Sunday, April 21, 2019

हेमंत करकरे उत्पीड़न और प्रताड़ना का अपराधी था


राष्ट्र-चिंतन

gsear करकरे उत्पीड़न और प्रताड़ना का अपराधी  था 
   
    
                      विष्णुगुप्त




हेमंत करकरे को लेकर कोई एक नहीं बल्कि अनेकानेक प्रश्न खडे थे, पर अधिकतर लोग इस प्रश्न पर बात ही नहीं करना चाहते थे? हेमंत करकरे को लेकर उठे प्रश्नों पर आखिर लोग बात क्यों नहीं करना चाहते थे? पहला कारण यह था कि कांग्रेस हर हाल में हिन्दू -भगवा आतंकवाद को प्रत्यारोपित करना चाहती थी, इसके लिए कांग्रेस हर वह हथकंडा अपनाने के लिए तैयार बैठी थी जो हथकंडा अपना सकती थी, हथकंडे के तौर पर कांग्रेस के पास तीस्ता सीतलवाड, हर्ष मंदर, जाॅन दयाल और शबनम हाशमी जैसे तमाम चेहरे थे जो भारत को एक खलनायक के तौर पर प्रस्तुत करते थे और हिन्दुओं को आतंकवादी, खतरनाक तथा अमानवीय मानुष साबित करने के लिए तुले रहते थे, इसी सोच से प्रस्तावित दंगा रोधी विधेयक सामने आया था, जिसमें प्रावधान यह था कि कहीं भी दंगा होगा तो बेगुनाह साबित करने की जिम्मेदारी हिन्दुओं को ही होगी, मुस्लिम पर आरोप होने पर भी उसे बेगुनाही के सबूत नहीं जुटाने होंगे, वह प्रस्तावित विधेयक सोनिया गांधाी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने लायी थी जिसके सदस्य तीस्ता सीतलवाल सहित अन्य तथाकथित धर्मनिरपेक्ष लोग शामिल थे। सबसे बडी बात यह है कि उसी काल में राहुल गांधी हिन्दुओं से देश को खतरा मानते थे  और इस खतरे के बयान कूटनीतिज्ञों से करते थे। दूसरा सबसे बडा कारण कांग्रेस की वह दस साल की सरकार थी जो हिन्दू आतंकवाद को स्थापित करने के लिए तुली हुई थी और केन्द्रीय सत्ता का डर मीडिया और प्रश्न उठाने वाले बडी शख्सियतों पर हावी था। क्या यह सही नहीं है कि उस कांग्रेस की केन्द्रीय सत्ता के तत्कालीन गृहमंत्री पी चिदम्बरम, तत्कालीन गृह मंत्री सुशील शिंदे ने खुलेआम हिन्दू आतंकवाद की थ्योरी परोसी थी। अब कांग्रेस खंडन क्यों कर रही है कि उसने हिन्दू आतंकवाद की थ्योरी नहीं दी थी? दिग्विजय सिंह तो हिन्दू आतंकवाद के प्रोपगंडा सामने रखने में कोई कसर नहीं छोडी थी। सबसे बडी बात यह है कि उस काल में संघ के एक बडे नेता इन्द्रेश कुमार को बार-बार सीबीआई और महाराष्ट एटीएस प्रताडित करती थी और हिन्दू आतंकवाद के आरोप में जेल भेजने की धमकियों से उत्पीडन करती थी। यह अलग बात है कि तत्कालीन कांग्रेसी सत्ता इन्द्रेश कुमार को जेल भेेजने में असफल साबित हुई थी।
                               जब केन्द्रीय सत्ता और राज्य सत्ता किसी वाद, किसी तथ्य को स्थापित करने के लिए हथकंडे पर हथकंडे अपनाती है तो फिर शक की सुई घूमती है। केन्द्रीय और राज्य सत्ता द्वारा स्थापित सुरक्षा जांच एजेसियों की ईमानदारी और विश्वसनीयता भी प्रश्नों के घेरे में होगी। खुद दिग्विजय सिंह ने एक पुस्तक के लोकार्पण में कहा था कि उसकी बातचीत हेमंत करकरे से होती थी। अब प्रश्न यह उठता है कि हेमंत करकरे और दिग्विजय सिंह में बात क्यों होती थी। हेमंत करकरे को यह मालूम जरूर होगा कि वह एक बडी जांच की अगुवाई कर रहे हैं और दिग्विजय सिंह सहित तत्कालीन केन्द्रीय व राज्य सत्ता राजनीतिक फायदे के लिए हिन्दू आतंकवाद को स्थापित करना चाहती है, खुद दिग्विजय सिंह हिन्दू आतंकवाद के प्रोपगंडा के बदबूदार चेहरा ह, अगर ऐसे चेहरों से दोस्ती रखेंगे, लगातार बातचीत करेंगे तो फिर उनकी ही ईमानदारी और उनकी विश्वसनीयता का कबाडा बनेगा? अब यहां यह प्रश्न उठता है कि हेमंत करकरे ने अपनी ईमानदारी और अपनी विश्वसनीयता का कबाडा क्यों बनने दिया था? उन्होंने दिग्विजय सिंह से दूरी क्यों नहीं बनायी थी। एक तथ्य यह है कि दिग्विजय सिंह ने पाकिस्तान द्वारा मुबंई हमले को ही नकार दिया था, दिग्विजय सिंह ने हेमंत करकरे की मौत आतंकवादी कसाब की टीम की गोली से होने की बात भी नकार दी थी और अप्रत्यक्ष तौर पर कहा था कि हेमंत करकरे की मौत के पीछे गहरी साजिश है, इस साजिश के पीछे संघ का हाथ है। दिग्विजय सिंह ने मुस्लिम पक्षधर एक ऐसे पत्रकार की पुस्तक का विमोचन किया था जिसमें मुबंई हमले की साजिश के पीछे आरएसएस का हाथ बताया गया था।
                         कांग्रेस की राजनीतिक योाजना क्या थी? कांग्रेस की राजनीतिक योजना हिन्दू आतंकवाद का प्रोपगंडा खडा कर भाजपा की शक्ति कमजोर करना और पूरे संघ परिवार को आतंकवाद का प्रतीक बना देना था। जिस समय प्रज्ञा ठाकुर की गिरफ्तारी हुई थी उस समय प्रज्ञा ठाकुर विधार्थी परिषद की पुर्नकालिक थी। विद्यार्थी परिषद में रहने के दौरान ही प्रज्ञा ठाकुर ने साध्वी का रूप धारण किया था और उनकी गिनती एक तेजतर्रार साध्वी के तौर पर थी, पूरे मध्य प्रदेश में प्रज्ञा ठाकुर की सक्रियता थी। उसी दौरान मालेगांव बम बलास्ट में उनकी गिरफ्तारी हुई, गिरफ्तारी एक तरह से अपहरण जैसा कार्य था। लगभग आधे महीने तक किसी को सूचना तक नहीं मिली, आधे महीने तक प्रज्ञा ठाकुर को गैर कानूनी तौर पर हिरासत में रखा गया, मध्य प्रदेश पुलिस तक को प्रज्ञा ठाकुर की गिरफ्तारी की सूचना नहीं दी गयी थी। अगर हेमंत करकरे ईमानदार थे और निष्पक्ष थे तो यह बताया जाना चाहिए कि उन्होंने प्रज्ञा ठाकुर की गिरफ्तारी की सार्वजनिक सूचना क्यों नहीं दी थी, हेमंत करकरे ने करीब आधे महीने तक गैर कानूनी तौर पर प्रज्ञा ठाकुर को हिरासत में क्यों रखा था। कानून के जानकार यह जानते हैं कि पुलिस हिरासत में किसी को भी चैबीस घंटे से ज्यादा नहीं रखा जा सकता है, इस दौरान गिराफ्तार व्यक्ति को न्यायालय में उपस्थित करना अनिवार्य तौर पर जरूरी है।
              प्रज्ञा की गिरफतारी एक आश्चर्यजनक घटना थी। प्रज्ञा की गिरफ्तारी ने कई प्रश्न खडे कर दिये थे, जिसके जवाब उस समय नहीं थे। हर जगह हिन्दू आतंकवाद की चर्चा थी, एक ऐसा वातावरण बना दिया गया था कि सही में सभी हिन्दू आतंकवादी हैं, और दुनिया में आतंकवाद का पर्याय बन चुकी आयातित संस्कृति से जुडी हुई आबादी शांति और सदभाव की प्रतीक है। पर लालकृष्ण आडवाणी ने कांग्रेस की मंशा भाप ली थी। आडवाणी अपनी टीम के साथ मिलने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पास गये थे और उन्होंने कहा था कि प्रज्ञा ठाकुर के बहाने कांग्रेस हिन्दू आतंकवाद को स्थापित और प्रायोजित करना चाहती है, इस कांग्रेसी राजनीतिक योजना का दुष्परिणाम भयंकर होगा। उस समय आडवाणी से मनमोहन सिंह ने प्रज्ञा ठाकुर और हिन्दू आतंकवाद के प्रोपगंडा से अनभिज्ञता जाहिर की थी। आडवाणी की चेतावनी कितनी सही हुई, यह भी देख लिया जाना चाहिए। आडवाणी की चेतावनी पर कांग्रेस ने अगर विचार की होती तो फिर कांग्रेस की छवि एक हिन्दू विरोधी पार्टी की नहीं होती। 2014 में केन्दीय सत्ता से कांग्रेस की विदाई भी हिन्दू विरोधी राजनीतिक छवि के कारण हुई है, कांग्रेस की रिपोर्ट यह स्वीकार करती है।
                      दुष्परिणाम भी देख लीजिये। महराष्ट्र की पूरी एटीएस की टीम प्रज्ञा ठाकुर को आतंकवादी घोषित करने में लगी रही, देश और राज्य की सुरक्षा का प्रश्न गौण हो गया था। इसका दुष्परिणाम मुबंई पर पाकिस्तानी आतंकवादी हमला था। आतंकवादी हमले के समय महाराष्ट एटीएस के पास कोई सुरक्षा योजना नहीं थी। खुद हेमंत करकरे ने सुरक्षा मानकों की अवहेलना की थी। उनके पास बुलेट प्रुफ सुरक्षा जैकट था पर वे पहने हुए नहीं थे, उनके पास आतंकवादियों से लौहा लेने के लिए जरूरी और मारक क्षमता वाले हथियार नहीं थे। इस लापरवाही में हेमंत करकरे कसाब की आतंकवादी टीम की गोलियों के शिकार हो गये थे। हेमंत करकरे अगर बहादुर होते और उनके पास युद्ध कौशल होता तो फिर वे मारक क्षमता वाले हथियारों के साथ आतंकवादियों के सामने होते। हेमंत करकरे की गोलियों से कोई आतंकवादी नहीं मरा था, आतंकवादियों की गोलियों से अन्य पुलिस वाले भी मारे गये थे। पर वीरता के लिए अशोक चक्र सम्मान हेमंत करकरे को ही क्यों मिला था? मुबंई आतंकवादी हमले के दौरान हेमंत करकरे ने कौन सी वीरता दिखायी थी? उस समय भी यह प्रश्न उठा था कि हेमंत करकरे को वीरता का अशोक चक्र पुरस्कार क्यों मिला? चूंकि हेमंत करकरे हिन्दू आतंकवाद के स्थापित करने के कांग्रेस के एजेंडे पर काम कर करे थे, इसी लिए कांग्रेस की तत्कालीन सरकार ने हेमंत करकरे को यह पुरस्कार दी थी। अशोक चक्र पुरस्कार पर उस समय भी उंगली उठी थी।
                                   प्रज्ञा कहती है कि जांच के दौरान सुरक्षा आयोग के एक सदस्य ने हेमंत करकरे से सबूत नहीं होने की बात की थी। करकरे से कहा था कि जब सबूत ही नहीं है तो फिर साध्वी को हिरासत में क्यों रखना? तब सुरक्षा आयोग के सदस्य के सामने  करकरे ने कहा था कि मै सबूत जुटाने के लिए वह हर कार्य करूंगा जो कर सकता हूं। अगर प्रज्ञा ठाकुर की यह बात सही है तो हेमंत करकरे की ईमानदारी और विश्वसनीयता पर चर्चा कैसे नहीं होगी। एटीएस और जेल में प्रज्ञा ठाकुर का उत्पीडन हुआ, प्रताडना हुई है, यह सिद्ध बात है। प्रज्ञा ठाकुर के शरीर पर कई नकरात्मक रसायानों को प्रयोग हुआ था। जेल में ही प्रज्ञा ठाकुर को कैंसर की बीमारी हुई थी, कैंसर की बीमारी प्रताडना और उत्पीडन का परिणाम थी।
                  हेमंत करकरे को मेजर लीतुल गोगई की कसौटी पर देखा जाना चाहिए। पत्थरबाजों के खिलाफ मानव ढाल बना कर मेजर लीतुल गोगई सुर्खियो में आये थे और सेना के वीर अफसरों में उनकी गिनती थी। पर एक अमान्य कार्य ने उनकी छवि धुमिल कर दिया, मेजर लीतुल गोगई को कोर्ट मार्शल हुआ और उन्हें सजा देने की प्रक्रिया भी जारी है। अगर हेमंत करकरे ने उत्पीडन और प्रताडना सहित तथ्यारोपण के दोषी हैं तो फिर उनकी आलोचना जरूरी है। उनकी ईमानदारी और विश्वसनीयता पर उंगली उठेगी ही।

