राष्ट्र-चिंतन
बुर्का प्रतिबंध और विरोध की इस्लामिक रुढ़ियां
विष्णुगुप्त
फ्रांस में बुर्के पर प्रतिबंध की चर्चा थोड़ा बाद में। पहले मैं अपना तीस साल पुराना अनुव बताना चाहता हूं। 1980 की घटना है। जनता पार्टी सरकार के पतन के बाद हुए लोकसा चुनाव से जुड़ा प्रसंग है। तब मैं एक प्रतिबद्ध राजनीतिक कार्यकर्ता था और बूथ पर अपने संबंधित दल का बूथ एजेंट था। बुर्के की आड़ में तब चार-पांच महिलाओं ने ही पूरी मुस्लिम महिलाओं के बोगस वोट डाल दिये। विरोध दर्ज कराने पर सांप्रदायिक स्थितियां उत्पन्न हो गयी। मतदानकर्मी लाचार थे। लोकतंत्र का कबाड़ा निकल चुका था। लोकतंत्र का यह कबाड़ा न सिर्फ हमारे बूथ पर निकला था बल्कि अन्य बूथों का ी यही हाल था। उस समय पहचान पत्र जैसी बाध्यता ी नहीं थी। ताकि चेहरा न सही पहचान पत्र को देख कर ही, सही-गलत मतदान का अनुमान लगाया जा सके। इसलिए बुर्का सिर्फ महिलाओं का आवरण र न होकर बल्कि कई मजहबी हिंसाओं, रुढ़ियों और विचार प्रवाहों को गति देने का ढ़ाल समझा जाना चाहिए। समानता के अधिकार का हनन तो होता ही है, इसके अलावा दुनिया में सुरक्षा के नये-नये संकटों को और गंीर बनाता है। सुरक्षा के दृष्टिकोण पर ी बुर्का की मजहबी नीति खतरनाक मानी जानी चाहिए। ांस को इस समस्या के समाधान के लिए और मुस्लिम महिलओं को गुलामी का स्थायी प्रक्रिया से निकालने के लिए साधुबाद।
मुस्लिम महिलाओं के हक में अच्छी खबर मानी जानी चाहिए कि फ्रांस ने अपने यहां बुर्का पर प्रतिबंध लगा दिया है। बुर्का पर न केवल प्रतिबंध लगाया गया है बल्कि बुर्का पहने और पहनाने वाले लोगों को दंड विधान का दोषी ठहराया गया है। दंड विधान के तहत बुर्का पहने वाली महिलाओं पर 150 यूरो और बुर्का पहनने के लिए बाध्य करने वाले पुरुषों को 30 हजार यूरो का दंड लगेगा। एक साल की सजा ी होगी। फ्रांस के इस कदम पर वैश्विक प्रतिक्रिया काफी गहरी है और विवाद का कूटनीतिक स्वरूप तेजी से विकसित होगा। अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने जहां इस पर असहमति दर्शायी है वही इस्लामिक दुनिया ने इसे इस्लाम के प्रति अनादर घोषित किया है। इस्लामिक दुनिया ने फ्रांस पर सीधा आरोप लगाते हुए कहा है कि बुर्का पर प्रतिबंध से मुस्लिमों की आवाज व व्यक्तिगत आजादी पर ताला लगेगा। दुनिया के कई मानवाधिकार संगठनों की राय इस्लामिक दुनिया से मेल खाती है। इस्लामिक दुनिया और मानवाधिकार संगठनों की जुगलबंदी से यह जरूर आास होता है कि इस सूचना क्रांति के विस्फोट के दौर में ी मजहबी रुढ़ियों के खिलाफ आवाज उठाना या फिर उसे समाप्त करने की संवैधानिक संघर्ण और निर्णय करने के बाद ी कैसी कूटनीतिक-मजहबी प्रक्रिया चलेगी और सामना करना पड़ेगा। जिसकी आग से बचना मुश्किल है। जबकि बुर्के पर प्रतिबंध को लेकर कई सालों तक वाद-विवाद की लम्बी प्रक्रिया चली। बहसे हुई। सर्वेक्षणों में प्रतिबंध पर बहुमत रायशुमारी थी।
बुर्के पर प्रतिबंध की परिस्थितियां अचानक उत्पन्न हुई है क्या? सही में इस्लामिक आबादी की व्यक्तिगत आजादी को कुचलने की नीयत से बुर्के पर प्रतिबंध जैसी संवैधानिक प्रक्रिया चलायी गयी है? अब फ्रांस का धर्मनिरपेक्ष स्वरूप खंडित हो जायेगा क्या? क्या इसे मुस्लिम समाज की आधी आबादी को उत्पीड़न और गुलामी जैसी मानसिकता से निजात दिलाने का सत्यकर्म माना जाना चाहिए? ये सी प्रश्न अति महत्वपूर्ण हैं। फ्रांसीसी समाज में बुर्के के खिलाफ परिस्थितियां अचानक नहीं बनी है। पिछले एक दशक से फ्रांस में बुर्के को लेकर राजनीतिक गर्मी उत्पन्न हो रही थी। कई मजहबी विचार प्रक्रियाओं से जुड़कर बुर्के का प्रश्न खतरनाक माना गया। फ्रांस के धर्मनिरपेक्ष समाज में बुर्का कांटे की तरह चु रहा था। फ्रांस के वर्तमान राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी से पहले तत्कालीन राष्ट्रपति जाक शिराक ने बुर्के को गंीरता से लिया था। जॉक शिराक ने महसूस किया था कि फ्रांस की धर्मनिरपेक्ष समाज में बुर्के की मजहबी नीति ने केवल कट्टरता का विस्तार कर रहा है बल्कि आधी आबादी को मजहबी मानसिकता के आ़ड लेकर शोषण और उत्पीड़न का माध्यम ी बना रहा है। प्राथमिक विद्यालयों से लेकर कार्यस्थलों व सुरक्षा नियामकों तक बुर्का के कारण असुविधा उत्पन्न हो रही थी। हेड स्कार्फ से स्कूलों में गैर मुस्लिम बच्चों और मुस्लिम बच्चों में ेदाव और घृणा की दीवार खतरनाक ढंग से चौड़ी हो रही थी। मुस्लिम मदरसों में हेड स्कार्फ को लेकर समस्या थी नहीं पर सामान्य स्कूलों में हेड स्कार्फ से सीधेतौर पर मजहबी पहचान रेखांकित होती थी। फ्रांस की राजनीतिक इकाई ने 2004 में संसद में प्रस्ताव पारित कर स्कूलों और कालेजों में हेड स्कार्फ पर प्रतिबंध लगा दिया था। फ्रांस के स्कूल कालेज आज मजहबी पहचान से परे हैं।
बुर्का पहनना या न पहनना महिलाओं का व्यक्तिगत अधिकार है। मुस्लिम महिलाएं अपनी मर्जी से बुर्का पहनती है क्या? क्या बुर्का पहनने या फिर अन्य मजहबी रुढ़ियों के शिकार बनने के लिए मजहबी ठेकेदार औरतों को बाध्य नहीं करते है। फ्रांस की तरह हमारे देश में बुर्का सहित अन्य मजहबी पहचान एक संकट के तौर पर खड़ा है। साख कर आतंकवाद जैसी वीीषिका के दौर में। जांच एजेंसियों को बुर्का जैसी समस्या से हमेशा दो-चार होना पड़ता है। फ्रांस ने बुर्के पर प्रतिबंध लगाकर राजनीतिक शक्ति दिखायी है। फ्रांस के इस कदम का कूटनीतिक और राजनीतिक समर्थन की जरूरत है। मुस्लिम महिलाओं की आजादी के तौर पर ही इसे देखा जाना चाहिए। सही तो यह है कि देश के बुद्धिजीवी और धर्मनिरपेक्ष तबका हमेशा से मुस्लिम सवाल का हितरक्षक के तौर पर खड़े होते हैं।
ब़ुर्का की आड़ में यह खेल......
फ्रास में 65 लाख से अधिक मुस्लिम आबादी है। मुस्लिम आबादी न केवल फ्रांस के वििन्न बड़े शहरों में बसी है बल्कि ग्रामीण पृष्ठूमि और व्यवस्था में ी मुस्लिम आबादी का दबदबा गहरा है। फ्रांस में एशिया और अफ्रीका मूल की मुस्लिम आबादी है जो दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद ांस में जाकर बसी थी। ांस ही नहीं बल्कि पूरे यूरोप में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अतिरिक्त मानव संसाधन की आवश्यकता थी। अतएव सहित पूरे यूरोप ने मुस्लिम आबादी का स्वागत अपने यहां पूरे मनोाव से किया था। यूरोप का खुल्ला समाज ने मुस्लिम आबादी को पलने-बढ़ने का अवसर दिया। की श्रमिकों और कारीगरों के तौर पर गयी मुस्लिम आबादी आज गोरी आबादी के समकक्ष खड़ी हो गयी। फ्रांस का समाज पूरे यूरोप ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में अपने तरह का अकेला है जहां पर धर्मनिरपेक्षता और समान व्यवहार की धारा बहती है। धार्मिक और व्यक्तिगत आजादी की ी धारा की बाधित नहीं होती है। पर मुस्लिम आबादी अब कट्टरता का खेल-खेल रही है। मजहबी कट्टरता का खतरनाक प्राव तो पत्रडा ही है इसके अलावा अपने लिए अलग कानून व्यवस्था की मांग ी मुस्लिम आबादी कर रही है। मुस्लिम आबादी की यह राजनीतिक प्रक्रिया यूरोप को मजहबी खाई में त्रढकेल रही है। बुर्का सहित अन्य रुत्रिढयों को बनाये रखने के पीछे का राजनीतिक खेल यही है।
म़ुस्लिम देशों की प्रतिक्रिया क्यों?......
