Monday, June 29, 2020

चीन समर्थक जयचंदों की गर्दन मरोडो

राष्ट्र-चिंतन
देशद्रोहियों की उगती जहरीली फसल/ बाहरी दुश्मनों से नहीं बल्कि आतंरिक दुश्मनों, जयचंदों और देशद्रोहियों से ही देश तबाह होता है/ विदेशी धन लेने के कानून कडे कर देने चाहिए/दुश्मन देश से धन लेना अपराध माना जाना चाहिए/ आतंरिक जयचंदों के संहार का यह सही समय है।

          चीन समर्थक जयचंदों की गर्दन मरोडो

         विष्णुगुप्त


हर देश में देशद्रोहियों की उगती फसल पर कानून का डंडा चलता है, देशभक्ति के लिए खतरनाक माना जाता है, पर भारत ऐसा अकेला देश है जहां पर देशद्रोहियों और जयचंदों पर कानून खामोश ही रहता है, राजनीति उदासीनता का चादर ओढी रहती है, इतना ही नहीं बल्कि देशद्रोहियों और जयचंदों की फौज सरेआम-खुलेआम देश हित को लहूलुहान करने से बाज  नहीं आते है। देशद्रोहियों की जहरीली फसल किस प्रकार से हमारे देश में उगती है, देशहित को नुकसान करती है, देशहित को अपमानित कराती है, देश को एक खूंखार व संहारक के तौर पर स्थापित करती है, देश की सुरक्षा को खतरे में डालती है,दुश्मन देश के हित को साधती है, दुश्मन देश की उंगलियों पर नाचती है, फिर भी ऐसी जमात शान से रहती है, देश का कानून उस पर हाथ तक नहीं डाल पाता है, राजनीति सिर्फ अपनी गोटियां सेकती रहती है और अततः आरोपों-प्रत्यारोपों में यह प्रसंग दब कर रह जाता है।      
                               जयचंदों और देशद्रोहियों की राष्टविरोधी करतूतें बहुत ज्यादा है, इनकी फेहरिस्त भी बहुत लंबी है, दुश्मन देश को लाभार्थी बनाने के भी अनेकानेक उदाहरण है। कुछ उदाहरण बहुत ही चिंताजनक है और राष्टकी संप्रभुत्ता को चोट पहुंचाने वाले हैं। उदाहरणों को जानकर आप भी आश्चर्य में पड़ जायेंगे और यह सोचने के लिए विवश होंगे कि ये पार्टियां, क्या ये राजनीतिज्ञ, क्या ये हस्तियां देशहित को बलि चढा कर खुश क्यों होती है, क्या इन्हें देशहित को बलि देने के लिए पाला-पोशा गया, लोकतत्र में बढ़ने का अवसर दिया गया है? खासकर हस्तियां की बात छोड़ भी दे, क्योंकि हस्तियां तो बिकती ही रहती हैं, पर जब राजनीतिक पार्टियां जो देश की सुरक्षा और देश के विकास की बुनियाद पर खड़ी होती है और ऐसी राजनीतिक पार्टियों को जनता इसलिए लोकतांत्रिक पद्धति में शक्ति प्रदान करती है ताकि वदेश की सुरक्षा सुनिश्चित हो और देश दुनिया में चमकते रहे तथा खासकर दुश्मन देशों को सबके सिखाते रहें। पर जनता की यह आशा राजनीतिक पार्टियां लगातार और सरेआम तोड़ती रहती हैं।
                              उदाहरण शरद यादव के घर का है। नेपाल के तत्कालीन प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टाराई भारत दौरे पर आये थे। बाबूलाल भट्टाराई नेपाल की माओवादी सरकार का नेतृत्व कर रहे थे और वे खुद माओवादी रहे हैं, पुष्पकमल दहल प्रचड के बाद दूसरे नंबर के नेता रहे हैं। बाबूराम भट्टाराई के भारत दौरे पर शरद यादव ने अपने दिल्ली स्थित आवास पर एक स्वागत समारोह का आयोजन किया था। उस स्वागत समारोह में तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार के कई मंत्री, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मोतीलाल बोरा, जर्नादन द्विवेदी, मोहन प्रकाश, तत्कालीन विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज और मुरली मनोहर जोशी सहित कम्युनिस्ट नेता प्रकाश करांत और अमरजीत कौर भी उपस्थित थे। शरद यादव