                              हेमंत करकरे आतंकवादी की गोली के शिकार हुए थे। इसलिए वे सम्मान के अधिकार जरूर रखते हैं। पर प्रज्ञा ठाकुर के प्रसंग पर उनकी जिम्मेदारी का स्वतंत्र और न्यायपूर्ण परीक्षण क्यों नहीं होनी चाहिए? प्रज्ञा की पीडा पर भी राजनीतिक विचारण जरूरी है। प्रज्ञा ठाकुर की पीडा और प्रज्ञा ठाकुर का उत्पीडन अब भी कांग्रेस को लहूलुहान करती रहेगी।




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Wednesday, April 17, 2019

राष्ट्र-चिंतन

आजम खान जैसों की गर्दन नापने में संहिताएं लाचार क्यों ?

           मुस्लिम तुष्टिकरण देती हैं आजम खान को संरक्षण

          
                  विष्णुगुप्त



आजम खान की आपत्तिजक, अश्लील और लोमहर्षक बयानबाजी ने राजनीतिक उफान उत्पन्न कर दिया है,  महिला के प्रति असम्मान और जहरीला सोच रखने की बात फैली है। यही कारण है कि महिला आयोग ने न केवल संज्ञान लिया है बल्कि आजम खान को नोटिस भी दिया है। सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि सुषमा स्वराज ने मुलायम सिंह यादव पर भीष्म की तरह चुप्पी साधने के आरोप जडते हुए आजम खान पर कार्रवाई करने की मांग कर चुकी है। ऐसी बयानबाजी की न्यायिक परीक्षण भी हो सकता है। पर राजनीतिक सच्चाई यह है कि अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव में इतनी शक्ति, इतनी नैतिकता नहीं है कि ये आजम खान पर कोई कार्रवाई करेंगे। आजम खान की आपत्तिजनक बयानबाजी का चुनावी राजनीतिक कसौटी पर परीक्षण जरूरी है। चुनाव आयोग ने आजम खान पर 72 घंटे का प्रतिबंध लगाया है पर यह काफी नहीं है, कानून की धाराएं अगर आजम खान की गर्दन नापने में वीरता दिखाती तो फिर आजम खान को भविष्य में सबक जरूर मिलता और ऐसी आपत्तिजनक व्यवहार-बयानबाजी के पहले सौ बार सोचता।

          जया प्रदा के खिलाफ आजम खान की आपत्तिजनक और अश्लील, लोमहर्षक बयानबाजी को समझने के लिए आजम खान की राजनीतिक शख्सियत को जानना-समझना जरूरी है। आजम खान की शख्सियत अराजक है, जिन्हें कानून के दायरे की परवाह ही नहीं हैं, ये समझते हैं कि उन्हें कानून के दायरे में रखने वाले लोग उनकी वोट की शक्ति से खूद दब कर राजनीतिक तौर पर हाशिये पर खडे हो जायेंगे। सही भी यही है कि आजम खान को काननू के दायरे में रखने से राजनीतिक पार्टियां अपने लिए नुकसानकुन मानती हैं, यही कारण है कि आजम खान को तरजीह देने वाली राजनीतिक पार्टियां खामोश ही रहती हैं, यह अलग बात है कि राजनीतिक पार्टियां खूद का नुकसान करती हैं, समाजवादी पार्टी की सत्ता भी आजम खान की सांप्रदायिक खेल के कारण जा चुकी है। याद कीजिये मुजफ्फरनगर दंगे को और मुजफ्फरनगर दंगे में आजम खान की भूमिका को। आजम खान ने अपराधियों को सरेआम थाने से भगवाया था, पुलिस-प्रशासन के हाथ बांध डाले थे, दुष्परिणाम  क्या हुआ, दुष्परिणाम यह हुआ कि मुजफ्फरनगर दंगों की आग में महीनों तक झुलसता रहा और समाजवादी पार्टी के खिलाफ बहुंसंख्यक समाज की भावनाएं आहत होती रही हैं, कमजोर और हाशिये पर खडी भारतीय जनता पार्टी को शक्ति मिली, समाजवादी पार्टी सत्ता से बाहर हुई, पहले केन्द्र में और बाद में उत्तर प्रदेश में भाजपा सत्तासीन हो गयी।
         
        निसंदेह तौर पर भाजपा की शक्ति बढाने और भाजपा को सत्ता तक पहुंचाने में आजम खान का योगदान महत्वपूर्ण है। अपनी प्रारंभिक राजनीति के समय से ही आजम खान पर आपत्तिजनक व्यवहार और बयानबाजी हावी रही है। खासकर रामजन्म भूमि आंदोलन के समय में आजम खान की आपत्तिजनक बयानबाजी और संस्कृति के खिलाफ अभियान काफी उफान भरती थी। उस काल में आजम खान ने भारत माता को डायन तक कह डाला था। भारत माता को डायन कहने पर देश भर में बडी प्रतिक्रिया हुई थी। आजम खान की बडी आलोचना हुई थी। पर आजम खान और मुलायम सिंह यादव पर कोई प्रभाव नहीं पडा था। आखिर क्यों? उस काल में देश के अंदर में तथाकथित धर्मनिरपेक्षता की राजनीति हावी रहती थी, अति उदारता में संस्कृति को लांक्षित करने की राजनीतिक सक्रियता खूब चलती थी। मुलायम सिंह यादव खुद राम मंदिर आंदोलन पर गोलियां चलवायी थी, मुलायम सिंह यादव खुद मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति में कांग्रेस की दुकानदारी लुटने के अभियान में थे। इस कारण आजम खान द्वारा भारत माता को डायन कहने जैसी बयानबाजी से बहुसंख्यक वर्ग की भावनाएं आहत होने का डर नहीं था। उस काल मेें भाजपा और संध हाशिये पर खडे थे, सबसे बडी बात यह है कि देश का बहुसंख्यक वर्ग जागरूक नहीं था, देश के बहुसंख्यक वर्ग पर स्वाभिमान हावी नहीं था। पर यह भी सही है कि देश के बहुसंख्यक वर्ग को आजम खान की भारत माता को डायन कहने जैसी बयानबाजी ने सोचने-समझने और मुस्लिम तुष्टीकरण के खतरे के प्रति जागरूकता कर डाली थी। इसी जागरूकता का प्रमाण तब मिला जब उत्तर प्रदेश में पहली बार कल्याण सिंह के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी थी। आजम खान की बयानबाजी सिर्फ इतनी भर नहीं है, आजम खान ने भारतीय सेना के खिलाफ भी आपत्तिजनक बयानबाजी कर चुके हैं, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ ये तो हमेशा तेजाबी , नकरात्मक और आपत्तिजनक बयानबाजी करते ही रहते है।

          आजम खान की आपत्तिजनक बयानबाजी के विमर्श में दो महत्वपूर्ण विन्दु हैं, जिस पर गौर करना चाहिए, क्योंकि दोनों विन्दु काफी महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। पहला विन्दु अखिलेश यादव द्वारा नोटिस न लेना था। जिस मंच से आजम खान ने जय प्रदा के खिलाफ आपत्तिजनक बयानबाजी की थी, सरेआम जय प्रदा की छवि पर कीचड उछाली थी वह मंच चुनावी मंच था। सबसे बडी बात यह थी कि उस चुनावी मंच पर अखिलेश यादव उपस्थित थे। अखिलेश यादव की उपस्थिति में ऐसी नकारात्मक और आपत्तिजनक बयानबाजी हुई है। अखिलेश यादव मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान रह चुके हैं और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष भी हैं, इसलिए अखिलेश यादव से उम्मीद बनती थी कि वे मंच से ऐसी आपत्तिजनक बयानबाजी करने पर खुद नोटिस लेते और आजम खान को महिला का सम्मान करने की सीख देते। अगर अखिलेश यादव ऐसा करते तो फिर उनकी छवि काफी चमकती और उनकी प्रशंसा भी होती। पर अखिलेश यादव चुपचाप आपत्तिजनक बयानबाजी सुनते-देखते रहे। राजनीतिक हलकों में ऐसी चर्चा है कि जब बाप यानी मुलायम सिंह यादव को औकात आजम खान की आपत्तिजनक बयानबाजी रोकने की नहीं थी तो फिर अखिलेश यादव की औकात कहा थी? यहां औकात की बात नहीं है, यहां नैतिकता की बात थी, राजनीतिक शुचिता की बात थी, एक महिला के सम्मान की बात थी। चुनाव जीतने के नैतिक तरीके हैं, जिस पर चलकर विरोधियो को हराया जा सकता है। पर जिस पार्टी ने और जिन नेताओं ने आजम खान के सामने हमेशा नतमस्तक रहे हैं, आपत्तिजनक और नकारात्मक बयानबाजी को अपनी राजनीतिक शक्ति और मुस्लिम तुष्टीकरण का प्रतीक मान कर लाभार्थी होने का ख्याल पाल कर रखते हों, उनसे नैतिकता की उम्मीद कैसे हो सकती है, उनसे महिला सम्मान की बात की उम्मीद कैसे हो सकती है?