मुस्लिम देशों का खुद का आईना कितना खतरनाक है, यह बात किसी से छुपी हुई है क्या? मुस्लिम दुनिया ने बुर्के को इस्लाम से जोड़कर मजहबी व व्यक्तिगत आजादी का कुठराधात करार दिया है। खुद मुस्लिम दुनिया औरतों के प्रति कितना सहिष्णुता रखता है, यह बताना पड़ेगा क्या? अी हाल ही में सउदी अरब का एक प्रसंग की चर्चा करना जरूरी जान पड़ता है। एक जोड़ा एक रेस्टोरेंट में एक-दूसरे के हाथ पकड़े हुए बैठा था। उस विदेशी जोड़े को हाथ पर हाथ धरे बैठना मंहगा पड़ा और उसे इस्लामिक कानूनों के खिलाफ मान लिया गया। कई दिनों तक उस जोड़ों को जेलों में गुजारना पत्रडा। उसके बाद जाकर रिहाई सुुनिश्चित हुई। मुस्लिम दुनिया यूरोप और अन्य गैर मुस्लिम देशों में इस्लामिक मूल्यों का सम्मान चाहता है। इसमें कोई अचरज की बात नहीं होनी चाहिए। पर हमें यह ी देखना होगा कि मुस्लिम दुनिया का खुद का चेहरा कितना निरापद है? टीबी देखना, एडल्ट फिल्म देखना और इंटरनेट की संपूर्ण प्रक्रिया से जुड़ना गैर इस्लामिक माना जाता है। कई मुस्लिम देशों में इंटरनेट की सोशल व पोर्न साइटों पर पूर्ण प्रतिबंध है। इन सी गैर इस्लामिक प्रक्रियाओं का ग्राह गैर इस्लामिक आबादी पर क्यों लादा जाता है। क्या बुर्का पर सवाल उठाने वाले मुस्लिम देश इसका जवाब देंगे? मुस्लिम देशों में गैर मुस्लिम आबादी का टीवी देखना, पोर्न साइट देखना आदि क्या व्यक्तिगत आजादी नहीं है। फिर क्यों गैर मुस्लिम आबादी को इस्लामिक कानूनों का ग्राह बनाया जाता है।
म़जहबी रूढ़ियां और महिलाएं.......
धार्मिक समूहों में परस्पर विचार की प्रक्रिया चलाने और समानता का आधार विकसित करने में इस्लाम की रुढियां खलनायक साबित होती है। इस्लाम को छोत्रडकर अन्य धार्मिक समूहों में रुत्रिढयों के खिलाफ सतत संघर्ष चलता है और अधिकतर रुढ़िया दम ी तोड़ चुकी है। पर जहां इस्लाम की बात आती है तो बर्बरकालीन रुढ़ियां अी ी खतरनाक ढंग से चली आ रही हैं। खासकर महिलाओं के खिलाफ इस्लामिक रुढ़िया सर चत्रढकर बोलती हैं। पुरुष गैर इस्लामिक हरकत कर सकता है। शराब पी सकता है, गलत ढंग से दौलत अर्जित कर सकता है, परóी पर गलत नजर डाल सकता है, पर उस पर इस्लामिक रुढ़िया काल नहीं बनती। आखिर महिलाओं को ही रुढ़ियों का शिकार क्यों बनाया जाता है। बुर्का पहना कर चाहारदीवारी में कैद रखना, आधुनिक तो क्या बल्कि प्राथमिक शिक्षा से ी दूर रखना और बात-बात पर तलाक दे देना क्या आधुनिक समाज व्यवस्था की आदर्श स्थिति है? पाकिस्तान-अफगानिस्तान तालिबान ने लड़कियों के सैकडों स्कूलों को जला कर राख करने का काम किया है। स्कूल जाने वाली लड़कियों पर तेजाब फैंक कर मारने जैसी मजहबी प्रक्रिया इस्लामिक रुढ़ियां से ही निकलती हैं। आखिर कब तक महिलाओं को मजहबी रुढ़ियों का शिकार बनाया जाता रहेगा?
द़ेशी बुद्धिजीवियिो को सन्निपात........
बुर्के पर प्रतिबंध फ्रांस में लगा है पर आोशित हमारे देश के तथाकथित बुद्धिजीवी और धर्मनिरपेक्ष समाज है। मुस्लिम धर्म संस्थानों की प्रतिक्रिया तो बुर्के पर प्रतिबंध के खिलाफ होगी ही। बुद्धिजीवी और धर्मनिरपेक्ष तबका लाल-पीला क्यों हो रहा है? इस पर इनका स्वार्थ क्या हो सकता है। बुद्धिजीवी और धर्मनिरपेक्ष तबका कहता है कि बुर्के पर प्रतिबंध लगा कर फ्रांस ने व्यक्ति की धार्मिक आजादी को तोड़ा है। धर्मनिरपेक्ष तबका का मुस्लिम परस्त नीति सामने आयी थी। गुड़िया प्रकरण में भी बुद्धीजीवियों और तथाकथित धर्मनिरपेक्ष तबके का मुस्लिम परस्त चेहरा सामने आया था।
बुर्का पहनना या न पहनना महिलाओं का व्यक्तिगत अधिकार है। मुस्लिम महिलाएं अपनी मर्जी से बुर्का पहनती है क्या? क्या बुर्का पहनने या फिर अन्य मजहबी रुढ़ियों के शिकार बनने के लिए मजहबी ठेकेदार औरतों को बाध्य नहीं करते है। फ्रांस की तरह हमारे देश में बुर्का सहित अन्य मजहबी पहचान एक संकट के तौर पर खड़ा है। साख कर आतंकवाद जैसी वीीषिका के दौर में। जांच एजेंसियों को बुर्का जैसी समस्या से हमेशा दो-चार होना पड़ता है। फ्रांस ने बुर्के पर प्रतिबंध लगाकर राजनीतिक शक्ति दिखायी है। फ्रांस के इस कदम का कूटनीतिक और राजनीतिक समर्थन की जरूरत है। मुस्लिम महिलाओं की आजादी के तौर पर ही इसे देखा जाना चाहिए। सही तो यह है कि देश के बुद्धिजीवी और धर्मनिरपेक्ष तबका हमेशा से मुस्लिम सवाल का हितरक्षक के तौर पर खड़े होते हैं।
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Saturday, July 17, 2010
Thursday, July 15, 2010
कश्मीर में ‘आतंकवादी मनी‘ के प्रवाह पर चिंता मुक्त क्यों?
राष्ट्र-चिंतन
कश्मीर में ‘आतंकवादी मनी‘ के प्रवाह पर चिंता मुक्त क्यों?
