सोरेन जैसे नेता अपनी ईमानदारी नहीं छोडते और वीरता के साथ समर्पण प्रदर्शित करते रहते तो फिर झारखंड में भाजपा के बाहरी और पेरासूट नेताओं की सत्ता पर पहुंच बन ही नहीं सकती थी। झारखंड आंदोलनकारियों की विफलता और बईमानी ने भाजपा के बाहरी और पैरासूट नेताओं को झारखंड लुटने की गारंटी प्रदान की है। इसका दुष्परिणाम तो झारखंड आंदोलन के नेताओं ने भी झेला है। आज झारखंड मुक्ति मोर्चा स्वयं के बल पर सत्ता स्थापित करने की शक्ति ही प्रदान नहीं कर सकता है। आजसू भाजपा के पिछलग्गू बन गया। बाबू लाल मरांडी टिटही पंक्षी की तरह खुशफहमी के शिकार हो गये, बाबू लाल मरांडी लोकसभा से लेकर विधान सभा चुनाव हार गये पर अभी भी बाबू लाल मरांडी स्वयं के बल पर झारखंड की सत्ता पर स्थापित होने का दुस्वपन देखना बंद नहीं किये है।
                           भाजपा भी दीर्धकालिक तौर पर झारखंड की जनता को मूर्ख नहीं बना सकती है, जनता को लोकलुभावन नारे के साथ ही साथ विकास और उन्नति भी चाहिए। हिन्दुत्व हमेशा सत्ता की चाभी नही बन सकता है। नरेन्द्र मोदी का चमत्कार तो लोकसभा चुनाव में चल सकता है पर विधान सभा चुनावों में नरेन्द्र मोदी के चत्मकार की बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं होनी चाहिए। विकास और उन्नति की कसौटी पर भाजपा का भुतहा चेहरा ही है। विकास और उन्नति के नाम पर सिर्फ भवन खडे कर दिये गये हैं, सरकारी कर्मचारी और नौकरशाही जनता के लिए यमराज बन गये हैं। शिक्षा की स्थिति चैपट है, स्कूल हैं पर शिक्षक पढाने जाते नहीं हैं, अस्पताल है पर डाॅक्टर बैठते नहीं, पूरा वन विभाग है पर वन का सर्वानाश हो चुका है, खनिज संपदाओं के लिए निजी सेना खडी कर दी गयी है, खनिज संपदाओं की लूट रोकने वालों को देशद्रोही बनाकर जेलों में डाल दिया जा रहा है, झारखंड के निवासी होने के बावजूद इस तरह के संघर्षरथियों को झारखंड में रहने पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है।
                         आंदोलन से सत्ता जब कोई निकलती है, आंदोलन से जब कोई राज्य निकलता है तो फिर सत्ता की चाभी आंदोलनकारियों के हाथो में ही होनी चाहिए। झारखंड राज्य आंदोलन की उपज है पर झारखंड राज्य की स्वतंत्र चाभी आंदोलनकारियों के हाथों में नहीं रही है। अगर भाजपा में कडिया मुंडा जैसे नेता हाशिये पर खडे नहीं होते और झारखंड में भाजपा को स्थापित करने वाले नेताओं को साजिशपूर्ण ढंग से जमींदोज नहीं किया गया होता तो फिर आज झारखंड राज्य की तस्वीर कुछ अलग ही होती। झारखंड के पास देश के अनुपातिक तौर पर 46 प्रतिशत मिनरल है, यहां के खनिज और वन पर पूरा देश राज करता है, झारखंड अपने पैसों से एक आदर्श और प्रेरक राज्य बन सकता था। अगर भाजपा फिर भी मूल संस्कृति को खारिज करती रहेगी, मूल नेताओं को हाशिये पर भेजती रहेगी तो फिर भाजपा अंनत काल तक सत्ता की चाभी हासिल करने की वीरता नहीं दिखा सकती है।


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VISHNU GUPT
COLUMNIST
NEW DELHI
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