        दूसरा विन्दु जय प्रदा की समाजवादी पृष्ठभूमि है। जय प्रदा समाजवादी पार्टी में रह चुकी है। समाजवादी पार्टी से जय प्रदा संसद तक पहुंच चुकी है। एक समय में जय प्रदा मुलायम सिंह यादव के लिए महत्वपूर्ण थी, समाजवादी पार्टी के लिए वंदनीय थी, उच्च कोटि की राजनीतिज्ञ थी।  तथ्य यही है कि जय प्रदा ने समाजवादी पार्टी से ही राजनीति की शुरूआत की थी। अमर सिंह के कारण वह समाजवादी पार्टी से अलग हुई। आजम खान या फिर अखिलेश यादव तक को अब जय प्रदा बुरी लग रही है, अब जय प्रदा इनके लिए संघी हो गयी। ऐसी सोच कहां तक सही है, क्या ऐसी सोच को नकरात्मक नहीं कहा जाना चाहिए? जय प्रदा कही से भी संधी पृष्ठभूमि की नहीं है। भाजपा की राजनीति में सिर्फ जय प्रदा ही नहीं बल्कि अनेकानेक नेता ऐसे हैं जो संघ पृष्ठभूमि की नहीं है, फिर भी ऐसे लोग भाजपा की राजनीति में चरम पर पहुचे हैं, भाजपा की राजनीति में चमक रहे हैं। सुषमा स्वराज इसका उदाहरण हैं। सुषमा स्वराज खुद समाजवादी पृष्ठभूमि से आकर भाजपा की राजनीति में चरम पर बैठी हुई है। सुषमा स्वराज कभी राज नारायण और जार्ज फर्नाडीस के साथ राजनीति की थी। सुषमा स्वराज के भाजपा में जाने पर जब जार्ज फर्नाडीस ने कभी कोई विरोध की बयानबाजी नहीं की थी तो फिर आजम खान जैसों को यह बयानबाजी क्यों करनी चाहिए और अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव को चुप्पी क्यों साधनी चाहिए थी? यह व्यक्ति की आजादी है कि वह कौन सी राजनीतिक पार्टी में रहता है और कौन सी राजनीतिक पार्टी में नहीं रहता है।

      आपत्तिजनक बयानबाजी ने जिस तरह से विरोध की भावनाएं भडकायी है उससे साफ होता है कि न केवल आजम खान के लिए ही नहीं बल्कि अखिलेश यादव के लिए भी कोई शुभ राजनीतिक संदेश नहीं है। इस बयानबाजी के नकारात्मक असर न केवल रामपुर तक सीमित है, बल्कि इसका असर पूरे उत्तर प्रदेश और पूरे देश भर में फैल चुका है। खासकर समाजवादी पार्टी को उत्तर प्रदेश में इस नकारात्मक बयानबाजी का दुष्परिणाम झेलने के लिए विवश होना पड सकता है। आजम खान की जहरीले, आपत्तिजनक बयानबाजी की कसौटी पर बहुंसख्यक मतों की एकता भी बन सकती है। आजम खान के बयानबाजी के माध्यम से मुस्लिम वोट लेने के चक्कर में हिन्दू वोट से हाथ धोना पड सकता है। ऐसे में समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव के लिए ऐसी बयानबाजी घाटे का राजनीतिक दुष्परिणाम हो सकता है। देश की संहिताओ को सक्रिय रखने वाले संस्थानों को आजम खान जैसे आपत्तिजनक बयानबाजी करने वाले नेताओं पर बुलडोजर चलाने की सक्रियता दिखानी चाहिए। देश कीसंहिताओं की वीरता सुनिश्चित होगी तो फिर महिलाओं का सम्मान भी सुनिश्चित होगा और आजम खान जैसे नेता जेल की हवा भी खाने के लिए बाध्य होंगे।






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विष्णुगुप्त
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Thursday, April 11, 2019



राष्ट्र-चिंतन
बकरा दाढी देख कर भाग रहीं हैं सेक्युलर पार्टियां

सेक्युलर पार्टियों के लिए भी मुस्लिम अक्षूत हो गये, हिन्दुओं की एकता ने नींद उडायी




     विष्णुगुप्त



पहला तथ्य.... तथाकथित सेक्युलर पार्टियां बेवफा हो गयी ...  जामा मस्जिद के इमाम।
दूसरा तथ्य ... कांग्रेस प्रत्याशी भी हिन्दुओं की डर से मुझे प्रचार के लिए नहीं बुलाते...  गुलाम नवी आजाद
तीसरा तथ्य .... भाजपा बढती गयी, मुसलमानों का प्रतिनिधित्व घटता गया।
चैथा तथ्य...  तथाकथित सेक्युलर पार्टियों के चुनावी दफ्तर में छेदा टोपी और बकरा दाढी रखने वाले मुसलमानों पर अप्रत्यक्ष प्रतिबंध।
पांचवां तथ्य .... सच्चर कमिटी की रिपोर्ट अब किसी राजनीतिक पार्टियों को याद क्यों नहीं आ रही है?