विष्णुगुप्त
हुर्रियत के सभी नेता कभी न कभी आतंकवादी रहे हैं और इनके हाथ कश्मीरी अवाम व सुरक्षा बलों के खूनों से रंगे हुए हैं। प्रत्यक्ष आतंकवाद की जगह जनसंगठन का बुर्का पहन कर हुर्रियत के नेता खड़े हो गये। उनकी इस चालाकी और पैंतरेबाजी का खाद-पानी हमारी सत्ता व्यवस्था की उदासीनता से मिला। हम कभी भी हुर्रियत के असली मंशा और उसकी आतंकवादी प्रक्रिया का सही आकलन और विश्लेषण नहीं की और कश्मीर सहित लद्दाख व जम्मू की जनता का भी असली प्रतिनिधि हुर्रियत को ही मान लिया गया। हुर्रियत की पाकिस्तान परस्ती नीति क्या ओझल है। सही तो यह है कि हुर्रियत के नेताओं ने पूरे कश्मीर में मुफ्तखोरी और आतंकवादी बन कर एसोआराम ही नहीं बल्कि भोग-बिलास की जिंदगी जीने की प्रक्रिया चलायी है। इस दुष्चर्क में हुर्रियत के साथ भारत सरकार बराबर का खलनायक है।
उदाहरण के लिए हुर्रियत के प्रायः सभी नेताओं का जीवन शैली देख लीजिए। उनके पास चमकीली और तड़क-भड़क जिंदगी के लिए आय के स्रोत कौन सा है? अधिकतर हुर्रियत नेताओ की आय का स्रोत शून्य है। फांकेकशी की जिंदगी जीने वाले हुर्रियत नेताओं की जिंदगी आतंकवादी बनते ही बदल गयी। उनके पास विदेशी वीवी, महंगी कारें, आलीशान आवास सहित भोग-बिलास की अन्य सभी सुख-सुविधाएं रातोरात मिल गयी। पाकिस्तान ही नहीं बल्कि अमेरिका-युरोप के दौरे पर आमंत्रित होने लगे। भारत सरकार द्वारा हुर्रियत के नेताओं की शान-शौकत बढ़ाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी गयी। मीडिया में दिन-प्रतिदिन उनकी तस्वीरें लहलहाती हैं। मुबंई हमले में जिंदा पकड़ा गया आतंकवाद कसाब को भी पुरस्कार में लाखों रूपये देने के साथ ही साथ कश्मीरी लडक्रियों से संगत कराने का लालच दिया गया था। ऐसी स्थिति में कश्मीर के युवाओं ही नहीं बल्कि पूरे आवाम में हुर्रियत नेता उनके प्रतीक और प्रेरणास््रत्रोत बन जाते हैं। आज कश्मीर के युवा संवर्ग अपने मेहनत के बल पर अपनी जिंदगी चमकीली बनाने की जगह पत्थरबाजी जैसी खतरनाक-खूनी प्रक्रिया से जुड़ रहे हैं और हुर्रियत-आतंकवादियों के जाल में फंस कर अशांति के कारण बने हुए हैं।
फांकेकशी की जिंदगी जीने वाले हुर्रियत नेताओं की जिंदगी आतंकवादी बनते ही बदल गयी। उनके पास विदेशी वीवी, महंगी कारें, आलीशान आवास सहित भोग-बिलास की अन्य सभी सुख-सुविधाएं रातोरात मिल गयी। मीडिया में दिन-प्रतिदिन उनकी तस्वीरें लहलहाती हैं। ऐसे में कश्मीर के युवाओं में हुर्रियत नेता उनके प्रतीक और प्रेरणास््रत्रोत बन जाते हैं। आज कश्मीर के युवा संवर्ग अपनी मेहनत के बल पर अपनी जिंदगी चमकीली बनाने की जगह पत्थरबाजी जैसी खतरनाक-खूनी प्रक्रिया से जुड़ रहे हैं। हुर्रियत के नेताओ की भोग-बिलास की जिंदगी कानूनों के दायरे में क्यों नहीं लाया जाना चाहिए।
हुर्रियत संवर्ग या फिर आतंकवादियों को अपनी जिंदगी भोग-बिलास में तब्दील करने या फिर आतंकवाद के लिए बैरोजगार युवाओं की भर्ती कराने के लिए मनी कहां से आती है? जाहिरतौर पर आईएसआई कश्मीर में सक्रिय आतंकवादी ग्रुपों और हुर्रियत जैसे संगठनों को धन उपलब्ध कराती रही है। आईएसआई का खेल तो जाहिर है पर आतंकवादी मनी का खेल में सिर्फ आईएसआई या फिर पाकिस्तान की सैनिक-असैनिक सत्ता ही नहीं शामिल है। कई ऐसे सुरंग हैं जिस रास्ते से आतंकवादी मनी आती है। अप्रत्यक्षतौर पर सेवा भाव के नाम पर विदेशों से लाखों-करोड़ों डालर प्रतिवर्ष आते हैं। सेवा भाव के नाम पर आने वाली मनी का असली उपयोग राष्ट्र विरोधी हरकतों और दुनिया में देश की छवि बदनाम कराने में उपयोग होता है। सिर्फ कश्मीर में ही नहीं बल्कि देश के दूसरे भागों में भी आतंकवादी मनी आ रही है। केरल, त्रिपुरा, असम और पश्चिम बंगाल जैसे प्रदेशों में भी आतंकवादी मनी का अस्तित्व है। पिछले वर्ष ही दुनिया के शिया देशों ईरान,लीबिया जैसे मुस्लिम देशों ने केरल, त्रिपुरा और असम के मुस्लिम बहुल इलाकों में अपने पक्ष में वातावरण तैयार करने व अमेरिका विरोध के लिए राजनीतिक प्रक्रिया चलाने के नीयत से करोड़ों डालर खर्च किये थे। भारतीय गुप्तचर इंकाइयों के पास ईरान, लीबिया जैसे देशों द्वारा करोड़ों डालर बांटने के सबूत मौजूद हैं। पर भारतीय सरकार ने इस पर कोई एक्शन लेने की जरूरत नहीं समझी।
हुर्रियत की एक नेत्री का प्रसंग भी जानना जरूरी है। एनडीए सरकार के कार्यकाल में हुर्रियत की एक महिला नेत्री दिल्ली में गिरफ्तार हुई थी। हुर्रियत की उस महिला नेत्री एक हवाला एजेंट से लाखों रूपये लेते हुए रंगे हाथ पकड़ी गयी थी। चार साल तक जेलों में रहने के दौरान वह महिला सजा काट कर जेल से बाहर हो गयी। भारतीय गुप्तचर एजेेंसियों को उस महिला ने साफ तौर पर बताया था कि पाकिस्तान ही नहीं बल्कि खाड़ी देशों से भी पैसे जनसंगठनों के नाम फर सक्रिय आतंकवादी संगठनों को मिलते हैं। खाड़ी देशों की कश्मीर में रूचि जगजाहिर है। खाड़ी देश कश्मीर को मुस्लिम प्रश्न के तौर पर देखते हैं और हमेशा आतंकवादियों की खूनी राजनीति को आजादी का प्रश्न बताते हैं। सउदी अरब तो खुलकर पाकिस्तान का साथ देता है और कश्मीर में सक्रिय आतंकवादी सगंठनों को मदद करता रहा है। सउदी अरब के संबंध में एक खतरनाक अध्याय भी जुड़ा हुआ है जिसे अमेरिका नजरअंदाज कर दिया। वह अध्याय ओसामा बिन लादेन को पालने और धन मुहैया कराने का है। ओसामा बिन लादेन सउदी अरब का नागरिक है। सउदी अरब ने लादेन के साथ एक गुप्त समझौता किया था और ओसामा बिन लादेन को सउदी अरब से दूर रहने के एवज में प्रतिमाह लाखों डालर देता था। यह बात सउदी अरब ने खुद स्वीकारी है। यूरोप और अमेरिका में बसे मुस्लिम संवर्ग के धनी लोग भी हवाला सहित अन्य माध्यमों से भारत में आतंकवादी मनी भेजते हैं। वर्ल्ड इस्लामिक बैंक की भूमिका ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर संदिग्ध रही है।
पत्थरबाजी में आंतकवादी मनी का निवेश है। पत्थरबाजों को मोटी रकम मिलती है। हुर्रियत और आतंकवादी संगठन इसके लिए प्रेरित करते हैं। यह भी सही है कि कश्मीर में युवाओं और अन्य लोगों को मुफ्तखोरी और हंगामा खड़ा करने की आदत पड़ गयी है। एक तो भारत सरकार की कई रियायतों और सुविधाओं से कश्मीरियों में मुफ्तखोरी करने की लालच बढ़ी है और दूसरे मेंु हुर्रियत के नक्शे पर चल कर अपनी जिंदगी चमकीली ही नहीं बल्कि भोगभिलास में तब्दील करने की प्रक्रिया सिर पर चढ़कर बोलती है। कश्मीर के युवा देखते हैं कि जब हुर्रियत के नेता खूनी राजनीति करने के बाद भी जेलों में नहीं सड़ते और न ही उनकी जिंदगी फांकेकशी में गुजरती है बल्कि उनका जीवन भोग-बिलास में गुजरता है तो फिर हम क्यों नहीं ऐसा कर सकते हैं? पाकिस्तान, आईएसआई, यूरोप और अमेरिका तो हुर्रियत नेताओं को सिर पर उठाता ही है, इसके अलावा भारत सरकार भी हुर्रियत के शान-शौकत में हमेशा नतमस्तक रहती है। जम्मू कश्मीर में तीन संभाग हैं। एक कश्मीर, दूसरा लद्दाख और तीसरा जम्मू। हुर्रियत के नेता सिर्फ कश्मीर का ही प्रतिनिधित्व करते हैं पर भारत सरकार हुर्रियत को पूरे जम्मू-कश्मीर का प्रतिनिधि मानकर बात करती है। इससे हुर्रियत की हुजतबाजी बढेगी तो क्यों नहीं?
आतंकवादी मनी को रोकने की अंतर्राष्ट्रीय संहिता है। संयुक्त राष्ट्रसंघ ने आतंकवादी मनी के प्रवाह करने वालों को प्रतिबंधित करने की संहिता बनायी है। आतंकवादी मनी प्रवाह करने वाले कई संगठनों पर प्रतिबंध भी लग चुका है। अमेरिका-यूरोप ने अपने यहां यह प्रक्रिया चाकचौबंद बनायी है।। अमेरिका-यूरोप की तुलना में भारत अभी तक आतंकवादी मनी के प्रवाह को रोकने में गंभीर रूचि तक नहीं दिखायी है। जाहिर सी बात है कि जब तक आतंकवादी मनी का प्रवाह नहीं रोका जायेगा तबतक हम आतंकवाद को रोक नहीं सकते हैं और खूनी राजनीति की प्रक्रिया चलती ही रहेगी। हाल के वर्षों में कश्मीर की स्थिति सुधरी थी और लोकतांत्रित प्रक्रिया मजबूत भी हुंई थी। मनमोहन ंिसह की सरकार ने उदसीनता अपनायी। मनमोहन सरकार ने दूरदर्शिता दिखायी होती तो आज कश्मीर की स्थिति इतनी नहीं बिगड़ती और हुर्रियत को फिर से खड़े होने का मौका शायद ही मिलता। हुर्रियत को मिलने वाली तरजीह बंद होनी चाहिए। हुर्रियत के पास आने वाला आतंकवादी मनी का स्रोत पर कानून का सोंटा चलना चाहिए। आतंकवादी मनी के प्रवाह करने वाले देशों और संगठनों पर संयुक्त राष्ट्रसंघ की संहिता के तहत कार्रवाई कराने की प्रक्रिया चलनी चाहिए। हुर्रियत के नेताओं के भोग-बिलास की जिंदगी पर भारतीय कानूनों का सोंटा चलना चाहिए।
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कश्मीर में ‘आतंकवादी मनी‘ के प्रवाह पर चिंता मुक्त क्यों?