और कांग्रेस तथा भाजपा के नेताओं ने बाबूराम भट्टाराइ्र के स्वागत में देशहित का पूरा ख्याल रखा और नेपाल के साथ प्राचीन संबंध पर गर्व भी किया। पर जैसे ही प्रकाश करांत को बोलने का अवसर दिया गया वैसे ही प्रकाश करांत ने भारत हित के खिलाफ बोलना शुरू कर दिया। प्रकाश करांत का कहना था कि भारत नेपाल के हित का दमन कर रहा है, भारत का व्यवहार उपनिवेशवादी है, भारत नेपाल को अस्थिर करना चाहता है। प्रकाश करांत के इस वकत्व्य को सुन कर कांग्रेस और भाजपा के नेता ही नहीं बल्कि उपस्थित पत्रकार और अन्य राजनीतिज्ञ भी दंग थे। जब बोलने समय बाबूराम भट्टाराई का आया तो उन्होंने ऐसी कोई बात नहीं कि जिससे भारत की छवि एक उपनिवेशवादी की बनती है, उन्होंने कहा कि भारत मेरा बड़ा भाई है, हम साथ-साथ रहकर आगे बढेंगे। दूसरा उदाहरण अभी के नेपाल के प्रधानमंत्री ओपी शर्मा ओली के साथ का है। उस समय ओपी शर्मा ओली नेताल कम्युनिस्ट पार्टी के बड़े नेता थे। वे भारत नेपाल मैत्री पर आयोजित एक विचार संगोष्ठी में दिल्ली आये थे। प्रकाश करांत का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की नेता अमरजीत कौर भी भारत के खिलाफ बोलने और नेपाल को पीडि़त होने का आरोप जड़ दिया। ओपी ओली की मुस्कान उस समय देखने वाली थी। ओपी ओली की समझ यही रही होगी कि जो काम वे नहीं कर सकते थे वह काम तो भारत के नेता ही कर रहे हैं। जब चीन ने 1962 हमले में किये थे तब भी कम्युनिस्ट नेताओं ने चीन को आक्रमणकारी मानने से इनकार कर दिया था। आज तक कम्युनस्टि पार्टियां यह नही मानती हैं कि चीन ने 1962 पर हमला किया था बल्कि भारत को ही हमलावर मानती हैं।
                                      अभी-अभी चीन और नेपाल ने जो पैंतरेबाजी दिखायी है, भारत की सीमा का अतिक्रमण किया है, घोखे से हमारे सैनिकों का नरसंहार किया, हमारी सीमा भूमि पर कब्जा किया है, इस पर भी कम्युनिस्टों ही नहीं बल्कि अनेकानेक देशद्रोहियों की चीन की भाषा में बोलने के उदाहरण सामने आये हैं। एक टीवी चैनल के बहस में बड़े कम्युनिस्ट नेता सुनीत चौपडा ने सीधे तौर पर भारत को ही खलनायक बना दिया और कह दिया कि भारत ही चीन पर ज्यादती कर रहा है, पीडि़त चीन है, भारत पिछलग्गू बन कर अमेरिका का काम कर रहा है। अधिकतर कम्युनिस्ट नेता यह कहते हैं कि भारत अमेरिका के पक्ष में जाकर चीन के खिलाफ साजिश कर रहा है। इनकी भाषा के अनुसार हमें अमेरिका के साथ रिस्ते नहीं रखने चाहिए। क्या हम चीन का गुलाम है? क्या हमारी अपनी कोई स्वतंत्रता नहीं है? क्या हम अपने हितों का बलिदान देकर चीन का गुलाम बन जायें? 1962 में भी चीन ने इसी तरह की मानसिकता से आक्रमण किया था कि भारत अमेरिका के साथ दोस्ती क्यों बढा रहा है। हमारा जिससे हित सधता है उससे हमारी दोस्ती होगी। हम चीन के डर से कब तक अपनी स्वतंत्र और निडर सुरक्षा की व्यवस्था के साथ समर्पण करते रहेंगे। अगर ये बातें कम्युनिस्ट जमात और अन्य देशद्रोही जमात से पूछेगे तब भी ये चीन की भाषा ही बोलेंगे।