         उपर्युक्त ये पांचों तथ्य क्या कहते हैं? क्या ये पांचों तथ्य क्या तथाकथित सेक्युलर पार्टियों की बेवफाई व्यक्त नहीं करते हैं? ये पांचों तथ्य की कसौटी पर क्या यह तिरस्कार और उपेक्षा लोकतांत्रिक माना जायेगा या फिर गैर लोकतांत्रिक माना जाना चाहिए? अगर इन पांचों तथ्यों की कसौटी पर इसे लोकतांत्रिक मान लिया गया तो फिर भारतीय लोकतंत्र की खुबसूरती कैसे मानी जायेगी, अगर यह खुबसूरती भी अस्तित्वहीन हो जायेगी तो फिर भारत के लोकतंत्र को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ लोकतंत्र में गिनती कयों होनी चाहिए? 
      क्या इसके लिए सिर्फ और सिर्फ भारतीय जनता पार्टी की ही डर हथकंडा बन कर तथाकथित सेक्युलर पार्टियों के सिर पर नाचती है? क्या इसके लिए मुस्लिम आबादी की सांप्रदायिकता भी जिम्मेदार है, क्या मुस्लिम आबादी की आतंकवादी नीति भी जिम्मेदार है? क्या इसके लिए लिए मुस्लिम वर्ग के उन चंद बीमार मानसिकता भी जिम्मेदार है जो देशभक्ति को भी मजहब की कसौटी पर तोलते हैं और हर लोकतांत्रिक मूल्यों को गैर इस्लामी घोषित कर देते हैं? क्या ये पांचों तथ्य यह निष्कर्ष नहीं देते हैं कि सेक्युलर पार्टियां मुसलमानों का वोट तो हासिल करना चाहती हैं, समर्थन लेना तो चाहती हैं, वोट और समर्थन लेकर अपनी सत्ता किस्मत तो चमकाना चाहती हैं पर उन्हें अब न तो उचित प्रतिनिधित्व देना चाहती हैं और न ही सम्मान देना चाहती हैं।
            खासकर जामा मस्जिद के इमाम की बात या पीडा अस्वीकार नहीं हो सकती है, उनकी पीडा स्वाभाविक है। उनके पूराने दिन चले गये। लोकसभा या फिर विधान सभा चुनावों में सेक्युलर राजनीतिक पार्टियों मक्ख्यिों की तरह जामा मस्जिद के इमाम के आस-पास चक्कर लगाती थी और अपने पक्ष में फतवा दिलाने के लिए चरणवंदना करती थी। लालू, मुलायम, रामबिलास पासवान सहित कांग्रेस का ऐसा कौन नेता शेष था जो जामा मस्जिद के इमाम की चरण वंदना करने नहीं जाता था। जामा मस्जिद के इमाम भी बहुत शौक और हिम्मत के साथ अपने मनपंसद पार्टी के समर्थन में फतवा जारी करता था और फतवे का अर्थ और अनर्थ यह होता था कि इस्लाम खतरे में हैं। जामा मस्जिद के इमाम ने समझ लिया था कि मुस्लिम उनका ही गुलाम है और तथाकथित सेक्युलर पार्टियां यह समझ ली थी कि मुस्लिम आबादी जिसको समर्थन करती रहेगी, सत्ता उन्ही को मिलेगी?
यह भ्रम टूटा कैसे? इस भ्रम को तोडा किसने? इस भ्रम को हिन्दू आतंकवाद के प्रोपगंडा ने तोडा। इस भ्रम को तथाकथित सेक्युलर राजनीतिक दलों की मुस्लिम परस्ती ने तोडा। कांग्रेस का हिन्दू आतंकवाद का प्रोपगंडा आत्मघाती साबित हुआ, कांग्रेस और अन्य सेक्युलर पार्टियों का अति मुस्लिम परस्ती आत्मघाती साबित हुआ। राजनीतिक स्थिति यह थी कि जो सेक्युलर नेता हिन्दुओं को जितना गाली देता था और जितना अपमानजनक बात करता था उतना ही और बडा नेता बन जाता था। इसी मानसिकता के तहत रामसेतु प्रकरण पर भगवान राम के अस्तित्व को नकार कर काल्पनीक कह डाला गया। आज कांग्रेस पीछे हटते हुए कह रही है कि उसने हिन्दू आतंकवाद शब्द का प्रयोग नहीं किया था।  इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि हिन्दुओ के बीच पुर्नजागरण की हवा बह गयी।
2014 का लोकसभा चुनाव मुस्लिम राजनीति, तथाकथित सुक्युलर राजनीति, कांग्रेस की राजनीति के लिए दुस्वप्न साबित हुआ। सारे सर्वेक्षणों को ध्वस्त करते हुए हिन्दूवादी सत्ता कायम हो गयी। आम तौर पर विकसित तथ्य है कि मुस्लिम किसी भी परिस्थिति में भाजपा को वोट नहीं करते हैं। मुस्लिम के वोट नहीं करने के बाद भी मोदी प्रधानमंत्री बन गये। कांग्रेस यह मान चुकी थी कि मुस्लिम परस्ती छवि के कारण हिन्दुओं का राजनीतिक पुर्नजागरण हुआ और उनकी सत्ता चली गयी। 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद महाराष्ट्र, हरिणाणा, झारखंड, उत्तर प्रदेश, त्रिपुरा आदि कई राज्यों में हिन्दुत्व के बल पर मोदी ने सत्ता स्थापित कर डाली। उत्तर प्रदेश जैसे जातिवादी और मजहबी गठजोड वाले प्रदेश में भी मोदी और योगी ऐसे बोले जिससे अखिलेश, मायावती और कांग्रेस चारो खाने चित हो गये। अयोध्या में कारसेवकों पर गोलियां चलवाने की वीरता बखारने वाले मुलायम और अखिलेश का ऐसे प्रश्नों पर मुंह बंद हो गया।
राजनीतिक संदेश क्या स्थापित हुआ? पहला राजनीतिक संदेश स्थापित यह हुआ कि हिन्दू अपने बल पर सत्ता हटा सकते हैं, सत्ता को धूल चटा सकते हैं, सत्ता बना सकते हैं, सत्ता को निरंतर गतिमान कर सकते हैं। हिन्दुओं का अपमान और तिरस्कार करने वाली राजनीतिक पार्टियां अग्नि की स्वाहा हो जायेंगी। दूसरा संदेश यह गया कि मुस्लिम आबादी किसी भी परिस्थिति में अब सत्ता को नियंत्रित नहीं कर सकती है, सत्ता को कटपुतली की तरह नहीं नचा सकती हैं, मुस्लिम मतो की सौदागरी अब घाटे का सौदा है। जिधर जायेगी मुस्लिम आबादी उधर हिन्दू आबादी नहीं जायेगी। मुसलमानों का समर्थन पाने से हिन्दुओ का गुस्सा सातवें आसमान पर जायेगा। इसके अलावा यह भी संदेश गया कि मुस्लिम प्रत्याशी को लोकसभा-विधान सभा का टिकट देने का अर्थ है कि जीत भाजपा की झोली में डालना, क्योंकि हिन्दू आबादी मुस्लिम प्रत्याशी को वोट करेगी नहीं। यह सही है कि पहले तथाकथित सेक्युलर पार्टियां बडी उत्साह के साथ और बडे अभिमान के साथ मुस्लिम को प्रत्याशी बनाती थी, मुस्लिम प्रत्याशी हिन्दू समर्थन से जीत भी जाते थे। पर हिन्दू पुर्नजागरण के अस्तित्व में आने के साथ ही साथ तथाकथित सेक्युलर राजनीति पार्टियांें के द्वारा खडे किये गये मुस्लिम प्रत्याशियों की जीत कठिन होती चली गयी, मुश्किल होती चली गयी और भाजपा की जीत की गारंटी भी बनती चली गयी। इसका दुष्परिणाम क्या हुआ? अब इसके दुष्परिणाम बडे खतरनाक सामने आ रहे हैं, इसके दुष्परिणामों पर गंभीर चिंता हो रही है। दुष्परिणाम यह है कि लोकसभा और विधान सभाओं में मुस्लिम आबादी का प्रदर्शन लगातार घट रहा है, यह स्थिति सुधरनी नहीं हैं। यह स्थिति क्यों नहीं सुधरेगी? इसलिए नही सुधरेगी की राजनीतिक स्तर पर हिन्दू-मुस्लिम की खाई और चैडी होने वाली है।
तथाकथित सेक्युलर पार्टियां का एक घिनौना चेहरा भी अब बेपर्द हो रहा है। पिछले गुजरात विधान सभा के चुनाव में एक बडी राष्ट्रीय पार्टी के दफ््तर में छेदा टोपी पहनने और बकरा दाढी रखने वाले मुस्लिम नेताओं के प्रवेश पर प्रत्यक्ष तौर पर प्रतिबंध था। अप्रत्यक्ष रूप से वह पार्टी अपने लोगो को संदेश दे चुकी थी कि अगर उनके कार्यालय में छेदा टोपी और बकरा दाढी रखने वाले मुसलमान आकर बैठेगे और चुनाव प्रचार में हिस्सेदारी करेंगे तो फिर हिन्दू आबादी नाराज हो जायेगी, हिन्दुओं के वोट से हाथ धोना पड जायेगा? गुजरात हिन्दुत्व का प्रयोगशाला रहा है। वह पार्टी गुजरात में भाजपा को हराने के काफी करीब तक पहुच चुकी थी। लोकसभा के चुनाव में स्थितियां कुछ ऐसी ही है। कांग्रेस के प्रत्याशी गुलाम नवी आजाद को प्रचार में बुलाने से कतराते हैं और उन्हें हार का डर लग जाता है। अन्य तथाकथित सेक्युलर पार्टियां भी अपने दफतरों में मजहबी मुसलमानों की सक्रियता को रोकने और प्रतिबंधित करने का कार्य कर रही हैं। अब सोच पूरी तरह से बदल चुकी है। कांग्रेस और अन्य सेक्युलर राजनीतिक पार्टियों की सोच भी यह है कि भाजपा की डर से ये जायेंगे कहां, वोट तो उन्हें ही देंगे, फिर इनके पीछे लगना क्यों? इन्हें सम्मान देकर खुद का सर्वनाश क्यों कराया जाये।
भारतीय लोकतंत्र में ऐसी परिस्थतियां अस्वीकार हैं। पर मुस्लिम आबादी को भी हिन्दुओ की भावनाओं का ख्याल रखने के लिए आगे आने की जरूरत है, आतंकवाद और  सांप्रदायिकता की आग लगाने वाले मुस्लिम नेताओं के प्रति मुस्लिम आबादी की नजरियां भी बदलनी चाहिए। तथाकथित सेक्युलर राजनीतिक पार्टियों के प्रति भी इन्हें सजग रहने की जरूरत है। राष्ट्र की अवधारणा और राष्ट्र की अस्मिता को खारिज करने वाला कोई समूह अपने लिए सकारात्मक राजनीतिक स्थितियां नहीं बना सकता है?


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VISHNU GUPT
COLUMNIST
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Wednesday, November 14, 2018


 