विष्णुगुप्त
हुर्रियत के सभी नेता कभी न कभी आतंकवादी रहे हैं और इनके हाथ कश्मीरी अवाम व सुरक्षा बलों के खूनों से रंगे हुए हैं। प्रत्यक्ष आतंकवाद की जगह जनसंगठन का बुर्का पहन कर हुर्रियत के नेता खड़े हो गये। उनकी इस चालाकी और पैंतरेबाजी का खाद-पानी हमारी सत्ता व्यवस्था की उदासीनता से मिला। हम कभी भी हुर्रियत के असली मंशा और उसकी आतंकवादी प्रक्रिया का सही आकलन और विश्लेषण नहीं की और कश्मीर सहित लद्दाख व जम्मू की जनता का भी असली प्रतिनिधि हुर्रियत को ही मान लिया गया। हुर्रियत की पाकिस्तान परस्ती नीति क्या ओझल है। सही तो यह है कि हुर्रियत के नेताओं ने पूरे कश्मीर में मुफ्तखोरी और आतंकवादी बन कर एसोआराम ही नहीं बल्कि भोग-बिलास की जिंदगी जीने की प्रक्रिया चलायी है। इस दुष्चर्क में हुर्रियत के साथ भारत सरकार बराबर का खलनायक है।
उदाहरण के लिए हुर्रियत के प्रायः सभी नेताओं का जीवन शैली देख लीजिए। उनके पास चमकीली और तड़क-भड़क जिंदगी के लिए आय के स्रोत कौन सा है? अधिकतर हुर्रियत नेताओ की आय का स्रोत शून्य है। फांकेकशी की जिंदगी जीने वाले हुर्रियत नेताओं की जिंदगी आतंकवादी बनते ही बदल गयी। उनके पास विदेशी वीवी, महंगी कारें, आलीशान आवास सहित भोग-बिलास की अन्य सभी सुख-सुविधाएं रातोरात मिल गयी। पाकिस्तान ही नहीं बल्कि अमेरिका-युरोप के दौरे पर आमंत्रित होने लगे। भारत सरकार द्वारा हुर्रियत के नेताओं की शान-शौकत बढ़ाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी गयी। मीडिया में दिन-प्रतिदिन उनकी तस्वीरें लहलहाती हैं। मुबंई हमले में जिंदा पकड़ा गया आतंकवाद कसाब को भी पुरस्कार में लाखों रूपये देने के साथ ही साथ कश्मीरी लडक्रियों से संगत कराने का लालच दिया गया था। ऐसी स्थिति में कश्मीर के युवाओं ही नहीं बल्कि पूरे आवाम में हुर्रियत नेता उनके प्रतीक और प्रेरणास््रत्रोत बन जाते हैं। आज कश्मीर के युवा संवर्ग अपने मेहनत के बल पर अपनी जिंदगी चमकीली बनाने की जगह पत्थरबाजी जैसी खतरनाक-खूनी प्रक्रिया से जुड़ रहे हैं और हुर्रियत-आतंकवादियों के जाल में फंस कर अशांति के कारण बने हुए हैं।
फांकेकशी की जिंदगी जीने वाले हुर्रियत नेताओं की जिंदगी आतंकवादी बनते ही बदल गयी। उनके पास विदेशी वीवी, महंगी कारें, आलीशान आवास सहित भोग-बिलास की अन्य सभी सुख-सुविधाएं रातोरात मिल गयी। मीडिया में दिन-प्रतिदिन उनकी तस्वीरें लहलहाती हैं। ऐसे में कश्मीर के युवाओं में हुर्रियत नेता उनके प्रतीक और प्रेरणास््रत्रोत बन जाते हैं। आज कश्मीर के युवा संवर्ग अपनी मेहनत के बल पर अपनी जिंदगी चमकीली बनाने की जगह पत्थरबाजी जैसी खतरनाक-खूनी प्रक्रिया से जुड़ रहे हैं। हुर्रियत के नेताओ की भोग-बिलास की जिंदगी कानूनों के दायरे में क्यों नहीं लाया जाना चाहिए।
हुर्रियत संवर्ग या फिर आतंकवादियों को अपनी जिंदगी भोग-बिलास में तब्दील करने या फिर आतंकवाद के लिए बैरोजगार युवाओं की भर्ती कराने के लिए मनी कहां से आती है? जाहिरतौर पर आईएसआई कश्मीर में सक्रिय आतंकवादी ग्रुपों और हुर्रियत जैसे संगठनों को धन उपलब्ध कराती रही है। आईएसआई का खेल तो जाहिर है पर आतंकवादी मनी का खेल में सिर्फ आईएसआई या फिर पाकिस्तान की सैनिक-असैनिक सत्ता ही नहीं शामिल है। कई ऐसे सुरंग हैं जिस रास्ते से आतंकवादी मनी आती है। अप्रत्यक्षतौर पर सेवा भाव के नाम पर विदेशों से लाखों-करोड़ों डालर प्रतिवर्ष आते हैं। सेवा भाव के नाम पर आने वाली मनी का असली उपयोग राष्ट्र विरोधी हरकतों और दुनिया में देश की छवि बदनाम कराने में उपयोग होता है। सिर्फ कश्मीर में ही नहीं बल्कि देश के दूसरे भागों में भी आतंकवादी मनी आ रही है। केरल, त्रिपुरा, असम और पश्चिम बंगाल जैसे प्रदेशों में भी आतंकवादी मनी का अस्तित्व है। पिछले वर्ष ही दुनिया के शिया देशों ईरान,लीबिया जैसे मुस्लिम देशों ने केरल, त्रिपुरा और असम के मुस्लिम बहुल इलाकों में अपने पक्ष में वातावरण तैयार करने व अमेरिका विरोध के लिए राजनीतिक प्रक्रिया चलाने के नीयत से करोड़ों डालर खर्च किये थे। भारतीय गुप्तचर इंकाइयों के पास ईरान, लीबिया जैसे देशों द्वारा करोड़ों डालर बांटने के सबूत मौजूद हैं। पर भारतीय सरकार ने इस पर कोई एक्शन लेने की जरूरत नहीं समझी।
हुर्रियत की एक नेत्री का प्रसंग भी जानना जरूरी है। एनडीए सरकार के कार्यकाल में हुर्रियत की एक महिला नेत्री दिल्ली में गिरफ्तार हुई थी। हुर्रियत की उस महिला नेत्री एक हवाला एजेंट से लाखों रूपये लेते हुए रंगे हाथ पकड़ी गयी थी। चार साल तक जेलों में रहने के दौरान वह महिला सजा काट कर जेल से बाहर हो गयी। भारतीय गुप्तचर एजेेंसियों को उस महिला ने साफ तौर पर बताया था कि पाकिस्तान ही नहीं बल्कि खाड़ी देशों से भी पैसे जनसंगठनों के नाम फर सक्रिय आतंकवादी संगठनों को मिलते हैं। खाड़ी देशों की कश्मीर में रूचि जगजाहिर है। खाड़ी देश कश्मीर को मुस्लिम प्रश्न के तौर पर देखते हैं और हमेशा आतंकवादियों की खूनी राजनीति को आजादी का प्रश्न बताते हैं। सउदी अरब तो खुलकर पाकिस्तान का साथ देता है और कश्मीर में सक्रिय आतंकवादी सगंठनों को मदद करता रहा है। सउदी अरब के संबंध में एक खतरनाक अध्याय भी जुड़ा हुआ है जिसे अमेरिका नजरअंदाज कर दिया। वह अध्याय ओसामा बिन लादेन को पालने और धन मुहैया कराने का है। ओसामा बिन लादेन सउदी अरब का नागरिक है। सउदी अरब ने लादेन के साथ एक गुप्त समझौता किया था और ओसामा बिन लादेन को सउदी अरब से दूर रहने के एवज में प्रतिमाह लाखों डालर देता था। यह बात सउदी अरब ने खुद स्वीकारी है। यूरोप और अमेरिका में बसे मुस्लिम संवर्ग के धनी लोग भी हवाला सहित अन्य माध्यमों से भारत में आतंकवादी मनी भेजते हैं। वर्ल्ड इस्लामिक बैंक की भूमिका ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर संदिग्ध रही है।
पत्थरबाजी में आंतकवादी मनी का निवेश है। पत्थरबाजों को मोटी रकम मिलती है। हुर्रियत और आतंकवादी संगठन इसके लिए प्रेरित करते हैं। यह भी सही है कि कश्मीर में युवाओं और अन्य लोगों को मुफ्तखोरी और हंगामा खड़ा करने की आदत पड़ गयी है। एक तो भारत सरकार की कई रियायतों और सुविधाओं से कश्मीरियों में मुफ्तखोरी करने की लालच बढ़ी है और दूसरे मेंु हुर्रियत के नक्शे पर चल कर अपनी जिंदगी चमकीली ही नहीं बल्कि भोगभिलास में तब्दील करने की प्रक्रिया सिर पर चढ़कर बोलती है। कश्मीर के युवा देखते हैं कि जब हुर्रियत के नेता खूनी राजनीति करने के बाद भी जेलों में नहीं सड़ते और न ही उनकी जिंदगी फांकेकशी में गुजरती है बल्कि उनका जीवन भोग-बिलास में गुजरता है तो फिर हम क्यों नहीं ऐसा कर सकते हैं? पाकिस्तान, आईएसआई, यूरोप और अमेरिका तो हुर्रियत नेताओं को सिर पर उठाता ही है, इसके अलावा भारत सरकार भी हुर्रियत के शान-शौकत में हमेशा नतमस्तक रहती है। जम्मू कश्मीर में तीन संभाग हैं। एक कश्मीर, दूसरा लद्दाख और तीसरा जम्मू। हुर्रियत के नेता सिर्फ कश्मीर का ही प्रतिनिधित्व करते हैं पर भारत सरकार हुर्रियत को पूरे जम्मू-कश्मीर का प्रतिनिधि मानकर बात करती है। इससे हुर्रियत की हुजतबाजी बढेगी तो क्यों नहीं?