                                   कांग्रेस और राजीव गांयाी फाउडेशन का प्रसंग भी देश की जनता की चिंताओं को बढ़ाया है और यह विचार को मजबूत किया है कि असली दुश्मन और भेदिया तो घर में बैठे हुए हैं। कांग्रेस और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के बीच समझौते की बात सामने आ चुकी है। समझौतों की शर्ते क्या हैं? समझौतें की शर्ते जगजाहिर होनी चाहिए। कांग्रेस को समझोते की शर्ते को उजागर करनी चाहिए। सबसे बड़ी चिंता की बात राजीव गांधी फाउंडेशन को लेकर है। यह संस्थान अब तो अपनी छवि खो चुकी है, इस संस्थान की देशभक्ति पर आंच आ चुकी है। यह फाउडेशन अपनी वार्षिक रिपोर्ट में चीन से धन लेना खुद स्वीकार किया है। धन की राशि भी बहुत बडी है। कोई एक बार नहीं बल्कि कई बार चीन से धन मिले हैं। राजीव गांधी फाउडेशन को 90 लाख डॉलर का चीनी फंड मिला था। दुश्मन देश अपने हित साधने और अपने पक्ष में हवा बनाने के लिए पैसा पानी की तरह ही बहाते हैं। जनता को दिग्भ्रिमित करने के लिए तरह-तरह के हथकंडे फैलाते हैं। हथकंडे फैलाने के मोहरे भी इनके वित्तपोषक फांउडेशन और संगठन होते हैं। चीन देश के अंदर में राजीव गांधी फाउडेशन जैसे सैकड़ों संस्थान पोषित कर रखे हैं। ये चीनी पोषक संस्थान इस चीनी करतूत की दौर में भारत हित को ही लहूलुहान और अपमानित करने में लगे हुए हैं।
                                                         आज के कुछ साल पहले गुलाम फई का प्रसंग भी देशद्रोहियों को नंगा किया था, बेनकाब किया था। गुलाम फई आईएसआई का एजेंट था पर वह अमेरिकी नागरिक था। अमेरिकी नागरिक होने के कारण वह भारत विरोधी जिहाद का काम आसानी से कर रहा था। वह हर साल अमेरिका में कश्मीर पर सेमिनार आयोजित करता था। सेमिनार आयोजन का मुख्य उदे्देश्य पाकिस्तान के हित को प्रमुखता के साथ उठाना और पाकिस्तान के आतंकवाद पर पर्दा डालना तथा कश्मीर के अंदर भारत को खलनायक के तौर पर प्रस्तुत करना था। सेमिनार में वह हर साल भारत के बुद्धिजीवियों, पत्रकारों और लेखकों को आमंत्रित करता था और इन पर पैसा पानी की तरह बहाता था। भारतीय बुद्धिजीवी, पत्रकार और लेखक भी मौज करते थे, उनके लिए मनोरंजन की सभी संसाधन उपस्थित किये जाते थे। इसके बदले में ये भारतीय बुद्धिजीवी गुलाम फई की उंगलियों पर नाचते थे, उनके गुलाम बन जाते थे। सेमिनार में ये भारतीय बुद्धिजीवी, लेखक और पत्रकार पाकिस्तान की भाषा बोलते थे, पाकिस्तान के हित साधने वाले, कश्मीर को आजाद करने वाले तथा भारत को मानवाधिकार का घोर हननकारी बताने वाले जैसे प्रस्ताव पारित करने में मदद करते थे। अमेरिकी गुप्तचर एजेंसी सीआईए को जब भनक लगी तब उसने जांच की। जांच आगे जैसे बढी वैसे ही अमेरिकी कानूनो के हनन की बात सामने आयी। गुलाम फई और इनके पेसों पर पलने वाले भारतीय बुद्धिजीवी, लेखक, पत्रकार बेनकाब हो गये। गुलाम फई को अमेरिकी कानून तोड़ने के खिलाफ जेल की सजा हुई। भारत में भी गुलाम फई और पाकिस्तान के हित साधने वाले भारतीय बुद्धिजीवियों, लेखकों व पत्रकारों पर कार्रवाई करने की मांग उठी थी। पर मनमोहन सिंह सरकार ने कार्रवाई करने से इनकार कर दिया था।
                               कोई भी देश बाहरी आक्रमण या फिर बाहरी दुश्मनों से कम और आतंरिक दुश्मनों, देशद्रोहियों व जयचंदों से ज्यादा पीडि़त होता है, कमजोर होता है, भारत भी जयचंदों के कारण बार-बार तबाह हुआ है। इसलिए भारत को असली खतरा देश के जयचंदों से ही है। इसलिए देश के जयचंदो पर कठोर कार्रवाई की जरूरत है। केन्द्रीय सरकार को विदेशी धन ग्रहण करने के कानून कड़े कर देना चाहिए। खासकर दुश्मन देश से धन लेने पर दंड का विधान होना चाहिए। जिस मद् में धन लिया गया उस मदृ में खर्च हुआ कि नहीं, इस पर भी निगरानी होनी चाहिए। आतंरिक दुश्मनों, देशद्रोहियों-जयचंदों पर संहार करने का यह सही समय है। 