         राष्ट्र-चिंतन   
     
     जनता ने मतदान कर माओवादियों का सबक दिया
माओवाद देश का आईकॉन नहीं बन सकता
    
             विष्णुगुप्त

माओवाद को जनता ने नकार दिया। माओवादियों को कड़ा व सबककारी संदेश दिया गया है कि भारत में सत्ता माओत्से तुंग की बन्दूक की गोली के सिद्धांत से नहीं बल्कि मतदान से निकलती है। कहने का अर्थ है कि हमारी लोकतांत्रिक शक्ति और विचार की जीत हुई, विदेशी अवधारणा माओवाद की पराजय हुई जो अब चीन में भी विलुप्त हो गया है। छत्तीसगढ़ में माओवाद ग्रसित क्षेत्रों में माओवादियों के विरोध और धमकियों की बीच मतदान हुआ और मतदान में उत्साह के साथ जनता सक्रिय थी, मतदान का प्रतिशत भी ठीक-ठाक रहा। छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में माओवाद की कैसी हिंसा है, माओवाद की कैसी पकड़ है, यह कौन नहीं जानता है, माओवादी प्रभावित क्षेत्रों में पुलिस तक जाने से डरती है, अर्द्धसैनिक बलों पर हमले होते रहते हैं, विकास के सभी काम ठप पडे हुए हैं। माओवादियों के खिलाफ बोलने या फिर असहमति जताने वाले लोगों का रहना मुश्किल है, उन पर हिंसा बरपती है, माओवादियों की गोलियां उन पर चलती है। कुछ दिन पूर्व ही माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में लोकतंत्र के प्रति उत्साह को देखने-समझने गयी दूरदर्शन की टीम को माओवादियों ने कैसे निशाना बनाया था, दूरदर्शन के कैमरा मैन की किस प्रकार से हत्या हुई थी, यह भी जगजाहिर है। पत्रकारों को निशाना बनाने की हिंसा यह बताती है कि माओवाद कितना क्रूर, कितना हिंसक हैं, अगर ये पत्रकार तक की जान लेने में शर्मसार नहीं होते हैं तब ये आम जनता के साथ किस प्रकार से व्यवहार करते होंगे, आम जनता को किस प्रकार की हिंसा का ग्राह बनाते होंगे, इसकी कल्पना आसानी से की जा सकती है। 
      सबसे बडी बात यह है माओवादियों ने बडी-बडी सभाएं कर आम जनता को धमकियां पिलायी थी कि वोट करने वाले लोगों को सीधे गोलियां मिलेगी, इस क्षेत्र से खदेड़ दिया जायेगा। माओवादियों का इतिहास भी क्रूर है। पहले भी मतदान करने वाली जनता पर माओवादी कहर बन कर टूटते हैं। पर जनता के सामने अपने जनप्रतिनिधि चुनने की चुनौती थी,  निश्चित तौर पर जनता ने यह चुनौती स्वीकारी और मतदान के लिए कूद पडी। इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनप्रतिनिधि ही विकास और उन्नति के प्रतीक होते हैं, अगर आम जनता लोकतांत्रिक व्यवस्था से कट जाये तो फिर विकास और उन्नति को जनता कैसे हासिल कर सकती है। माओवाद कभी उन्नति और विकास का प्रतीक नहीं हो सकता है, माओवाद सिर्फ और सिर्फ तानाशाही और हिंसा के प्रतीक है।
मओवाद क्या भारतीय जनता का आईकॉन हो सकता है? माओवाद, मार्क्सवाद, लेनिनवाद, स्तालिनवाद आदि एक विदेशी मानसिकताएं जो दुनिया भर में निरर्थक, अप्रासंगिक हो गयी हैं। सोवियत संघ के पतन के बाद पूरी दुनिया से एक तरह से इन सभी वादों की विदाई हो चुकी है, गिन-चुने जिन राष्टों में ये सभी मानसिकताएं हैं तो पर इन मानसिकताओं के रूप-रंग बदले हुए हैं, इन सभी मानसिकताओं को पूंजी के प्रवाह से परहेज नहीं हैं, मजदूरवाद गौण हो चुका है, अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिए पूंजी को आवश्यक मान लिया गया है। आधुनिक दौर में जहां पर भी ऐसी मानसिकताओं का थोड़ा-बहुत अस्तित्व रहा है वहां पर खून-खराबा, तानाशाही और भूखमरी पसरी होती है, तानाशाही के प्रताड़ित और शोषित लोग अपने देश को छोड़कर पलायन करने के लिए मजबूर होते हैं। लैटिन अमेरिकी देश वेनेजुएला एक सशक्त और मजबूत अर्थव्यवस्था वाला देश था लेकिन 1999 में वहां पर हुगो चावेज नाम के एक व्यक्ति ने पूंजी के खिलाफ सत्ता पर बैठ गया। हुगो चावेज अमेरिका को समाप्त करने की कसमें खाता रहा। हुगो चावेज की इस सनकी भरी नीति पर दुनिया भर के कम्युनिस्ट तालियां बजाते थे और कहते थे कि दुनिया में माओवाद, मार्क्सवाद, लेनिनवाद, स्तालिनवाद की वापसी हो रहा है। दुष्परिणाम क्या हुआ? दुष्परिणाम बहुत ही दर्दनाक और भयानक हो गया। वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था चौपट हो गयी, महंगाई इतनी बढी कि आम आदमी त्राहिमाम किया। भूख और तंगहाली फैल गयी। भूख और तंगहाली से ग्रसित वेनेजुएला की जनता अपने देश से पलायन करने लगी। कई लाख जनता अपना देश छोडकर लैटिन अमेरिकी देशों में शरणार्थी बनने के लिए बाध्य हुई।
माओवाद तो चीन में भी दफन हो चुका हैं। चीन में कहने के लिए कम्युनिस्ट तानाशाही है पर चीन आज की तारीख में एक पंूजीवादी देश है, एक उपनिवेश्विक देश है। चीन की अर्थव्यवस्था पंूजी आधारित है। माओत्से तुंग की क्राति के अवशेष तक नहीं हैं। मजदूर-किसान गौण हो गये हैं। मजदूरों के हित की बात गौण हो गयी है। मजदूर प्राथमिकता सूची से बाहर हैं। चीन के अंदर में एक श्रम कानून बडा ही अमानवीय है। इस कानून का नाम ‘ हायर एंड फायर ‘ है। हायर एंड फायर कानून के तहत कोई भी कंपनी अपनी मनमर्जी से मजदूर रखेगा और अपनी मनमर्जी से मजदूर को निकाल बाहर कर सकता है। मजदूर अपनी हक के लिए आंदोलन कर नहीं सकते हैं। मजदूरों के आंदोलन करने पर कडी सजा है। चीन के अंदर मानवाधिकार की बात सोची तक नहीं जा सकती है। यही कारण है कि दुनिया भर की कपंनियां सस्ते मजदूर के लालच में चीन में अपर्नी इंकाइयां लगाती है। इसी कसौटी पर चीन के अंदर में दुनिया की नामी-नामी कंपनियों के उत्पादन ईकाइंयां लगी हुई है। अगर सस्ता श्रम व्यवस्था नहीं होती और श्रम तथा अन्य कानूनो से छूट नहीं मिली हुई होती तो चीन के अंदर में दुनिया भर की कपंनियां क्यों और किस लिए जाती? अधिकतम लाभ अर्जित करना पूंजी का सिद्धांत है।
माओवाद भारत की जनता का आईकॉन कभी नहीं बन सकता है? माओवाद भारत की जनता का आईकॉल क्यों नहीं बन सकता है? इसके पीछे कौन-कौन से अवरोधक विन्दु हैं, जिस पर विचार किया जाना चाहिए। सबसे पहली बात तो यह है कि माओवाद एक विदेशी अवधारणा है,  माओवाद चीन के अंदर ही दफन हो चुका है, माओवाद एक हिंसक अवधारणा है, एक शत्रु अवधारणा है।  भारत के माओवादी चाहे जिनता भी हिंसा कर लें, भारतीय माओवादी चाहे जितना भी खून बहा दें, आगे भी सालों-सालों तक जंगली क्षेत्रों में हाहाकार मचाते रहें पर भारत की जनता माओवाद को अपना नहीं सकती हैं। भारत में माओवाद तो उसी दिन दफन हो गया था जिस माओत्से तुंग ने भारत पर हमला किया था और जिस दिन माओवादियों तथा कम्युनिस्ट पार्टियों ने माओत्से तुग को अपना आईकॉन, अपना गौड फादर घोषित किया था और यह कहा था कि माओत्से तुंग माई चैयमैन यानी हमारा प्रधानमंत्री। चीनी सैनिकों के स्वागत में बैनर लगाये थे, भारतीय रक्षा उत्पादन कारखानों में हड़ताल करायी थी, ताकि भारतीय सैनिकों को हथियार उपलब्ध न हो सके और चीनी सैनिकों की जीत हो सके। भारत के माओवादियों ने माओत्से तुंग के बदलौत भारत में कम्युनिस्ट सरकार कायम करना चाहते थे। आज भी माओवादी और कम्युनिस्ट पार्टियां चीन को हमलावर या फिर माओत्से तुंग को रक्तपिसाचु मानने से इनकार करते हैं। माओत्से तुंग ने लगभग एक करोड गरीब जनता को अपने देश में भूखे मार दिया था। जिस माओत्से तंुग ने हमारे पांच हजार सैनिकों की हत्या की थी, जिस माओत्से तुंग ने हमारी 90 हजार वर्ग मील भूमि कब्जाई थी उस माआत्से तुग को देश की जनता कैसे स्वीकार कर सकती है?
नेपाल के माओवादियों से भी भारत के माओवादी सीख लेने के लिए तैयार नहीं हैं। नेपाल में माओवादियों ने तानाशाही को छोड़कर लोकतंत्र को अपना लिया। आज माओवादी संसदीय प्रणाली के वाहक हैं, संसदीय चुनाव लडते हैं, संसदीय चुनाव के माध्यम से सत्ता हासिल करते हैं। आज नेपाल में कम्युनिस्ट सत्ता बैठी हुई है। नेपाल की क्युनिस्ट सत्ता भी देशभक्ति और राष्टीयता की कसौटी पर चलती-बढती है। पर भारत के माओवादी देशभक्ति और राष्टीयता को बुरी चीज मानते हैं। अभी भी ये माओत्से तुंग के सिद्धांत से अलग हटने के लिए तैयार नहीं हैं। माओवादी जब हिंसा नहीं छोडेगे तब प्रतिहिंसा उन पर टूटती रहेगी। छत्तीसगढ की जनता की वीरता की प्रशंसा करनी चाहिए। राज्य सत्ता को भी चाकचौबंद रहना चाहिए ताकि मतदान करने वाली जनता को सुरक्षा मिले। माओवादी अपनी हिंसा का शिकार मतदान करने वाली जनता को बना सकते हैं।

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Saturday, November 3, 2018

                  राष्ट्र-चिंतन   

पाक को कंगाल होने से कौन बचायेगा ?

मुद्रा कोश और सउदी अरब, पाकिस्तान को कंगाल होने से बचा सकते हैं पर डोनाल्ड ट्रम्प की धमकी के सामने ये दोनों भी डरे हुए हैं। कंगाल होने से बचने के लिए 1200 करोड अमेरिकी डाॅलर की जरूरत है। अब पाकिस्तान को समझ में आ जाना चाहिए कि दूसरों के घरों में आग लगा कर खुशी मनाने का दुष्परिणाम क्या होता है। जिस चीन के बल पर पाकिस्तान फूलता था वह चीन पाकिस्तान को कंगाल होने से बचाने के लिए क्यों नहीं आगे आ रहा है। पाकिस्तान को अमेरिका और मुद्रा कोश, सउदी अरब के सामने कटोरा लेकर क्यों दौडना पड रहा है? अगर पाकिस्तान अपना भविष्य सुरक्षित रखना चाहता है तो फिर उसे अमेरिका-भारत के साथ रिश्ते मुधर करने ही होंगे, चीनी हथकंडों से मुक्त होना ही होगा, हिंसा की आग पर पानी डालना ही होगा?


