Sunday, June 23, 2019

अंग्रेजी की गुलामी से कब मिलेगी आजादी ?

             
                      राष्ट्र-चिंतन
अंग्रेजी की गुलामी से कब मिलेगी आजादी  ?

            विष्णुगुप्त



त्रिभाषा फाॅर्मूले से केन्द्रीय सरकार पीछे हट गयी। कारण सर्वविदित है। दक्षिण के राज्यों में अति विरोध के स्वर सामने आये, कहीं तमिल तो कहीं कन्नड पर हिन्दी थोपने के आरोप लगे,आरोप लगाने वाले वही राजनीतिज्ञ थे, वही समूह थे जो अंग्रेजी की गुलामी मानसिकता के सहचर रहे हैं, अंग्रेजी की अनिवार्यता और सर्वश्रेष्ठता कायम करने के गुनाहगार रहे हैं, सिर्फ इतना ही नही बल्कि किसी न किसी प्रकार से तमिल और कन्नड जैसी अन्य भारतीय भाषाओं के विकास और अस्तित्व के भी दुश्मन रहे है। दुनिया में कई भाषाओं के फाॅर्मूले और सामंजस्य से राजकाज चलता है, शिक्षा प्रणाली संचालित होती है, न्याय व रोजगार दिया जाता है। संयुक्त राष्टसंघ कोई एक नहीं बल्कि छह भाषाओं में संचालित होता है, इसी तरह यूरोपीय यूनियन तीन भाषाओं में संचालित होती है, स्वीटजरलैंड में चार भाषाएं एक साथ राज करती है, कनाडा जैसे देश दो भाषाओं में संचालित होता है तो फिर भारत त्रिभाषा फाॅमूंले या फिर भारतीय भाषाओं में संचालित क्यों नहीं हो सकता है, जब तुर्की का आधुनिक निर्माता मोहम्मद कमाला पासा रातोरात अपनी संस्कृति निष्ट भाषा को लागू कर गुलामी की प्रतीक अरबी भाषा और अरबी मजहबी कट्टरपंथी संस्कृति से छुटकारा पा सकता है तो फिर भारत गुलामी की प्रतीक अंग्रेजी भाषा  से छुटकारा क्यों नहीं पा सकता है? पर भारतीय राजनीति में कभी भी संस्कृति निष्ट वीरता सामने आती नहीं फिर गुलामी की प्रतीक अंग्रेजी की मानसिकताएं कैसे समाप्त होंगी?
                                   हालांकि केन्द्रीय सरकार के त्रिभाषा फाॅर्मूले से भी अंग्रेजी की अनिवार्यता व सर्वश्रेष्ठता पर कोई आंच नहीं आने वाली थी, इस त्रिभाषा फाॅर्मूले में भी अंग्रेजी के सामने भारतीय भाषाओं की सर्वश्रेष्ठता-अनिवार्यता सुनिश्चित होने वाली नहीं थी। क्योंकि यह फाॅर्मूला अंग्रेजी मानसिकता को दूर करने के लिए नहीं थी। यह सही है कि इस फाॅर्मूले में सिर्फ हिन्दी ही नहीं बल्कि अन्य भारतीय भाषाओ के विकास व संरक्षण की बात जरूर थी। सबसे पहले तो यह जानना चाहिए कि त्रिभाषा फाॅर्मूले है क्या और इस फाॅर्मूले के विरोध करने वाले कौन हैं और विरोध करने वालों की कौन सी मानसिकताएं काम करती हैं? त्रिभाषा फाॅर्मूले के तहत स्कूली छात्रों को तीन भाषाओं में शिक्षा दी जानी चाहिए, इनमें हिन्दी, अंग्रेजी और एक आधुनिक भाषा। आधुनिक भारतीय भाषाओं में बांग्ला, तमिल, तेलूगू, कन्नड, असमिया, मराठी, पंजाबी आदि भाषाएं है। गैर हिन्दी भाषी राज्यों में मातृभाषा के साथ ही साथ हिन्दी और अंग्रेजी पढायी जाने की व्यवस्था थी। अगर गैर हिन्दी राज्यों में हिन्दी और हिन्दी राज्यों में बांग्ला, तमिल, तेलूगू, कन्नड, असमिया, मराठी और पंजाबी आदि भाषाएं बढती है तो इसमें बुराई क्या है, विरोध का औचित्य क्या है?