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विष्णुगुप्त
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Wednesday, June 24, 2020

तुम्हें कभी नहीं मिलेगी आजादी

कहानी 
*    .     तुम्हें कभी नहीं मिलेगी आजादी   * 
एक नवयौवना को जीवन का मर्म समझाता मेरा यह पत्र
आचार्य श्री विष्णु गुप्त
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......   तुम एक दिन कही थी कि न जाने कब तुम्हे आजादी मिलेगी। मैंने तुम्हे कहा था कि तुम्हे कभी नहीं मिलेगी आजादी।
...... आज न कल तुम्हारी शादी हो जायेगी, शादी या तो तेरे अभिभावकों की मर्जी से होगी या फिर तुम अपनी मर्जी से करोगी
... .  .  शादी के बाद कुछ दिन तक तुम आजाद महसूस जरूर करोगी पर वह समय मनोरंजन काल होगा, मनोरंजन काल अल्प अवधि का होगा, मनोरंजन काल में तुम सिर्फ आजादी महसूस करोगी, आजाद नहीं होगी
...... अनिवार्य परम्परा के अनुसार मनोरंजन अवधि में ही तुम्हारे पति, सास ससुर, समाज की वंशवादी अनिवार्य विचार प्रवृति तुम पर हावी हो जाएगी, तुम उस जकड़न व घेराबंदी में कैद हो जाएगी
.......दुनिया की रीत के अनुसार तुम पर सांसारिक जीवन के दायित्व का बोझ  उत्पन्न होना निश्चित है
....... प्रतिफल तुम मा बनोगी, मा बनने की खुशी तुम्हारे उपर हावी हो जाएगी, बच्चे को ही अपना संसार और अपना जीवन समझ लोगी, अपना सबकुछ बच्चे पर लूटा दोगी
      ...... बच्चे को बड़ा करने और बच्चे को  पढ़ाने, बच्चो को कामयाब बनाने में जिंदगी वृदधावस्था में पहुंच जाएगी
  ......ऐसी अवस्था आने पर मनोरंजन प्रवृति भी समाप्त हो जाती है, जीवन की सभी  इच्छाएं समाप्त हो जाती है, जीवन का उत्साह समाप्त हो जाता, कई बीमारियां आगोश में ले लेती हैं, इसके बाद जिंदगी आश्रित हो जाती है, फिर जिंदगी का कोई मूल्य नहीं बचता है
..... फिर बहू का साम्राज्य स्थापित हो जाता, बहू सास ससुर के लिए सीधे यमराज हो जाती है
..... बच्चे बाहर या विदेश चले गए तो फिर अकेलापन और अवसाद का हमला भी असहनीय पीड़ा देती है, बच्चो को लौटने की आस में वृद्ध आत्माएं तिल तिल कर मरती है
........ सरदार भगत सिंह, मंगल पांडेय, चन्द्रशेखर आजाद, तात्या टोपे , आदि अगर मनोरंजन प्रवृति में फसते, परिवार मोह में डूबते तो फिर क्रांति के सूत्रधार नहीं बनते, प्रेरक नहीं बनते। मै खुद भी इसी श्रेणी में सक्रिय हू।
..... पेट और परिवार पालने वाले लोग कभी भी क्रांति के सहचर नहीं बनते, विश्वसनीय नहीं होते, हमेशा धन और परिवार मोह में वर्जित कार्य के अभियुक्त होते हैं
........   पृथ्वी पर आना न आना किसी कि इच्छा पर निर्भर नहीं करता है, लेकिन पृथ्वी पर आने के बाद अपने अनुसार जीवन संसार बनाया जा सकता है
.......   यह मेरा विचार है, मेरा यह विचार तुम्हारे सिर का बोझ नहीं बनेगा,
.....  मेरी बात सकारात्मक है, मेरी यह बात पेट और परिवार पालने वालो के लिए नहीं है
.....  मेरी यह उक्ति सामान्य रूप से लडको पर भी लागू होती है।
...... *तुम निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हो* 