                   विष्णुगुप्त




पाक को कंगाल होने से कौन बचायेगा? यह प्रश्न न केवल पाकिस्तान की आतंरिक राजनीति को उथल-पुथल कर दिया है बल्कि मुस्लिम दुनिया और यूरोप-अमेरिका में भी ध्यान खींचा है, चर्चा का विषय बना हुआ है। मुस्लिम दुनिया और अमेरिका-यूरोप में चर्चा का विषय यह है कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में लगी आग में कौन अपना हाथ जलायेगा, कौन अपने हाथ और अपने हित को बलि देकर पाकिस्तान को कंगाल होने से बचायेगा, क्या ऐसे देश को कंगाल होने से बचाना जरूरी है जो देश अपनी आतंकवाद की आउटसोर्सिंग नीति से दुनिया की शांति और सदभाव को खतरनाक तौर पर विध्वंस करता हो और निर्दोष जिंदगियों को लहूलुहान कहरने की नीति पर चलता हो। जानना यह जरूरी है कि पाकिस्तान वर्तमान में कई तरह के संकटों से जूझ रहा है। एक तो उसकी अर्थव्यवस्था विध्वंस होने के कगार पर खडी है, अर्थव्यवस्था की गिरती रफतार को थामने की शक्ति पाकिस्तान की सरकार के अंदर में है नही, ंतो फिर अर्थव्यवस्था को विध्वंस होने से कैसे बचाया जा सकता है, विदेशी मुद्रा भंडार लगभग समाप्त हो गया है, कर्ज की अदायती की आर्थिक शक्ति नहीं है, पाकिस्तानी रूपये की कीमत लगभग 30 प्रतिशत घट गयी है। 
        जिन देशों और जिन संस्थानों से उम्मीद थी उन देशों ने और उन संस्थानों ने या तो हाथ खींच लिये हैं, आर्थिक मदद देने से इनकार कर दिये हैं या फिर उन देशों और उन संस्थानों ने ऐसी शर्ते थोपी हैं जिसकी पूर्ति संभव नहीं है, उन शर्तो को स्वीकार करना खतरनाक है, संप्रभुत्ता के साथ समझौता करना हो सकता है। पाकिस्तान के लिए सबसे बडी समस्या अमेरिका और डोनाल्ड ट्रम्प हैं। डोनाल्ड ट्रम्प पाकिस्तान को किसी भी परिस्थिति में सबक सीखाना चाहते हैं, पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था विध्वंस को सुनिश्चित होना देखना चाहते हैं। डोनाल्ड ट्रम्प ने मुद्रा कोश को सीधे तौर पर हडका दिया है कि अगर पाकिस्तान को आर्थिक सहायता दी तो फिर उसके दुष्परिणाम भयंकर होंगे? उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान सहायता के लिए मुद्रा कोश में बार-बार दस्तक दे रहा है और पाकिस्तान को उम्मीद है कि मुद्रा कोश ही उसकी अर्थव्यवस्था के विध्वंस को बचा सकता है।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की दिन-रात की नींद गायब है, उसके मंत्रिमंडल के सदस्यों की भी नींद हराम हो गयी है। कहने का अर्थ यह है कि इमरान खान और उसकी सरकार दिन-रात यही कोशिश में लगी हुई है कि किस संस्थान और किस देश से आर्थिक सहायता हासिल की जायें। सबसे बडी समस्या इमरान खान ही हैं, इमरान खान की साख ही नहीं है? अब यहां कोई प्रश्न कर सकता है कि इमरान खान की साख क्यों नहीं है? इसका उत्तर यह है कि इमरान खान मूल रूप से राजनीतिज्ञ नहीं हैं, इमरान खान मूल रूप से राजनीतिज्ञ होते तो उन्हें पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था, पाकिस्तान की संप्रभुत्ता और पाकिस्तान की आतंरिक रूढिंयों की समझ होती और इन सभी समस्याओं से निकलने की क्षमता भी होती। इमरान खान की छवि भी अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुसार फीट नहीं बैठती है। अंतर्राष्ट्रीय जगत में पहले से ही बात बैठी हुई है कि इमरान खान आतंकवाद के समर्थक हैं, आतंकवादियों को इमरान खान न केवल समर्थन देते हैं बल्कि संरक्षण भी देते हैं, आतंकवाद के बल पर चुनाव जीते हैं, सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि इमरान खान पाकिस्तान की सेना का मोहरा भी हैं। पाकिस्तान की सेना ने लोकतंत्र का हरण कर इमरान खान को प्रधानमंत्री बनवायी थी। यह आरोप पाकिस्तान की राजनीति में आम है, नवाज शरीफ ऐसे आरोप बार-बार लगाते हैं। अपनी छवि के लिए इमरान खान खुद जिम्मेदार हैं। इमरान खान ने चुनाव के दौरान अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की खूब खिल्लियां उठाया करते थे और कहा करते थे कि सत्ता में आने के तुरंत बाद अंतर्राष्ट्रीय समुदाय, अंतर्राष्ट्रीय नियामको और अतंराष्ट्रीय वित्त संस्थानों को पाकिस्तान की शक्ति दिखायी जायेगी, उनके छोटे-मोटे कर्ज को उनके मुंह पर मार दिया जायेगा, पाकिसतन को किसी की सहायता की जरूरत ही नहीं है। पर जब सत्ता में इमरान खान आये तब उन्हें दिन में ही तारे दिखायी देने लगे। पाकिस्तान की विध्वंस हो रही अर्थव्यवस्था इमरान खान के सिर पर भूत की तरह नाचने लगी।
कौन-कौन देश है और कौन-कौन संस्थाएं हैं जहां से पाकिस्तान की उम्मीद बनती है और पाकिस्तान आर्थिक सहायता के लिए हाथ-पैर मार रहा है? कोई एक नहीं बल्कि दर्जनों देशों से पाकिस्तान ने कोशिश की थी पर हर जगह उसे निराशा हीे मिला है। सिर्फ दो जगह ही बचे हैं जहां पर पाकिस्तान की उम्मीद बची हुई हैं और जहां से पाकिस्तान को आर्थिक सहायता की उम्मीद बनती है। एक सउदी अरब है और दूसरा मुद्रा कोश है। सउदी अरब से पाकिस्तान की दोस्ती पुरानी है, पाकिस्तान को बार-बार सउदी अरब ने सहायता की है। पर कुछ सालों से पाकिस्तान और सउदी अरब के रिश्तों में खटास आ गयी है। यमन पर हमले में पाकिस्तान ने सउदी अरब का साथ नहीं दिया था, जिस कारण सउदी अरब नाराज है। एक अडचन यह है कि सउदी अरब की अर्थव्ववस्था खुद ही खराब हो रही है, उसकी अर्थव्ववस्था में इतनी शक्ति नहीं है कि वह पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को उबार सके। सउदी अरब ने पाकिस्तान को 300 करोड़ डालर का देने का वायदा किया है, ऐसा कहना पाकिस्तान की इमरान खान सरकार का है। पाकिस्तान को अगर सउदी अरब 300 करोड़ डाॅलर दे भी देगा तो भी पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की समस्या दूर हो जायेगाी, ऐसा नहीं माना जा सकता है। वर्तमान संकट से निकलने के लिए पाकिस्तान को करीब 1200 करोड़ अमेरिकी डालर की जरूरत है। मुद्रो कोश ने इसके पहले 13 बार पाकिस्तान की मदद की है और पाकिस्तान को बेलआउट पैकेज दिया है। पर इस बार पाकिस्तान पर मुद्रा कोश की नजर टेढी है। मुद्रा कोश की शर्त काफी खतरनाक हैं और स्वीकार के लायक नहीं हैं। सबसे बडी बात यह है कि मुद्रा कोश ने चीनी कर्ज के संबंध में जानकारी मांगी है। मुद्रा कोश को आशंका है कि पाकिस्तान उसके वित्तीय सहायता का इस्तेमाल चीनी कर्ज की अदायगी में कर सकता है। यही कारण है कि मुद्राकोश ने पाकिस्तान से चीनी कर्ज से संबंधित सभी जानकारियां और वह भी तथ्य परख ढंग से मांगी है। जानना यह भी जरूरी है कि पाकिस्तान के लिए चीन की सहायता से चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा अब पाकिस्तान के लिए गले की हड्डी बन गयी है, चीनी निवेश आधारित आर्थिक गलियारे के निर्माण में पाकिस्तान को अंशदान करने में भारी समस्या हो रही है। मलेशिया से भी पाकिस्तान उम्मीद कर रहा है। मलेशिया से पाकिस्तान हर साल 200 करोड डाॅलर का व्यापार करता है, मलेशिया से पाकिस्तान खाद्य तेल पदार्थ खरीदता है। पर मलेशिया की कोई रूचि है या नहीं, यह स्पष्ट अभी तक नहीं हुआ है।
इमरान खान की सत्ता स्थापित होते ही पाकिस्तान में मूल्य वृद्धि सातवें आसमान पर पहुंच गया है। जन जरूरतों पर आधारित खाद्य वस्तुएं की कीमत काफी बढी हैं। आम आदमी त्राहिमाम कर रहा है, आम आदमी की क्रय शक्ति घट रही है। पाकिस्तान के अंदर कोई ऐसा उद्योग-घंधा भी नहीं है जो आम जनता की समस्याओं को कम कर सके।
इमरान खान के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प एक काल के समान खडे हैं। डोनाल्ड ट्रम्प यह नहीं चाहते हैं कि कोई पाकिस्तान की आर्थिक सहायता करें। पाकिस्तान को जो भी आर्थिक सहायता देगा उसे डोनाल्ड ट्रम्प के तांडव से अभिशप्त होना होगा। डोनाल्ड ट्रम्प आतंकवाद को लेकर पाकिस्तान की गर्दन को मरोडना चाहते हैं। सउदी अरब भी अंदर से डरा हुआ है। मुद्रा कोश को भी डोनाल्ड ट्रम्प की नाराजगी का भान है। अब पाकिस्तान को समझ में आ जाना चाहिए कि दूसरों के घरों में आग लगा कर खुशी मनाने का दुष्परिणाम क्या होता है। जिस चीन के बल पर पाकिस्तान फूलता था वह चीन पाकिस्तान को कंगाल होने से बचाने के लिए क्यों नहीं आगे आ रहा है। पाकिस्तान को अमेरिका और मुद्रा कोश, सउदी अरब के सामने कटोरा लेकर क्यों दौडना पड रहा है? अगर पाकिस्तान अपना भविष्य सुरक्षित रखना चाहता है तो फिर उसे अमेरिका-भारत के साथ रिश्ते मुधर करने ही होंगे, चीनी हथकंडों से मुक्त होना ही होगा, हिंसा की आग पानी डालना ही होगा?


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Tuesday, July 10, 2018

       
                        राष्ट्र-चिंतन
 
       तालिबानी संस्कृति की रही है सहचर / पाकिस्तानी डे का करती थी आयोजन
आसिया अंद्राबी की पाकिस्तानी परस्ती पर प्रहार
               