आतंकवादी मनी को रोकने की अंतर्राष्ट्रीय संहिता है। संयुक्त राष्ट्रसंघ ने आतंकवादी मनी के प्रवाह करने वालों को प्रतिबंधित करने की संहिता बनायी है। आतंकवादी मनी प्रवाह करने वाले कई संगठनों पर प्रतिबंध भी लग चुका है। अमेरिका-यूरोप ने अपने यहां यह प्रक्रिया चाकचौबंद बनायी है।। अमेरिका-यूरोप की तुलना में भारत अभी तक आतंकवादी मनी के प्रवाह को रोकने में गंभीर रूचि तक नहीं दिखायी है। जाहिर सी बात है कि जब तक आतंकवादी मनी का प्रवाह नहीं रोका जायेगा तबतक हम आतंकवाद को रोक नहीं सकते हैं और खूनी राजनीति की प्रक्रिया चलती ही रहेगी। हाल के वर्षों में कश्मीर की स्थिति सुधरी थी और लोकतांत्रित प्रक्रिया मजबूत भी हुंई थी। मनमोहन ंिसह की सरकार ने उदसीनता अपनायी। मनमोहन सरकार ने दूरदर्शिता दिखायी होती तो आज कश्मीर की स्थिति इतनी नहीं बिगड़ती और हुर्रियत को फिर से खड़े होने का मौका शायद ही मिलता। हुर्रियत को मिलने वाली तरजीह बंद होनी चाहिए। हुर्रियत के पास आने वाला आतंकवादी मनी का स्रोत पर कानून का सोंटा चलना चाहिए। आतंकवादी मनी के प्रवाह करने वाले देशों और संगठनों पर संयुक्त राष्ट्रसंघ की संहिता के तहत कार्रवाई कराने की प्रक्रिया चलनी चाहिए। हुर्रियत के नेताओं के भोग-बिलास की जिंदगी पर भारतीय कानूनों का सोंटा चलना चाहिए।
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Saturday, June 26, 2010
तमिल नरसंहार की खुलेेगी परत दर परत कहानी
संयुक्त राष्ट्रसंघ के सरकारी पैनल की दुरूह चुनौती
तमिल नरसंहार की खुलेगी परत दर परत कहानी
विष्णुगुप्त
श्रीलंका सरकार की बौैैखलाहट समझी जा सकती है। तमिल नरसंहार की परत दर परत कहानी बाहर आने की डर से श्रीलंका सरकार सकते में है और उसे चिंता में डाल दिया है। श्रीलंका के राष्ट्रपति महेन्द्रा राजपक्षे ने संयुक्त राष्ट्रसंघ को कोेसने की कोई सीमा न छोड़ते हुए कहा कि बान की मुन बाहरी व्यक्ति है फिर भी श्रीलंका की संप्रभुता पर हमला करने की ओछी हरकत करने से बाज नहीं आ रहे हैं। ऐसे देखा जाये तो महेन्द्रा राज पक्षे के सामने संयुक्त राष्ट्रसंघ के महासचित बान की मुन की आलोचना करने के अलावा और चारा भी तो नहीं था। संयुक्त राष्ट्रसंघ के महासचिव होने के नाते बान की मुन पर पूरी दुनिया में मानवाधिकार संरक्षण और शांति स्थापित करनेे की नैतिक ही नहीं बल्कि संहितापूर्ण जिम्मेदारी है। जाहिरतौर पर बानकी मुन ने अपनी जिम्मेेदारी का निर्वाहन करते हुए श्रीलंका में तमिल नरसंहार की परत दर परत कहानी खोलने की सक्रियता दिखायी है। श्रींलंका में तमिल टाइगरों के खिलाफ सैनिक अभियान के दौरान निर्दोष आबादी को निशाना बनायेे जाने के खिलाफ जांच के लिए संयुक्त राष्ट्रसंघ ने एक ‘सरकारी पैनल‘ बनाया है। इस सरकारी पैनल के अध्यक्ष इंडोनेशिया के पूर्व एंटर्नी जनरल मारकुजी दारूसमन होंगे। उनके साथ तीन और सदस्य होंगे। यह सरकारी पैनल न सिर्फ तमिलों पर हुए मानवाधिकार हनन औैर उनके जनसंहार की जांच पड़ताल करेगा बल्कि यह भी निष्कर्ष निकाल कर संयुक्त राष्ट्रसंध को सलाह देगा कि अराजक देशों और सरकारों को मानवाधिकार संरक्षण के लिए कैसे बाध्य किया जा सकता है। श्रीलंका ही नहीं बल्कि दुनिया भर में कई ऐसी सरकारी व्यवस्था हैं जो न केवल मानवाधिकार हनन की कब्र पर बैंठी हैं और उन्हें मानवाधिकार संरक्षण या फिर अपनी आबादी की आवाज भी खौफ और उत्पीड़न के लिए प्रेरित करती है। ऐसी स्थिति में हम आकलन कर सकते हैं कि सुयुक्त राष्ट्रसंघ द्वारा गठित सरकारी पैनल की श्रींलका में काम और सुझाव कितना कठिन है। सिर्फ श्रीलंका के हाथ खुन नहीं रंगे हुए हैं बल्कि तमिलों के नरसंहार के साथ चीन-पाकिस्तान जैसे देषों के हाथ भी खून से रंगे हुए हैं। जाफना में एक साथ तीन-तीन देशों की करतुतो की कहानी खोजनी पड़गी। श्रीलंका की वर्तमान सत्ता घोर अमानवीय है और उसके लिए अभी भी मानवाधिकार संरक्षण की प्रवृति का का कोई खास महत्व नहीं रखता है। राष्ट्रपति महेन्द्रा राजपक्षे घोर अराजक सत्ता व्यवस्था का नेतृत्व कर रहे हैं। महेन्द्रा राजपक्षे तानाशाही की ओर बढ़ रहे हैं। भारतीय महाद्वीप में एक और तानाशाही व्यवस्था के अस्तित्व मे आने के संकेत ही नहीं बल्कि खतरे की नींव भी मजबूत हो रही हैं। इस खतरे को चीन या पाकिस्तान जैसा अराजक देश अपने लिए अनुकुल मान सकता है पर भारत जैसे लोकतांत्रिक देश के लिए एक बडे कूटनीतिक खतरे से कम नहीं है। भारत सरकार की कूटनीति में इस खतरे को लेकर केाई हलचल क्यों नहीं है। दुुनिया को तमिलों के मानवाधिकार और उनकी बेहतरी पर और भी गंभीर होकर सोचना होगा। इसलिए कि तमिलों के साथ अभी भी जानवरों जैसा व्यवहार हो रहा है। वे राहत शिविरों के नाम पर यातना शिविरो में रह रहे हैं। यातना शिविरों में उनके साथ ज्यातियां कम नहीं हो रही है। खासकर तमिल महिलाओं के साथ सैक्स उत्पीड़न की धटनाएं विश्व समुदाय की चिंता भी बढ़ायी है।
राहत शिविरों में तमिलों के साथ जानवरों जैसा व्यवहार हो रहा है। तमिल आबादी के नरसंहार में चीन और पाकिस्तान के हाथ भी खून से रंगे हुए है। श्रीलंका का सैनिक अभियान में निर्णायक भूमिका चीन और पाकिस्तान की थी। महेन्द्रा राजपक्षे पूरी तरह से अराजक है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पाबंदियां लागू हैं। राजपक्षें की तानाशाही प्रवृति वैश्विक नियामकों के सामने संकट खड़ा किया है। कैसे रूकेगी राजपक्षे की तानाशाही प्रवृति
खौफनाक नरसंहार...............................................