                                   शाजिशन अंग्रेजी की गुलामी मानसिकता देश के उपर थोपी गयी थी, अंग्रेजी की गुलामी मानसिकताएं थोपने वालों का तर्क था कि अंग्रेजी ही ज्ञान-विज्ञान की भाषा है, इसलिए इनकी अनिवार्यता और सर्वश्रेष्ठता सुनिश्चित होनी चाहिए। यह तर्क सिर्फ और सिर्फ झूठ पर आधारित था, यह तर्क सिर्फ और सिर्फ गुलामी मानसिकता की उपज थी, यह तर्क उन अंग्रेजी शासकों की साजिश थी जिन्होने देश छोडने के बाद भी अपने मोहरे छोड गये थे। लार्ड मैकेले की शिक्षा नीति भारतीयों को अंग्रेज बनाने की थी। आजादी के समय अंग्रेजी कितने लोगों की मातृभाषा थी? गिने-चुने लोगों की ही अंग्रेजी मातृभाषा थी। पर अंग्रेजी बोलने वाले नाम मात्र के लोग लार्ड मैकाले कि शिक्षा नीति और अंग्रेजों का न केवल पिछलग्गू थे बल्कि करोडों-करोड भारतीय पर शासन करते थे। आज भी अंग्रेजी नाम मात्र लोगों की ही भाषा है, वह भी राजकाज, शिक्षा और रोजगार और न्याय की भाषा होने के कारण। कुछ नाम मात्र लोगों की भाषा अंग्रेजी देश की भाषा बन पायी है। फिर भी देश के 125 करोड लोगों पर अंग्रेजी राज करती है। यह शर्म की बात मानी ही जानी चाहिए?
                               देश की भाषा संस्कृति निष्ट होती है। जो भाषा संस्कृति और संभ्यता को परिलक्षित करती है, प्रतिनिधित्व करती है, वही भाषा देश की भाषा बनती है। संस्कृत हमारी संस्कृति और सभ्यता निष्ट भाषा रही है। संस्कृत दुनिया की सबसे प्राचीन भाषा रही है, संस्कृत को देव की भाषा भी कही जाती है। संस्कृत को आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर सबसे सटीक भाषा माना गया है। जब संस्कृत हमारी प्राचीन और संस्कृति-सभ्यतानिष्ट भाषा रही है तो फिर देश की भाषा संस्कृत ही होनी चाहिए थी। पर संस्कृत के विकास और संरक्षण की जगह संस्कृत भाषा को ही समाप्त करने के लिए राजनीतिक अभियान चले हैं। आज तो संस्कृत की बात करना सांप्रदायिक मान लिया जाता है, जबकि अंग्रेजी और अन्य विखंडनयुक्त भाषाओं की बात करना प्रगतिशील माना जाता है।  दुर्भाग्य यह रहा कि आजादी मिलने के बावजूद भी देश की संस्कृति आधारित और मातृ आधारित भाषा की अनिवार्यता और सर्वश्रेष्ठता सुनिश्चत नहीं की गयी, इसकी जगह अंग्रेजी को राजकाज की भाषा बना दिया गया और भारतीय भाषाओं को मझदार में छोड दिया गया। जबकि हर देश में मातृभाषा ही सर्वश्रेष्ठ होती है, मातृभाषा ही राजकाज की भाषा होती है, मातृभाषा ही रोजगार की भाषा होती है। जब मातृभाषा राजकाज और रोजगार दायनी होगी तब मातृभाषा का विकास और उन्नति स्वयं होती है। दुनिया की भाषाएं इसके उदाहरण के तौर पर हमारे सामने हैं।
                             मातृभाषा का सबसे बडे पैरोकार महात्मा गांधी थे। अंग्रेजी शासन के दौरान कह दिया था कि ब्रिटेन के अंग्रेजी शासन को कह दो कि गांधी अंग्रेजी नहीं जानता। कौन नहीं जानता कि गांधी अंग्रेजी जानते थे, ब्रिटेन में गांधी ने अंग्रेजी माध्यम से लाॅ कि शिक्षा हासिल की थी, ब्रिटेन से दक्षिण अफ्रीका जाकर अंग्रेजी में ही रंगभेदी सरकार की नीव हिलायी थी। गांधी जी की मातृभाषा हिन्दी नहीं थी, गांधी जी की मातृभाषा गुजराती थी। अंग्रेज को हटाने के लिए अंग्रेजी आधारित आंदोलन की उम्मीद नहीं थी। अंग्रेजी को आधार बना कर अंग्रेजों की गुलामी मानसिकता से आजादी नहीं मिल सकती थी। इसीलिए गांधी जी ने हिन्दी को प्राथमिकता दी थी, सिर्फ प्राथमिकता ही नहीं बल्कि अपने काम काज की भाषा भी हिन्दी को चुना था। महत्वपूर्ण काम गांधी हिन्दी में ही किया करते थे। हिन्दी आजादी के आंदोलन के समय भी और आज भी देश की सबसे बडी भाषा है। सबसे बडी भाषा होने के कारण गाधी जी ने हिन्दी को देश की मातृभाषा मानने को कहा था।