   ******     तुम्हारी शुभैषी.  *****

,,,,,,,      आचार्य श्री विष्णु गुप्त   ,,,,,,

Monday, June 22, 2020

तिब्बत की आजादी को अचूक हथियार बनाओ

 राष्ट्र-चिंतन
नेहरू और अटल बिहारी वाजपेयी की मूर्खता का दुष्परिणाम है चीन की गुंडई
तिब्बत की आजादी को अचूक हथियार बनाओ
    
       विष्णुगुप्त



तिब्बत  पर नेहरू और अटल की भूलें और कूटनीतिक मूर्खता अब हमारी सीमा की सुरक्षा पर संकट कारण और हमारे जवानों की जानं गंवाने के कारण बन गयी हैं। जवाहरलाल नेहरू पर तो चीन की दोस्ती का भूत सवार था, चीन और पाकिस्तान परस्ती उन पर हावी थी जिसके  कारण उन्होनंे तिब्बत की स्वतंत्रता को अक्षुण नहीं रख सके और तिब्बत पर चीन का कब्जा होने दिया। जब चीन भारत पर आक्रमण कर, हमारी सीमा पर कब्जा करने की साजिश कर रहा था तब उस समय जवाहरलाल नेहरू हिन्दी-चीनी भाई-भाई का नारा दे रहे थे, सीमा की सुरक्षा और सेना की मजबूती उनके एजेंडे से बाहर ही था। नेहरू की गलतफहमी थी कि चीन की कम्युनिस्ट तानाशाह माओ त्से तुग तिब्बत की तरह हमारी सीमा भूमि पर न तो कब्जा करेेगा और न ही हम पर आक्रमण करेगा। माओ त्से तुंग कहा करता था कि सत्ता और शक्ति बन्दूक की गोली से निकलती है, जिसने तिब्बत की आजादी को लहूलुहान कर कब्जा किया था, जिसने तिब्बत पर कब्जा करने के लिए हजारों निहत्थे बौद्ध भिक्षुओं का नरसंहार किया था, बौद्ध धर्म गुरू दलाई लामा को भारत भागने के लिए बाध्य किया था, जिसके लिए शांति और सौहार्द कोई नीति नहीं थी उस पर विश्वास करना ही नेहरू की मूर्खता थी। हमारे लिए नेहरू की मूर्खता कितना घातक, कितना खतरनाक और कितना वीभत्स साबित हुई थी, यह भी उल्लेखनीय है। माओ त्से तुंग ने न कवेल भारत पर आक्रमण किया था बल्कि हमारी 90 हजार वर्ग भूमि पर कब्जा कर लिया था, पांच हजार से अधिक हमारे सैनिकों को मार डाला था। चीन की दादागिरी और गुडई देखिये कि हमारी कब्जाई भूमि को वह छोड़ने के लिए तैयार नहीं है पर वह लद्दाख और सिक्किम-अरूणाचल प्रदेश को भी अपना अंग मानने की धुर्तता करने से बाज नहीं आता है।
                               दूसरी मूर्खता अटल बिहारी वाजपेयी ने की थी। अटल बिहारी वाजपेयी की मूर्खता हमारे लिए बहुत भारी पड़ी है। जवाहरलाल नेहरू के रास्ते पर अटल बिहारी वाजपेयी क्यों चले? नेहरू का हिन्दी-चीनी भाई-भाई की कूटनीति का हस्र वाजपेयी को क्यों नही मालूम था? चीन की विश्वासघाती चरित्र , अटल बिहारी वाजपेयी को क्यों नहीं मालूम था? चीन हमारा असली शत्रू है, यह अटल बिहारी वाजपेयी को क्यों नहीं मालूम था? जबकि पूरा देश यह मानता है कि हमारा असली दुश्मन चीन ही है। अटल बिहारी वाजपयी के मंत्रिमडल में शामिल और तत्कालीन रक्षा मंत्री जार्ज फर्नाडीस बार-बार कहते थे कि हमारा असली दुश्मन पाकिस्तान नहीं है बल्कि असली दुश्मन तो चीन है, चीन से ही भारत को असली खतरा है, पाकिस्तान के आतंकवाद और पाकिस्तान की युद्धक मानसिकता के पीछे चीन ही है। इसलिए चीन पर विश्वास करना