श्रीलंका संयुक्त राष्ट्रसंघ का सदस्य देश है। संयुक्त राष्ट्रसंघ के हर सदस्य देश संयुक्त राष्ट्रसंघ की संहिता से बंधा हुआ है। संयुक्त राष्ट्रसंघ की संहिता के अनुसार प्रत्येक देश को मानवाधिकार संरक्षण की जिम्मेदारी निभानी है और जातीय या मूल-भाषा पर आधारित हिंसा-ज्यादतियां रोकना है। जाहिरतौर पर श्रीलंका की सरकार ने संयुक्त राष्ट्रसंघ की इस संहिता के प्रति जवाबदेही दिखायी नहीं। तमिलों की समस्याओं का शांतिपूर्ण्र समाधान खोेजने की जगह सैनिक अभियान की प्रक्रिया चलायी गयी। सैनिक अभियान के पहले तमिल टाइगरो ने वार्ता का प्रस्ताव दिया था लेकिन श्रीलंका के राष्ट्रपति महेन्द्रा राजपक्षे को यह प्रस्ताव मंजूर नहीं हुआ। इसलिए कि महेन्द्रा राजपक्षे घोर सिहली राष्ट्रवाद का प्रतिनिधि नायक हैं। उनके एजेन्डे में सिंहली राष्ट्रवाद की जगह अन्य राष्ट्रीयता की कोई जगह ही नहीं बचती है। यह बात प्रमाणिततौर पर इसलिए कही जा सकती है कि खुद महेन्द्रा राजपक्षे बार-बार यह कहते आये हैं कि वे सिंहली राष्ट्रवाद की कीमत पर कोई भी प्रक्रिया को मानने के लिए बाध्य नहीं है। यानी सिंहली राष्ट्रवाद की सवोच्च्ता। सिंहली राष्ट्रवाद की सवोच्चता ने ही महेन्द्रा राजपक्षे को तमिलों के नरसंहार के लिए प्रेरित किया। तमिल टाइगर के सुप्रीमो प्रभाकरण जरूर हिंसा पर आधारित समाधान खोजने के लिए प्ररित थे पर सही यह भी है कि तमिलों की पूरी आबादी हिंसा से जुड़ी नहीं थी। तमिल आबादी हिसाविहीन समाधान की इच्छा रखती थी। दुर्भाग्य से श्रीलंका की सरकार ने पूरी तमिल आबादी को तमिल टाइगर का समर्थक औैर लड़ाकू मान लिया। श्रीलंका का सैनिक अभियान पूरी तरह से तमिल आबादी के विरूद्ध था। तमिल टाइगरों और प्रभाकरण के सफाये के साथ ही साथ तमिल आबादी के सफाये का मंशा भी राजपक्षे सरकार रखती थी। जैल में बंद श्रीलंका सेना के पूर्व अध्यक्ष और महेन्द्रा राजपक्षे का प्रतिद्वंद्वी फोनसेका ने बार-बार कहा है कि तमिलों का न केवल नरसंहार हुआ है बल्कि तमिल महिलाओं के साथ अमानवीय व्यवहार सहित अन्य मानवाधिकार हनने की घटनाएं हुई है। सेना पूरी तरह से अराजक थी और सिंहली राष्ट्रवाद की बहती खौफनाक प्रक्रिया में लिपटी हुई थी। श्रीलंका सरकार सेना को नरसंहार और अन्य प्रकार की ज्यातियों के लिए आदेश दे रखी थी। किसी भी तमिल टाइगरों को जिंदा नहीं छोड़ने का भी आदेश था। सैनिक अभियान के दौरान तमिल टाइगरों को समर्पन करने का लालच थमाया गया था। श्रीलंका सेना के सैनिक अभियान में समर्पण के लालच में आये तमिल टाइगरों के साथ भी खौफनाक मौत की प्रक्रिया चलायी गयी थी। सर्मपण करने वाले तमिल टाइगरों को मौत का घार उतार दिया गया था। तमिल टाइगरों के प्रमुख प्रभाकरण और उनके परिवार को जिंदा पकड़ने के बाद कई दिनो तक प्रताड़ित करने के बाद उन सबों को मौत की नींद सुलाया गया था। एक गैर सरकारी अनुमान के तहत पचास हजार से अधिक निर्दोष आबादी भी कत्लेआम की शिकार बनी थी। निर्दोष आबादी के कत्लेआम के सारी परिस्थितियां नष्ट की गयी और सबूत मिटाये गये हैं। हजारों लापाता तमिल टाइगरों की खोज नहीं हुई। लापाता आबादी केे बारे में यह कहा गया कि ये तमिल टाइगर थे जो श्रीलंका छोड़कर भाग गये। इनकी खोज की जिम्मेदारी श्रीलंका सरकार नहीं उठा सकती है?
चीन-पाक भी दोषी .............................
तमिल टाइगर दुनिया की सबसे प्रशिक्षित और ताकतवर लड़ाकू संगठन था। दुनिया में मानव बम की थ्योरी तमिल टाइगरों की ही देन है। मानव बम से ही प्र्रभारकण ने राजीव गांधी की हत्या करायी थी। करीब 40 सालों से अलग तमिल राष्ट्र के लिए तमिल टाइगर संधर्ष कर रहे थे। उनके पास न केवल थल लड़ाकू की बहुत बड़ी टूकड़ी थी बल्कि हवाई और समुद्री सैनिक ताकत थी। तमिल टाइगरों के हवाई और समुद्री हमलों ने दुनिया में काफी तहलका मचायी थी। थल-हवाई और समुद्री सामरिक ताकत होने के कारण लिट्टे की सैनिक ताकत कम नहीं थी। दुनिया भी लिट्टे की ताकत को मान चुकी थी। लिट्टे की इतनी बड़ी सामरिक ताकत को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि श्रीलंका द्वारा उनके खिलाफ अभियान छेड़ना मुश्किल नहीं तो कठिन जरूर था। कायदे की बात करें तो श्रीलंका सरकार की सैनिक ताकत इतनी बड़ी थी भी नहीं कि वह लिट्टे जैसे खूखांर संगठन से आमने-सामने की लड़ाई लड़ सके। अब यहां यह सवाल जरूर उठता है कि श्रीलंका सरकार तब लिट्टे का सफाया कैसे किया? वास्तव में इस सफलता की राज को भारतीय महाद्वीप में चीनी कूटनीति की घुसपैठ में खोजा जा सकता है। एक ओर तो अमेरिका-यूरोप के इस्लामिक आंतंकवाद के विरूद्ध लड़ाई और सोच ने लिट्टे को कमजोर किया। लिट्टे को तालिबान या अलकायदा के समकछ रखना वैश्विक कूटनीति की सबसे बड़ी भूल थी। चीन इस वैश्विक कूटनीति की परिस्थितियों का लाभ उठाया। दूसरी सबसे बड़ी बात यह है कि चीन की नजर भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था-सामरिक शक्ति और वैश्विक कूटनीति के बढ़ते दौर से पर था। वह पहले से ही भारत की पड़ोसियों को वह अपने पक्ष में करने की कूटनीतिक प्रक्रिया चलाता रहता है। नेपाल में उसने माओवादियों को खड़ा करने की सफलता खिची है। पाकिस्तान उसके चुगुल मे अपने स्थापना काल से ही है। म्यांमार के साथ चीन की सामरिक गठजोड़ है। श्रीलंका चीनी कूटनीति से चुंगुल से बाहर था। चीनी कूटनीति ने श्रीलंका को सैनिक ताकत बढ़ाने में मदद का लालच दिया। राजपक्षे अपनी सत्ता लम्बे काल तक चलाने के लिए लिट्टे जैसी शक्ति को समाप्त करना चाहता था। चीन ने पाकिस्तान के साथ मिलकर गोपनीय ढ़ग से श्रीलंका सैनिकों को प्रशिक्षित करने का काम किया। भारत के खिलाफ पाकिस्तान की कूटनीतिक अर्थ को भी नजरअंदाज नही किया जा सकता है। चीन और पाकिस्तान ने श्रीलंका सैनिकों को न केवल प्रषिक्षित किया बल्कि हथियार भी दिये। पाकिस्तान ने जहां छोटे हथियार दियें वहीं चीन ने श्रीलंका सैना को बड़े हथियार मुहैया कराये। इन बड़े हथियरों में टैंक सहित लड़ाकू हैलिकाप्टर तक शामिल थे। लिट्े के खिलाफ सैनिक अभियान का नेतृत्व चीनी और पाकिस्तान जनरल कर रहे थे। ऐसी खबरें तमिल मीडिया की है। अतंराष्ट्रीय समुदाय अब यह मान लिया है कि तमिलों के खिलाफ सैनिक अभियान में निर्णायक भूमिका चीन और पाकिस्तान की सामरिक-कूटनीति की थी। अब यहां सवाल यह उठता है कि क्या संयुक्त राष्ट्रसंघ चीन और पाकिस्तान की करतुतों और तमिलों के नरसंहार में शामिल होने की बात बाहर करने और चीन-पाकिस्तान को इन करतूतों के खिलाफ सजा देने जैसा साहस दिखा सकता है।
राहत नहीं यातना शिविर....................................
यह जानकर वैश्विक समाज को आक्रोषित होना चाहिए कि राहत शिविरों को यातना शिवरों में बदल दिया गया है। पांच लाख से अधिक आबादी अभी भी जाफना के आस-पास राहत शिविरों में रहने के लिए बाध्य हैं। राहत शिविरों में रहने वाली तमिल आबादी के साथ श्रीलंका के सुरक्षा प्रकिया जानवरों जैसा व्यवहार करती है। राहत शिविरों में रहने वाली तमिल आबादी को मानवीय सहायता जैसी जरूरी तत्व से वंचित है। खाने-पीने जैसी सुविधाएं चाकचौबंद नहीं है। गंभीर रूप से बीमार लोगों के लिए उचित चिकित्सा व्यवस्था तक नहीं है।उत्पीड़न और ज्यादतियां जैसी प्रक्रिया राहत शिविरों में चलती रहती है। खासकर महिला तमिल आबादी के साथ व्यवहार अमानवीय ही नहीं है बल्कि खौफनाक भी है। छोटी-छोटी बच्चियो के साथ श्रीलंका के सुरक्षा बल के जवान बलात्कार करने से भी नहीं चुकते है। छोटी बच्चियों के साथ बलात्कार की प्रक्रिया रूकती नहीं है। विश्व मीडिया में कुछ दिन पूर्व एक तस्वीर काफी तहलका मचायी थी। वह तस्वीर भयानक थी और कूरता को पार करने वाली थी। उस तस्वीर में सुरक्षा बलो द्वारा एक छोटी उम्र की लड़की के साथ बलात्कार की बात थी। उस तस्वीर के प्रकाशन के बाद दुनिया भर में श्रीलंका सरकार के खिलाफ कार्रवाई करने की बात भी उठी थी। दुनिया में अपनी छवि खराब होते देख राजपक्षे ने झूठ और फैरब का सहारा लिया। राजपक्षे ने उस तस्वीर को झूठी करार देते हुए कहा कि यह तमिल टाइगरो का समर्थन करने वाले मीडिया द्वारा बनायी गयी तस्वीर है। जबकि सही तो यह था कि एक पत्रकार ने गोपनीय ढ़ग से वह तस्वीर खींची थी। इसके बाद महेन्द्रा राजपक्षे ने अपना गुस्सा मीडिया पर उतारा। उसने मीडिया को कई सेंशरशिप से प्रतिबंधित किया। कई पत्रकारो को उसने जेलों में डाल दिया। कई पर झूठे मुकदमे दर्ज किये गये। इसके बाद मीडिया पूरी तरह से रक्षात्मक हो गयी और राहत शिविरों से संबंधित खबरें नहीं के बराबर आने लगी। राहत शिविरों से बाहर रहने वाली आबादी के साथ भी घोर अन्याय हो रहा है। उनके मानवाधिकार को सुरक्षा बलो के जबूटों तले रोंदा जा रहा है। राहत शिविरों से बाहर रहने वाली तमिल आबादी को उनके धरों से निकलने और बाहर जाने के कारण बताने के लिए बाध्य होना पड़ता है। कारण नहीं बताने पर लिट्टे समर्थक मानकर उन्हे जेलों में ठुस दिया जाता है। तमिल आबादी जेलों में जलालत की जिंदगी जीने के लिए विवश है। जेलो में उन्हें सिंहली राष्टवादियों द्वारा अपमानित होने के साथ ही साथ उत्पीड़न का शिकार भी होना पड़ता है। श्रीलंका की जेलों में कितनी आबादी बंद है यह आकंडा भी श्रीलंका सरकार देने के लिए तैयार नहीं है।
तानाशाही की ओर बढ़ते पंख...................................