                     देश की भाषा तय करते समय भी विखंडनवाद चला था। विखंडनवादी जिन्होंने देश के दो टूकडे किये थे, मजहबी आधार पर हिन्दी के विरोध में खडे हो गये थे। विखंडवाद और गुलामी की मानसिकताएं चरम पर पहुंच गयी थी। खासकर उर्दू और अंग्रेजी के पक्ष में विखंडनकारी और गुलामी पूर्ण दलीलें दी गयी थी।  अंग्रेजों के गुलामों का तर्क था कि  अंग्रेजी को देश के कामकाज की भाषा बनाने से हमारे संबंध यूरोप और अमेरिका से अच्छे होंगे, एक  विखंडनकारी व आतातायी समूह ने उर्दू को देश के कामकाज की भाषा बनाने का यह कह कर तर्क दिया था, कि इससे अरब देशों से संबंध मजबूत होगे। अपनी संस्कृति और सभ्यता की चिंता न कर गुलाम बना कर रखने वालों और मजहबी तौर कट्टरपंथियों के हित का पोषण किया गया था। जबकि ये दोनो तर्क के काट भी प्रस्तुत किया गया था, उस समय देश की बहुमत की राय थी कि अंग्रेजी और उर्दू को काम काज की भाषा बनाने से देश की संस्कृति और सभ्यता का अनादर होगा। नेहरू की जिद के समाने सब झूक गये। हिन्दी तो सैद्धांतिक भारत की भाषा मानी गयी पर अंग्रेजी ही शासकों और रोजगार , शिक्षा तथा न्याय की भाषा मान लिया गया।
                    भारतीय भाषा आंदोलन के एक प्रमुख नेता और अंग्रेजी की गुलामी से आजादी दिलाने के लिए संघर्षरत सेनानी देवसिंह रावत अंग्रेजी की गुलामी की साजिश पर तर्कपूर्ण बात करते हैं। उनका कहना है कि आजादी के समय में हिन्दी के खिलाफ दक्षिण के राज्यों में खासकर तमिलनाडु में जो विरोध प्रदर्शन हुए थे वे सभी प्रायोजित थे। प्रायोजित विरोध के गुनहगार भी वहीं आक्रांता थे जिन्होंने हमें गुलाम बनाया था। इतिहास के पन्ने जब आप उलटेंगे तो इसकी साजिशें भी समाने आती जायेगी। अंग्रेजों ने भारत का ईसाई करण करने की कोई कोशिश नहीं छोडी थी। खासकर दक्षिण भारत में चर्च शक्तिमान हुआ था। तमिलनाडु में हिन्दी के खिलाफ विरोध अभियान के पीछे भी चर्च की शक्ति काम कर रही थी। आज भी त्रिभाषा फाॅर्मूले का विरोध कराने वाले लोग खुद तमिल और कन्नड सहित अन्य भारतीय भाषाओं के विरोधी हैं और अंग्रेजी के गुलाम हैं।
                                     अंग्रेजी एक उपनिवेशिक और लूटेरी मानसिकता है। अंग्रेजी का विकास और विस्तार की कहानी भी उपनिवेशिक मानसिकता है। ब्रिटेन ने अपने गुलाम देशों में अपने शासन की सुगमता और गुलाम देशों की मातृभाषाओं का विध्वंस करने के लिए अंग्रेजी का विस्तार दिया था। यूरोप और अमेरिका छोडकर अधिकतर उसी देश में अंग्रेजी की खनक है जो देश भारत की तरह गुलाम रहे हैं। फ्रांस, जर्मनी, रूस, इटली, स्वीटजरलैंड, स्वीडन आदि दर्जनों देश हैं जहां पर अंग्रेजी का वर्चस्व नहीं है, ये देश अपनी ही मातृभाषा में संचालित होते हैं।  फिर ये देश क्या दुनिया में अपनी धाक कामय करने में पीछे हैं? अंग्रेजी अधिकतम ब्रिटेन और अमेरिका में ही आर्कर्षित करती है। भारत में भी अंग्रेजी का जो वर्चस्व है उसके पीछे शासन, न्याय, शिक्षा और रोजगार में अंग्रेजी की अनिवार्यता ही कारण है। अगर भारतीय भाषाओं में शासन, न्याय, रोजगार और शिक्षा की व्यवस्था हो जाये तो फिर अंग्रेजी का वर्चस्व रहेगा ही नहीं। जिस तरह तुर्की में मोहम्मद कमाल पासा ने गुलामी की प्रतीक अरबी भाषा की जगह तुर्की की संस्कृति और सभ्यता से जुडी भाषा का विकास कर लागू किया था उसी तरह भारत में भी विदेशी मानसिकता की प्रतीक अंग्रेजी को हटा कर भारतीय भाषाओं में देश का शासन, न्याय, रोजगार और शिक्षा दिया जाना चाहिए। अंग्रेजी की गुलामी के खिलाफ देश में जनज्वार की जरूरत है तभी हमें अंग्रेजी की गुलामी से आजादी मिलेगी।



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VISHNU GUPT
COLUMNIST
NEW DELHI
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