                   विष्णुगुप्त

 
आसियां अंद्राबी की गिरफ्तारी पर अलगाववादी, विखंडनकारी और पाकिस्तान परस्त बिलबिलाये पडे हैं, उल्टे-पुलटे आरोप जड रहे हैं, भारत सरकार को खलनायक बता रहे हैं, आसिया अंद्राबी को निर्दोष और अपने आप को पीडि़त भी बता रहे हैं, धमकियां दे रहे हैं, कि इसके खिलाफ दुष्परिणाम भयानक होंगे? उल्लेखनीय है कि पाकिस्तानी परस्ती और आतंकवाद का संरक्षण-समर्थन देने के आरोप में तालिबानी संगठन दुख्तरान ए मिल्लत की प्रमुख आसियां अद्राबी को एनआईए ने गिरफ्तार किया है। दुष्परिणाम भयानक क्या होंगे? अलगाववादी, विखंडनकारी और पाकिस्तान परस्त आतंकवादी आतंकवाद का कौन सा अवसर छोड़ते हैं, वे तो आतंकवाद व हिंसा का हर अवसर को लपकने के लिए तैयार होते हैं। उनके आरोप और उनकी चेतावनियां-धमकियां कोई ज्यादा असरकारी होंगी नहीं और न ही भारत सरकार अपना रूख बदलने वाली है, और न ही भारतीय सेना तथा अन्य भारतीय सुरक्षा एजेंसियां अलगाववादियों, विखंडनकारियों और पाकिस्तान परस्तों को कोई रियायत देने के लिए तैयार होंगी।मान-मनव्वल का समय समय समाप्त हो गया है, मान-मनव्वल के समय में अलगाववादियों, विखंडकारियों और पाकिस्तान परस्तों की हर मांग पर सहानुभूति पूर्वक विचार होता था, उनकी हर हिंसा को नजरअंदाज कर दिया जाता था। आखिर क्यों? इसलिए कि इन्हंें शंाति और वार्ता का अवसर दिया जाये। इसलिए सैकड़ों पत्थरबाजों को माफी दी गयी, रमजान के अवसर पर एक तरफा युद्ध विराम किया गया। पत्थरबाजों की माफी और रमजान के अवसर पर एक तरफा युद्ध विराम का दुष्परिणाम क्या निकला, यह कौन नहीं जानता है, आतंकवादी हिंसा बढी, पाकिस्तान की तरफ से फायरिंग बढी। विखंडकारी और पाकिस्तान परस्त यह खुशफहमी पाल रखे थे कि अब भारत सरकार तो कुछ करने ही वाली नहीं है।जब नाउम्मीदी उत्पन्न होती है तब सैनिक-पुलिस कार्यवाही का विकल्प बचता है, भारत सरकार इसी विकल्प का प्रयोग कर रही है। अब आतंकवादी समर्थक राजनीति कश्मीर में नहीं चल सकती है।
       जब-जब लोकतांत्रिक शासन कश्मीर के अंदर अस्तित्व में होता है-तब-तब आतंकवाद और हिंसा बढ जाती है, राष्ट्र विराधी अराजक हो जाते हैं, उनकी अराजकता शांति को भंग करती है, पुलिस और सेना पर हिंसक बन कर टूटती है। लोकतांत्रिक शासन में नरम रूख अख्यिार किया जाता है, सुधरने का अवसर दिया जाता है, इंतजार भी किया जाता है, समस्या के समाधन की पिच भी बनायी जाती है। पर कश्मीर का इतिहास यह कहता है कि जब-जब लोकतांत्रिक शासन ने कश्मीर समस्या के प्रति गंभीरता दिखायी है, समाधान के विन्दु तलाशे हैं, तब-तब पाकिस्तान की पैंतरेबाजी सामने आयी, पाकिस्तान की हिंसक कारस्तानी सामने आयी, पाकिस्तान ने अपने मोहरे संगठनों को हिंसक रूप से सक्रिय कर दिया, हिंसा और आतंकवाद की बर्बर सक्रियता दिखायी। भाजपा ने भी पीडीपी के साथ मिलकर लोकतांत्रित सरकार की स्थापना की थी। पीडीपी की करतूत और पीडीपी की हिंसक व विखंडन प्रक्रिया के साथ दोस्ती जगजाहिर थी , परन्तु भाजपा यह समझती भी थी कि पीडीपी और विखंडनकारियों की दोस्ती जल्द छूटने वाली नहीं है। फिर भी भाजपा ने पीडीपी के साथ मिल कर लोकतांत्रिक सरकार बनायी थी। भाजपा को उम्मीद थी कि अच्छी सरकार और अच्छा प्रशासन का लाभ उठाया जा सकता है, अच्छी सरकार और अच्छा प्रशासन देकर अलगाववादियों, विखंडनकारियों और पाकिस्तान परस्तों की सक्रियता तोडी जाये उनके समर्थन को तोड़ा जाये। पर पीडीपी के अघ्यक्ष महबूबा मुफ्ती की विखंडनकारी सोच टूटी नहीं। महबूबा की सोच हमेशा की तरह विखंडनकारियों के प्रति नरम रही। दरअसल पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती की सोच गलत थी, वह सोचती थी कि भाजपा की मजबूरी के कारण उसकी अराजकता और आतंकवादी समर्थक नीति चलती रहेगी। सेना के अधिकारियों पर मुकदमा चलने लगे, पुलिस और सेना के अधिकारियों का मनोबल तोडा जाने लगा। फलस्वरूप लोकतांत्रिक सरकार दफन हुई। मोदी पर आतंकवादी संगठनों और पाकिस्तान पर कड़ा प्रहार करने का दबाव था।
         आसिंया अंद्राबी जैसे हिंसक और विखंडनकारी और पाकिस्तान परस्त आतंकवादियों को तभी समझ में आ जाना चाहिए था जब भाजपा ने पीडीपी के साथ गठबंधन तोडा था और जम्मू-कश्मीर की सरकार गिरायी थी। नरेन्द्र मोदी सरकार के सामने और कोई दूसरा चारा भी नहीं था। अगर वह आतंकवादियों पर सख्त कार्रवाई करने के लिए तैयार नहीं होती तो फिर उनका आधार ही समाप्त हो जाता। खुद आतंकवादी अपने करतूतों से समर्थन नेटवर्क को जमींदोज किये हैं।आतंकवादी संगठन के पाकिस्तान परस्ती एक अहम प्रश्न है,पाकिस्तान परस्ती के कारण कश्मीर के आतंकवादी संगठनों की छवि हमेशा खराब रहती है। पाकिस्तान अब पहले की तरह मजबूत नहीं है, पहले की तरह वह अतंराष्ट्रीय स्तर पर भारत विरोधी भावनाएं नहीं भडका सकता है, क्योंकि उसकी छवि एक आतंकवादी देश की है, दुनिया यह जान चुकी है, दुनिया यह मान चुकी है कि पाकिस्तान दुनिया भर में आतंकवाद का आउटसोर्सिंग करता है, कश्मीर में पाकिस्तान ही आतंकवादी हिंसा की जड में है। भारत अब मजबूती के साथ दुनिया के नियामकों के अंदर में पाकिस्तान परस्त आतंकवाद का पोल खोलते रहा है और दुनिया को आईना दिखाता रहा है कि पाकिस्तान परस्त आतंकवाद सिर्फ भारत के लिए नहीं बल्कि पूरी मानवता के लिए खतरनाक है।
          आसियंा अंद्राबी के आतंकवादी कारनामें कोई छोटे नहीं है, इनके आतंकवादी कारनामे नजरअंदाज करने वाले नहीं हैं। इनके कारनामे बडे हिंसक है, इनके कारनामें बडे खतरनाक हैं, इनके कारनामे मानवता के शर्मसार करने वाले हैं, इनके कारनामे तालिबानी हैं। इनकी मानसिकता आईएस की है, इनकी मानसिकता अलकायदा की है।  इस्लाम की हिंसा भूत बन कर इनके सिर पर नाचता रहा है। कश्मीर के अंदर वह तालिबानी शासन लागू करना चाहती थी, इसके लिए वह हिंसा का सहारा लेती थी। बुर्का पहनना वह अनिवार्य करना चाहती थी, बुर्का के समर्थन में वह अभियान भी चलायी थी। वह किसी भी स्थिति में कश्मीर के अंदर कैफे संस्कृति विकसित नहीं होने देना चाहती थी, कैफे जाने वाली लड़कियों पर हमला कराने का आरोप भी उस पर लगा था। वह कहती थी कि हर स्त्री को बुर्का पहनना अनिवार्य है और इस्लाम के अनुसार स्वीकार है। बुर्का न पहनने वाली महिलाएं और लडकिया इस्लाम विरोधी हैं, वह यह भी कहती थी कि जो महिलाएं और जो लडकियां इस्लाम का आदेश न मानकर बुर्का नहीं पहनती है वे सभी महिलाएं और लडकियां सजा की लायक हैं। आसियां आद्राबी के अभियान से प्रेरित होकर कई युवकों ने बुर्का न पहलने वाली लडकियों पर हिंसा भी बरपायी थी। आसिया की इस तालिबानी करतूत की कश्मीर में बडी आलोचना भी हुई थी। उदार संस्कृति के पक्षधर लोगों के बीच आसिया आद्रांबी डर पैदा करती थी। 
           आसिया अंद्राबी पर पाकिस्तान परस्ती हमेशा हावी रहती है। वह कहती है कि उसे पाकिस्तान में मिलना है, उसका संघर्ष पाकिस्तान के लिए है। पाकिस्तान में उसे मजहबी शांति मिलेगी। वह भारत को काफिर देश कहती है। काफिर की मानसिकता क्या है? काफिर की मानसिकता बड़ा ही खतरनाक और जहरीली है। गैर मुस्लिमों को काफिर कहा गया है। इस्लाम में काफिर का नामोनिशान मिटाने का आदेश है। सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि वह हर साल पाकिस्तान डे मनाती है। पाकिस्तान डे पर वह न केवल पाकिस्तान की प्रशंसा करती है बल्कि भारत के खिलाफ आग उगलती है। भारत को वह हिंसक देश कहती है। 
          अब तक उसे पाकिस्तान डे मानाने की आजादी कैसे मिली? भारत सरकार की कमजोरी का लाभ उसने खूब उठाया है। भारत में रहकर पाकिस्तान परस्ती किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं है। एनआईए ने आसियां आद्राबी को गिरफ्तार कर प्रहारक संदेश दिया है। विखंडनकारी और हिंसक आतंकवादियों को इसके संदेश समझ लेना चाहिए। अब उनकी पाकिस्तान परस्ती चलने वाली नहीं है। दुनिया भी अब उनकी पाकिस्तान परस्ती पर संज्ञान लेने वाली नहीं है। दुनिया अब कश्मीर की आतंकवादी हिंसा की जड समझ चुकी है। कश्मीर में पाकिस्तान परस्त आतंकवादी संगठनों की सबसे बडी शक्ति भारत और दुनिया के मानवाधिकार संगठन रहे हैं। पर मानवाधिकार संगठन अब खूद ही संदेह के घेरे में हैं। दुनिया की जनमत मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्ट पर विश्वास नहीं कर रही है। मानवाधिकार संगठन यह कहते हैं कि आतंकवादियों के भी मानवाधिकार हैं पर दुनिया की जनमत अब कहती है कि आतंकवादियों द्वारा मारे गये निर्दोष लोगों और आतंकवादियों की हिंसा से प्रभावित लोगो के भी मानवाधिकार हैं। इसीलिए आसिया आद्राबी की गिरफ्तारी पर कोई बडा देश या बडा नियामक विरोध में सामने नहीं आये हैं।
सेना और पुलिस के दबाव से पाकिस्तान परस्त आतंकवादी संगठनों के हौसले पस्त हैं। कई कुख्यात आतंकवादी सरगानाए मारे गये हैं। भारत सरकार को अब किसी भी स्थिति में विखंडनकारियों को कोई अवसर नहीं दिया जाना चाहिए, क्योंकि ये विखंडनकारी शांति और सदभाव की बात सुनते ही नहीं है। अब पाकिस्तान परस्त आतंकवाद पर अंतिम कील ठोकने की जरूरत है। इसकी शुरूआत आसिया आद्राबी की गिरफ्तारी से हो चुकी है।


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Friday, October 28, 2011

वोट के चश्मे से सेना को देखना बंद करो

राष्ट्र-चिंतन
      
  सशस्त्र बल विशेष शक्तियां अधिनियम पर राजनीति क्यों?
वोट के चश्मे से सेना को देखना बंद करो
विष्णुगुप्त