हम एक और तानाशाही व्यवस्था से धिर सकते हैं। चीन, म्यामार, नेपाल और पाकिस्तान जैसे अराजक देशों से हमारी संप्रभुता पहले से ही धिरी हुई है। अब हम श्रीलंका में भी अराजकता और तानाशाही जैसे खेल से अभिशप्त होे सकते है। महेन्द्रा राजपक्षे घोर सिंहली राष्टवाद के पक्षधर हैं। लिटटे के सफायेे का करिशमा राजपक्षे के साथ जुड़ी हुई है। सिंहली आबादी राजपक्षे का अपना नायक मानती है। पिछला राष्टपति चुुनाव इसका उदाहरण है। सिंहली राष्टवाद पर सवार होकर ह राजपक्षे ने पिछला राष्टपति चुनाव जीता था। चुनाव जीतने के बाद राजपक्षे अराजक हो गये है। उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी पूर्व सेनाध्यक्ष फोनेंसका को जेलों में डाल दिया और उनके उपर तख्ता पलट करने और अपनी हत्या की साजिश में शामिल होने के आरोप लगाये। फोनेसंका काफी दिनों से जेलों में बंद है। राष्टद्रोह का आरोप येन-केन-प्रकारेन साबित कर फोनसेंका को फांसी पर लटकाने की उनकी योजना है। फोनसंका की जेल-उत्पीड़न पर संयुक्त राष्टसंघ और अमेरिका ने नाखुशी दिखायी पर राजपक्षे की दिमाग सातवें आसमान में ही तैरता रहा है। सत्ता की गंुडई के सामने विरोधियों की आवाज काफी दब गयी है। पहले श्रीलंका में भंडारनायके परिवार की तूती बोलती थी। भंडारनायके परिवार और लोकतंत्र का रिस्ता गहरा था। लेकिन राजपक्षे ने भंडारनायके परिवार की हासिये पर डाल दिया है। सबसे बड़ी बात यह है कि राजपक्षे ने अपने कुनबे को स्थापित करने की राह लम्बी-चौड़ी बनायी है। अपने परिजनों को सेना के साथ ही साथ अपनी सरकार के महत्पपूर्ण पदों पर बैैठाया है। ऐसा इसलिए कि कहीं से भी कोई चुनौती नहीं मिल सके। यह लक्ष्ण और प्रक्रिया तानाशाही अराजक व्यवस्था के ही प्रतीक हैं। तानाशाही और अराजक व्यवस्था का समर्थक सत्तासीन ही अपने परिजनों और कुनबों को सेना और सरकार के महत्वपूर्ण पदों पर बैठाते है। मीडिया पर सेेंशरशिप पहले से ही लागू है। वर्तमान सिस्थि यह है कि जो भी राजपक्षे के खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश करेगा उसकी जगह जेल होगी। राजपक्षेे को मालूम है कि वर्तनाम कूटनीतिक माहौल में उसे किसी से भी खतरा नहीं है और न ही वैश्विक नियामक उसके खिलाफ निर्णायक कारवाई करने की साहस कर सकता है। चीन उसके पूरी तरह से साथ है। भारत भी अपने रक्षात्मक कूटनीति से कोई विवाद या संकट खड़ा नहीं कर सकता है। भारत एक तरह से राजपक्षे की तानाशाही की ओर बढ़ते कदम का मुकदर्शक है। अभी हाल ही में भारत ने राजपक्षे को अपने यहां बुलाकार सम्मानित करने का काम किया है। ऐसी स्थिति में राजपक्षे को डर किस बात की है। उसके कदम तानाशाही की ओर बढ़ेगी ही।
सरकारी कमेटी की दुरूह चुनौती......................................
संयुक्त राष्टसंघ ने तमिलों के पक्ष में खड़ा होने की जिम्मेदारी जरूर निभायी है। नरसहार पर एक सरकारी पैनल भी बनाया है। सरकारी कमेटी के अध्यक्ष मारूजुकी दारूसमन वैश्विक कूटनीति और कानून के बड़े जानकार है। इसलिए उम्मीद की जानी चाहिए कि वे तमिल आबादी का हुआ नरसंहार और उत्पीड़न-ज्यादतियों की परत दर परत कहानी खोलने मे कामयाब होगे। पर उन्हें कई कठिनाइयों से भी सामना करना पड़ेगा। श्रीलंका सरकार उन्हें सहयोग करने वाली नहीं है। तमिल आबादी डरी हुई है। उन्हें अपने भविष्य की चिंता है। इसलिए वे अपने मुंह बंद रखना ही बेहतर समझेगे। चीन और पाकिस्तान के खिलाफ सबूत जुटाना भी दुरूह चुनौती है। सरकारी कमेटी को यह भी सलाह देना है कि अराजक और तानाशाही सरकारों से मानवाधिकार संरक्षण कैसे कराया जा सकता है। इसलिए तमिलों के नरसंहार की खौफनाक कार्रवाइयो को आधार मानकर ‘सरकारी पैनल‘ यह भी सलाह दे सकता है कि संघर्षरत संगठनों से कैसे निपटा जा सकता है, उनकी मांगों का प्रबंधन का तरीका क्या हो सकता है। सबसे बड़ी बात तो संयुुक्त राष्टसंघ और सभी वैश्विक नियामकों को यह तय करना होगा कि अराजक और तानाशाही व्यवस्था का किसी भी प्रकार से सहायता या समर्थन देने की प्रवृति को रोका जाये। फिलहाल चुनौती राजपक्षे की अराजक नीतियां है।
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Tuesday, June 8, 2010
न्याय की हत्या,दोषी सरकारी-न्यायिक प्रक्रिया ?
भोपाल गैस कांड फैसला
न्याय की हत्या, दोषी सरकारी-न्यायिक प्रक्रिया ?
वारेन एडरसन पर मेहरबानी क्यों?
विष्णुगुप्त
महत्वपूर्ण यह नहीं है कि भोपाल गैस कांड के आठ अभियुक्तों को न्यायालय ने दोषी ठहराया है, उन्हें दो-दो साल की सजा सुनायी है या अब भोपाल गैस कांड के पीड़ितों को न्याय मिल ही गया। महत्पूर्ण यह है कि भोपाल गैस कांड के अभियुक्तों दंडित करने में 25 साल का समय क्यों और कैसे लगा। न्याय की इतनी बड़ी सुस्ती और कछुआ चाल। क्या गैस पीड़ितों की इच्छानुसार यह न्याय हुआ है? क्या सीजीएम कोर्ट के फैसले से गैस पीड़ितों के दुख-दर्द और हुए नुकसान की भरपाई हो सकती है। मुख्य आरोपी ‘ यूनियन कार्बाइड कम्पनी के चैयरमैन वारेन एडरसन पर न्यायालय द्वारा कोई टिप्पणी नहीं होने का भी कोई अर्थ निकलता है क्या। भोपाल जिला के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने मोहन तिवारी द्वारा यूनियन कर्बाइड के आठ तत्कालिन पदाधिकारियों को दो-दो साल की सजा जरूर सुनायी गयी पर यूनियन कार्बाइड के मालिक वारेन एडरसन पर कोई टिप्पणी नहीं हुई है। वारेन एडरसन पिछले 25 साल से फरार घोषित है। सीबीआई अबतक वारेन एडरसन का पत्ता ढुढ़ने में नाकामयाब रही है।
सजा नरसंहारक धाराओं से नहीं बल्कि लापरवाही की धाराओं से सुनायी गयी है। भारतीय कानून संहिता की धारा 304 ए के तहत सुनायी गयी है जो लापरवाही के विरूद्ध धारा है। लापरवाही नहीं बल्कि जनसंहारक जैसा अपराध था। भोपाल गैस पीड़ितों की मांग भी थी कि यूनियन गैस कर्बाइड के खिलाफ हत्या का मामला चलाया जाये पर पुलिस और सरकार का रवैया इस प्रसंग में यूनियन गैस कार्बाइड की पक्षधर वाली रही है। यही कारण है कि 25 सालों से फरार युनियन गैस कर्बाइड के मालिक वारेन एडरसन की गिरफ्तारी तक संभव नहीं हो सकी है। गैस पीड़ितों का संगठन इस फैसले से कतई खुश नहीं हैं और इनकी मांग दोषियों की फांसी की सजा मुकर्रर कराना है। गैस पीड़ितों की लडाई लड़ने वाले अब्दुल जबार ने इस फैसले को न्यायिक त्रासदी करार दिया है और न्यायिक मजिस्ट्रेट के फैसले के खिलाफ और अभियुक्तों को फांसी दिलाने के लिए उच्च न्यायालय का दरवाजा खट-खटाने का एलान किया है।
भारतीय सत्ता व्यवस्था एडरसन के हित को सुरक्षित रखने में कितना संलग्न था और पक्षकारी था। इतने बड़े नरसंहारक घटना के लिए मुख्य दोषी को रातोरात जमानत कैसे मिल जाती है? घटना के बाद पांच दिसम्बर 1984 को एडरसन भारत आया था। पुलिस उसे गिरफतार करती है पर एडरसन को जेल नहीं भेजा जाता है। गेस्ट हाउस में रखा जाता है। गैस हाउस से ही उसे जमानत मिल जाती है। इतना ही नहीं बल्कि भोपाल से दिल्ली आने के लिए भारत सरकार हवाई जहाज भेजती है। भारत सरकार के हवाईजहाज से एडरसन दिल्ली आता है और फिर अमेरिका भाग जाता है। अभी तक एडरसन अमेरिका में ही रह रहा है। ज्ञात तौर पर उसकी सक्रियता बनी हुई है। विभिन्न व्यापारिक और औद्योगिक योजनाओं में न केवल उसकी सक्रियता है बल्कि उसके पास मालिकाना हक भी है। इसके बाद सीबीआई वारेन एडरसन का पत्ता नहीं खोज पायी है। अभी तक वह भारतीय न्यायप्रकिया के तहत फरार ही है।
दुनिया की सबसे बड़ी औद्याोगिक त्रासदी...................................................