भारत को महंगा पडेगा। अब यहां यह प्रश्न उठता है कि तिब्बत के प्रति अटल बिहारी वाजपेयी की कूटनीतिक मूर्खता क्या थी? उनकी कूटनीतिक मूर्खता तिब्बत को चीन का अंग स्वीकार करने की थी। अटल बिहारी वाजपेयी ने 2003 में चीन के साथ एक समझौता किया था उस समझौते में अटल बिहारी वाजपेयी ने तिब्बत पर चीन का अधिकार मान लिया था और यह भी शर्त्र स्वीकार कर ली थी कि भारत भविष्य में कभी-भी तिब्बत की आजादी का प्रश्न नहीं उठायेगा। जब यह समझौता सामने आया था तब देश में हाहाकार मच गया था। राजनीतिज्ञों और सुरक्षा विशेषज्ञों के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गयी थी और इस मूर्खता को देश की सुरक्षा के लिए घातक मान लिया गया था। उस समय तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने यह तर्क दी थी कि चूंकि सिक्किम पर चीन ने भारत का अंग स्वीकार कर लिया है, इसलिए तिब्बत की आजादी का प्रश्न हमनें छोड़ दिया। सिक्किम तो हमारा अभिन्न अंग है। इसलिए इस पर चीन के दावे का प्रश्न ही कहां उठता था? फिर चीन की कारस्तानी देखिये, विश्वासघाती चरित्र देखिये। अब फिर चीन सिक्किम को अपना अंग कहने लगा है।
                                        चीन के खिलाफ तिब्बत का हमारा अचूक हथियार होता था। जब भी चीन हमारे खिलाफ बोलता था, जब भी चीन पाकिस्तान के समर्थन में बोलता था, जब भी चीन अतंर्राष्टीय मंचों पर भारत के खिलाफ बोलता था, चीन जब भी कश्मीर पर पाकिस्तान की भाषा का इस्तेमाल करता था तब भारत तिब्बत की आजादी का प्रश्न उठा कर चीन की बोलती बंद कर देता था। तिब्बत में मानवाधिकार का घोर उल्लंघन का प्रश्न हमारे लिए अति महत्वपूर्ण होता था, तिब्बत में घोर मानवाधिकार हनन का प्रश्न हम दुनिया के सामने लाकर चीन का असली चेहरा दिखा देते थे। तिब्बत की आजादी और तिब्बत का स्वतंत्र आकार हमारे देश की जनता चाहती रही हे। राममनोहर लोहिया और समाजवादी तबका चीन के खिलाफ हमेशा सक्रिच रहते थे और तिब्बत की आजादी का प्रश्न उठाते रहते थे। राममनोहर लोहिया की मृत्यु के बाद जार्ज फर्नाडीस ने तिब्बत की आजादी का मशाल जलाते रहे थे। पर धीरे-धीरे समाजवादियों और गांधी जनों का जातीय और क्षेत्रीय करण होता चलेगा और उनकी मित्रता उस कम्युनिस्ट जमात से हो गयी जिस कम्युनिस्ट जमात ने चीनी आक्रमण और अपने सेनिकों के नरसंहार का समर्थन किया था और माओ त्से तुंग के अपना प्रधानमंत्री माना था, आक्रमणकारी चीनी सैनिकों के समर्थन और स्वागत में बैनर आदि लगाये थे, सिर्फ इतना ही नहीं आयुघ कारखानों में हड़ताल भी करायी थी ताकि भारतीय सैनिकों के पास हथियार न पहुंच सके।