अमेरिका विदेशी राष्टों-कूटनीतिज्ञों के जांच से परे होने का अंतर्राष्टीय अधिकार का सम्मान नहीं करता। विदेशी राष्टाध्यक्षों और कूटनीतिज्ञों को लाइन में खड़ा कर सुरक्षा जांच होती है। विदेशी कूटनीतिज्ञों को कपड़े उतारवा कर भी जांच होती है। तत्कालीन भारतीय रक्षा मंत्री जार्ज फर्नाडीस को अमेरिका के हवाई अड्डे पर कपड़े उतरवा कर सुरक्षा जांच हुई थी। अमेरिकी सेना कई विशेष अधिकार वाले कानूनों से लैश है। दुनिया भर में मानवाधिकारों के शोर के बाद भी अमेरिका की सुरक्षा नीति प्रभावित नहीं हुई। यही कारण है कि वल्र्ड ट्रेड सेंटर पर हुए अलकायदा के हमले के बाद आज तक अमेरिका में और कोई हमला नहीं हुआ है। आतंकवादियों और आतंकवादियों के संरक्षक संवर्ग के लिए मानवाधिकार का कवच क्यों? आतंकवादियों के हमले का शिकार होने वाले लोगों का कोई मानवाधिकार नहीं होता है क्या? हमारे देश में सेना और सेना के सशस्त्र बल विशेष शक्तियां अधिनियम को कोसने का एक ऐसा फैशन है जिसकी एक्सरसाइज कभी रूकती ही नहीं है।
दुनिया में भारत ही एक ऐसा देश है जहां पर सेना और देश की सुरक्षा को भी राजनीतिक वोट के नजरिये से देखा जाता हैं। इतना भर ही नहीं बल्कि वोट के नजरिये से सेना व देश की सुरक्षा को कोपभाजन बनाने और संकट में डालने की कोई कसर नहीं छोड़ी जाती है। राजनीतिक हमलों-साजिशों के बावजूद भी हमारी सेना न केवल अनुशासित है बल्कि दुनिया भर में शांति मिशनों की सफलता में सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। संयुक्त राष्टसंघ के शांति अभियानों में भारतीय सेना की भूमिका अद्वितीय है। दुनिया के संकटग्रस्त-हिंसाग्रस्त और गृहयुद्ध जैसी स्थिति से निपटने में सभी पक्षों द्वारा भारतीय सैनिकों की मांग यह साबित करती है कि हमारी सेना दुनिया के सभी सेना संवर्ग में सबसे अधिक शील और मानवाधिकारों के प्रति जवाबदेह है। पक्षपात जैसी ग्रंथिया हमारी सेना ढोती नहीं। दुनिया भर में अपने लिए अनुशासन और मानवाधिकार के प्रति जवाबदेही हासिल करने वाली हमारी सेना अपने घर में ही आलोचना और राजनीतिक साजिशों का शिकार रही है। जबकि हमारी भगोलिक सीमा पर कैसी संकट है यह भी जगजाहिर है। पड़ोसी देशों के प्रत्यारोपित आतंकवाद से हमारी सेना न केवल जूझ रही है बल्कि अनगिनित कुर्बानियों देकर राष्ट की एकता और अखंडता का बोझ ढो रही है। सेना के दबाव के सामने प्रत्यारोपित व आउटसोर्सिंग आतंकवाद जब-जब दम तोड़ते दिखता है तब तब सेना के हाथ-पांव बांध देने की राजनीति चलती है। शांति प्रक्रिया के नाम पर सेना के आतंकवाद विरोधी अभियानों पर ब्रजपात होता है तो कभी दुर्दांत आतंकवादियों को छोड़ने व उनका सम्मान करने की सत्ता राजनीति चलती है। ऐसे में सेना का पूरा तंत्र जोश और होश क्यों नहीं खोयेगा? सुखद स्थिति यह है कि इतनी राजनीति और साजिश के बाद भी भारतीय सेना ने जोश और होश अभी तक नहीं खोयी है। संवैधानिक लोकतंत्र के दायरे में सेना अपने आप को अराजकता से दूर और जवाबदेही से पूर्ण है।
हाल के दिनों में सशस्त्र बल विशेष शक्तियां अधिनियम के खिलाफ गंभीर चर्चा हो रही है। खासकर बुद्धीजीवी संवर्ग का निशाना है कि सशस्त्र बल विशेष शक्तियां अधिनियम मानवाधिकार हनन का हथकंडा बन गया है। सेना इस अधिनियम का दुरूपयोग करती है और निर्दोष नागरिकों के मानवाधिकार का हनन करती है। इसलिए इस अधिनियम को समाप्त कर देना ही सर्वोत्तम विकल्प है। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुला के बयानों से सशस्त्र बल विशेष शक्तियां अधिनियम को लेकर सेना और गृहमंत्रालय परेशानी में है। उमर अब्दुला ने कश्मीर के कुछ जिलों से सेना का यह विशेषाधिकार समाप्त करना चाहते हैं और इसकों लेकर उनका सार्वजनिक बयानबाजी कुछ ज्यादा ही तेज है। उमर अब्दुला ने सेना को आलोचना को शिकार भी बनाया। सेना के आपत्ति के बाद उमर अब्दुला सेना के पक्ष में बयानबाजी करने और आतंकवाद से लड़ने में सेना की भूमिका की प्रशंसा करने की नीति पर चलने को बाध्य हुए हैं। फिर भी उमर अब्दुला का सेना के इस विशेषाधिकार के खिलाफ अभियान जारी है। सेनाध्यक्ष वीके सिंह ने साफतौर पर कहा है कि सशस्त्र बल विशेष अधिनियम हटा लेने के बाद सीमा चैकियों और आतंकवाद ग्रस्त भूभागों की समस्याएं विकराल होगी। आतंकवाद ग्रस्त भूभागों में सेना की तैनाती का कोई अर्थ नहीं रह जायेगा। दम तोड़ता प्रत्यारोपित आतंकवाद फिर से सिर उठा कर देश की एकता को खंडित करने के लिए शक्ति हासिल करेगा। राजनीतिक संवर्ग को इस सच्चाई से अवगत कयों नहीं होना चाहिए? फिलहाल सेना अध्यक्ष वीके सिंह संतुति गृहमंत्रालय के पास विचाराधीन है। गृहमंत्रालय को यह निर्णय लेना है कि सेना के पास यह विशेषाधिकार रहना चाहिए या नहीं।
सर्वोत्तम स्थिति यह है कि सेना को हमेशा बैरकों में ही रहना चाहिए। आबादी वाले इलाकों में सेना की सक्रियता खतरनाक मानी जानी चाहिए? पर सवाल यहां यह है कि क्या हमारे देश की आतंरिक व वाह्य स्थितियां ऐसी है कि सेना और अन्य सुरक्षा बलों को उनके बैरकों तक ही सक्रियता सुनिश्चित रखी जानी चाहिए। ऐसा सभ्य समाज या आतंरिक-वाह्य चुनौतियों से दूर रहने वाले देशों में ही हो सकता है कि सेना सिर्फ बैरकों में ही अपनी गतिविधियां-सक्रियता सुनिश्चित रख सके। भारत जैसे हिंसाग्रस्त और आतंकवाद से घायल देश में यह संभव ही नहीं है कि सेना को बैरकों तक सीमित रख छोड़ा जाये। वाह्य -आतंरिक सुरक्षा की चुनौतियां हमारे सामने किस प्रकार की विकट है यह भी जगजाहिर है। जम्मू-कश्मीर में हम जहां पाकिस्तान प्रायोजित और आउटसोर्सिंग आतंकवाद के शिकार हैं वहीं पूर्वोत्तर का पूरा इलाका चीन जैसे खतरनाक पड़ोसियों की साजिशों के चक्रव्यूव में हमारी सुरक्षा नीति है। जम्मू-कश्मीर में सेना के अथक प्रयासों और बेहिसाब कुर्बानियों के बदौलत ही हम आतंकवाद पर अंकुश लगाने में कामयाब हुए हैं। आतंकवादियों की पूरी रणनीति सेना के दबाव मेें दम तोड़ रही है। जम्मू-कश्मीर में आतंकवादियों के हमले और आतंकवादियों की धुसपैठ में आयी कम इस बात का प्रमाण है कि सेना का चाकचैबंद कार्रवाइयां पड़ोसी देश के नापाक इरादों को कुचल रही हैं। यह स्थितियां कोई राजनीतिक पहल या कठोरता से नहीं बनी हुई हैं बल्कि सेना के सीमा की सुरक्षा और देश की सुरक्षा के प्रति समर्पण से बनी हुई हैं।जहां तक पूर्वोतर का सवाल है तो पूरा पूर्वोतर ही उग्रवाद के शिकंजे मे कैद है। जहां पर चीन की टेढी नजरें हमेशा सेना की चुनौतियां विकराल करती रही हैं।
हमनें नरम नीति या फिर पड़ोसियों पर भरोसा कर देख लिया है और इसके दुष्परिणामों को भी राष्ट ने भुगता है। जब-जब आतंकवाद दम तोड़ता दिखता है और पड़ौसियों के नापाक इरादे कैद में होते हैं तब-तब नरम नीति या फिर आतंकवादियों से शांति प्रक्रिया की समझ विकसित होती है। नरम नीति या फिर शांति की प्रक्रिया से आतंकवाद और मजबूत होकर खड़ा होता है। पड़ोसी देशों का कुचक्र और तेज होता है। अटल बिहारी वाजपेयी ने पाकिस्तान से दोस्ती की आस में सेना के हाथ बाध दिये थे। आतंकवादियों और आतंकवाद के आउटसोर्सिंग करने वाले देश के साथ शांति प्रक्रिया चलायी गयी। सीमा पर सेना के हाथ बांध कर रखे गये थे। फलस्वरूप राष्ट ने कारगिल जैसे हमले भुगते। कारगिल को मुक्त कराने के लिए सैकड़ो सैनिकों को कुर्बानियां देनी पड़ी थी। विकास के अरबों डालर रूपये कारगिल को पाकिस्तान सैनिकों से मुक्त कराने के लिए लगाये गये। दुनिया भर में आतंकवाद के खिलाफ आवाज तेज हो रही है और पाकिस्तान को कठघरे में खड़ा कर किया जा रहा है पर भारत पाकिस्तान के आतंकवाद के आउटसोर्सिंंग पर खामोश क्यों है?
    साखकर कश्मीर में सेना को किन विकट परिस्थितियों में काम करना पड़ता है उस पर भी गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। पत्थर फेंकने वाली बलवायी भीड़ सरेआम सरकारी प्रतिष्ठानों और सैनिकों के बैरकों में आग लगाती है। पड़ोसी देशों के झंडेु फहराये जाते हैं। सीमा पार कर आने वाले आतंकवादी आबादी में शरण लेकर अपनी खूनी कारवाइयों को अंजाम देते हैं। ऐसी स्थिति में सेना पर अतिरिक्त दबाव आना स्वाभाविक है। मानवीय भूल से कुछ निर्दोष लोग भी उत्पीड़न का शिकार होते हैं। यह सही है। फिर भी जिन स्थितियों में भारतीय सेना आतंकवाद से जूझ रही है उस स्थिति के मद्देनजर हमारी सेना सबसे अधिक शील और मानवाधिकारों के प्रति सचेत-समर्पित है।
हमारे राजनीतिक संवर्ग और सत्ता संस्थान को दुनिया के उन देशों से सबक लेना चाहिए जिन्होंने आतंकवाद से लड़ने के लिए अपने कानूनों को कठोर बनाया। पुलिस -सेना को विशेष अधिकारों से लैश किया। अमेरिका -ब्रिटेन आज अपने विशेष कानूनों के बल पर ही आतंकवादियों के नापाक इरादों से मुक्त है। अमेरिका में विदेशी राष्टाध्यक्षों को लाइन में खड़ा कर तलाशी ली जाती है। भारत को आतंकवाद और देश की सुरक्षा की कसौटी पर ही सशस्त्र बल विशेष शक्तियां अधिनियम को देखना चाहिए।

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