                                   हमारी सरकारों की मूर्खता यहीं तक सीमित नहीं है। मूर्खता और भी हैं। जिनका परीक्षण होना चाहिए। देश की जनता को यह जानना चाहिए कि तिब्बत और चीन की कसौटी पर मूर्खता की एक लंबी फेहरिस्त है। पीवी नरसिंह राव और मनमोहन सिंह की मूर्खता भी बहुत आघात वाली है और अभी-अभी जो हमारे 20 से अधिक सैनिक चीन के हाथों मारे गये हैं उसके पीछे पीवी नरसिंह राव और मनमोहन सिंह की मूर्खता ही है। पीवी नरसिंह राव 1996 में चीन के साथ एक संधि की थी जिसमं लद्दाख के आस-पास सैनिकों के बीच तकरार के समय हथियारों का उपयोग नहीं करने की बात थी। उस समय देश का रक्षा मंत्री शरद पवार थे। इसी तरह की चीन के साथ एक संधि मनमोहन सिंह ने की थी। इन संधिचों के कारण भारतीय सैनिकों के हाथ बंधे हुए थे। जब राहुल गांधी ने प्रश्न दागा था कि भारतीय सैनिकों को हथियारों के उपयोग का आदेश क्यों नहीं दिया गया था। राहुल गांधी के इस प्रश्न का भारत के विदेश मंत्री जयशंकर ने जवाब देते हुए साफ कहा था कि कांग्रेस के राज में 1996 और 2005 में चीन के साथ संधि हुई थी, जिसके कारण भारतीय सैनिक हथियारों का प्रयोग नहीं कर सकते थे। एक तथ्य और भी है। अमेरिका नही चाहता था कि चीन संयुक्त राष्टसंघ की सुरक्षा परिषद का सदस्च बनें। एशिया क्षेत्र से अमेरिका ने भारत को सुरक्षा परिषद का सदस्य बनाना चाहता था, अमेरिका ने पेशकस भी की थी। पर जवाहरलाल नेहरू ने भारत को सुरक्षा परिषद का सदस्य बनाने से साफ इनकार कर दिया था और कहा था कि मेरा बड़ा भाई चीन है, इसलिए चीन को ही सुरक्षा परिषद का सदस्य बनाया जाना चाहिए। अगर भारत आज सुरक्षा परिषद का सदस्य होता तो निश्चित मानिये कि चीन की गुंडई का हम आसान शिकार कभी भी नहीं होते।
                                   चीन ने एक तरह से विश्वासघात किया है, सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि उसने संधि तोड़ी है। नुकीली छडि़यों और घातक रडों से हमला कर हमारे सैनिकों का नरसंहार किया है। ऐसे में हमें भी इन सभी संधियों से हट जाना चाहिए। तिब्बत की आजादी के प्रश्न को अब हमें उठाना ही चाहिए। तिब्बत में घोर मानवाधिकार हनन के प्रश्न को भी उठाना चाहिए। चीन का आईना दिखाना चाहिए तुम हमारी सीमाओं का अतिक्रमण करोंगे और कब्जा करोगे तो फिर हम अपने तिब्बत के अचूक हथियार का भी प्रयोग करेंगे। तिब्बत में बौद्ध भिक्षुओं के शांतिपूर्ण आंदोलन को समर्थन देंगे। लद्दाख के अंदर में हमारे सैनिकों ने जो वीरता दिखायी है वह हमारे लिए गर्व और प्रेरणा की बात है। पहली बार चीन के खिलाफ हमारे सैनिकों ने न केवल तन कर खड़ा हुए बल्कि चीनी सैनिकों को सबक भी सिखाया है। चीन के अगर पांच-दस सैनिक भी मरे होंगे तो फिर यह घटना चीन के लिए सबक देता रहेगा और उसकी यह खुशफहमी भी टूट चुकी है कि भारतीय सैनिक और भारत की सरकार पहले जैसा आत्मसमर्पण कारी होंगे। नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह से सैनिकों को छूट दी है और लद्दाख सहित अन्य क्षेत्रों की सीमा पर सैनिक और हथियारों की तैनाती शुरू की है, वह प्रशंसा की बात है। हमें उम्मीद है कि नरेन्द्र मोदी अब तिब्बत की आजादी का प्रश्न उठा कर चीन की हैकड़ी तोडने का काम करेंगे।
                                             



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