भोपाल गैस कांड दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी थी। 02 दिसम्बर 1984 को भोपाल की आबादी पर यूनियन गैस कार्बाइड का कहर बरपा था। घोर लापरवाही के कारण भोपाल गैस काबाईड से मिथाइल आइसोसायनाइट गैस का रिसाव हुआ था। मिथाइल आइसोसायनाइट के रिसाव ने न सिर्फ फैक्टरी के आस-पास की आबादी को अपने चपेट मे लिया था बल्कि हवा के झोकों के साथ दूर-दूर तक निवास करने वाली आबादी तक अपना कहर फैलाया था। गैस रिसाव से सुरक्षा का इंतजाम तक नहीं था। दो दिन तक फैक्टरी से जहरीली गैसो का रिसाव होता रहा। फैक्टरी के अधिकारी गैस रिसाव को रोकने के इंतजाम करने की जगह खुद भाग खड़े हुए थे। गैस का रिसाव तो कई दिन पहले से ही हो रहा था। फैक्टरी के आसपास रहने वाली आबादी कई दिनों से बैचेनी महसूस कर रही थी। इतना ही नहीं बल्कि उल्टी और जलन जैसी बीमारी भी घातक तौर पर फैल चुकी थी। उदासीन और लापरवाह कम्पनी प्रबंधन ने इस तरह मिथाइल गैस आधारित बीमारी पर गौर ही नहीं किया था।
मिथाइल आइसोसायनाइट गैस की चपेट में आने से करीब 15 हजार लोगो की मौत हुई थी। पांच लाख से अधिक लोग घायल हुए थे। जहरीली गैस के चपेट में आने से प्रभावित सैकड़ो लोग बाद में मरे हैं। इतना ही नहीं बल्कि आज भी हजारों पीड़ित ऐसे हैं जो जहरीली गैस के प्रभाव से मुक्त नहीं है। भोपाल गैस कर्बाइड की आस-पास की भूमि जहरीली हो गयी है। पानी में मिथाइल गैस का प्रभाव गहरा है। सबसे बड़ी बात यह है कि भोपाल गैस कांड के बाद में जन्म लेने वाली पीढ़ी भी मिथाइल गैस के प्रभाव से पीड़ित हैं और उन्हें कई खतरनाक बीमारियां विरासत में मिली हैं।
म्ुाुआबजा के नाम पर धोखाधड़ी....................................................................................
म्ुाुआबजा के नाम पर धोखाधड़ी हुई है। इस धोखाधड़ी में भारत सरकार और मध्य प्रदेश के तत्कालीन सरकारों के हाथ कालें हैं। यूनियन कार्बाइड कम्पनी के साथ सुप्रीम कोर्ट की मध्यस्थतता में मुआबजा के लिए एक समझौता हुआ था। समझौते में एक तरह से भोपाल गैस कांड के पीड़ितों के साथ अन्याय ही नहीं हुआ था बल्कि उनके संघर्ष और भविष्य पर भी नकेल डाला गया था। जबकि यूनियन कार्बाइड को कानूनी उलझन से मुक्त कराने जैसी शर्त को माना गया था। शर्त के अनुसार यूनियन कार्बाइड कारपोरेशन,यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड,यूनियन कार्बाइल हांगकांग और वारेन एडरसन के खिलाफ चल रही सभी अपराधिक न्यायिक प्रक्रिया को समाप्त मान लिया गया। इसके बदले में भोपाल गैस कांड के पीड़ितो को क्या मिला, यह भी देख लीजिए? 713 करोड़ रूपये मात्र मुआबजे के तौर पर यूनियन कार्बाइड कारपोरेशन ने दिये थे। दुनिया की सबसे बड़ी औधोगिक त्रासदी और 15 हजार से ज्यादा जानें छीनने वाली व पांच लाख से ज्यादा की आबादी को पीड़ित करने वाली इस नरसंहारक घटना की मुआबजा मात्र 713 करोड़ रूपये। भारत सरकार की अतिरूचि और यूनियन गैस कार्बाइड कारपोरेशन के प्रति अतिरिक्त मोह ने गैस पीड़ितों के संभावनाओं का गल्ला घोट दिया। सबसे बड़ी बात तो यह है कि इस नरसंहारक घटना में सैकड़ों लोग ऐसे मारे गये थे जिनके पास न तो कोई रिहायशी प्रमाण थे और न ही नियमित पत्ते का पंजीकरण था। ऐसे गरीब हताहतों के साथ न्याय नहीं हुआ। उन्हें मुआबजा भी नहीं मिला। सरकारी कामकाज के झंझटों के कारण भी मुआबजा की राशि दुर्बल और असहाय लोगों तक नहीं पहुंची।
एडरसन को मिला सरकारी रक्षाकवच..........................................................................
यूनियन गैस कार्बाइड कारपोरेशन के मालिक वारेन एडरसन के साथ भारत सरकार का विशेषाधिकार जुड़ा हुआ था। पुलिस-प्रशासन और न्यायपालिका भी वारेन एडरसन के प्रति नरम रूख जताया था। पुलिस-प्रशासन, केन्द्र-मध्यप्रदेश की तत्कालीन सरकारें और न्यायपालिका का नरम रूख नहीं होता और पक्षकारी भूमिका नहीं होती तो क्या वारेन एडरसन भारत से भागने में सफल होता। ऐसे तथ्य हैं जिससे साफ झलकता है कि भारतीय सत्ता व्यवस्था एडरसन के हित को सुरक्षित रखने में कितना संलग्न था और पक्षकारी था। इतने बड़े नरसंहारक घटना के लिए मुख्य दोषी को रातोरात जमानत कैसे मिल जाती है? घटना के बाद पांच दिसम्बर 1984 को एडरसन भारत आया था। पुलिस उसे गिरफतार करती है पर एडरसन को जेल नहीं भेजा जाता है। गेस्ट हाउस में रखा जाता है। गैस हाउस से ही उसे जमानत मिल जाती है। इतना ही नहीं बल्कि भोपाल से दिल्ली आने के लिए भारत सरकार हवाई जहाज भेजती है। भारत सरकार के हवाईजहाज से एडरसन दिल्ली आता है और फिर अमेरिका भाग जाता है। अभी तक एडरसन अमेरिका में ही रह रहा है। ज्ञात तौर पर उसकी सक्रियता बनी हुई है। विभिन्न व्यापारिक और औद्योगिक योजनाओं में न केवल उसकी सक्रियता है बल्कि उसके पास मालिकाना हक भी है। इसके बाद सीबीआई वारेन एडरसन का पत्ता नहीं खोज पायी है। अभी तक वह भारतीय न्यायप्रकिया के तहत फरार ही है।
फैसले को न्यायिक त्रासदी दिया करार...................................
गैस पीड़ितों के लिए लडाई लड़ने वाले हरेक संगठन ने न्यायिक मजिस्ट्रेट के इस फैसले को न्यायिक त्रासदी करार दिया है। अव्दुल जबार कहते है कि पीड़ितों पर पहले औद्योगिक त्रासदी का नरसंहार हुआ और अब न्यायिक त्रासदी हुई है। जिम्मेवार और लापरवाह अभियुक्तों को फांसी मिलनी चाहिए थी लेकिन उन्हें मात्र दो-दो साल का जेल की सजा हुई है और एक-एक लाख का जुर्माना हुआ है। यह सजा कुछ भी नही है। क्या 15 हजार से ज्यादा गंवायी गयी जान और पांच लाख से ज्यादा हुए अपाहिज लोगों की पीड़ा को यह सजा कम कर पायेगी? इसका उत्तर कदापि में नहीं है। गैस पीडितों की नाराजगी समझी जा सकती है। गैस पीड़ित न्यायिक मजिस्ट्रेट के इस फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील करने का एलान कर चुके हैं। जहां से न्याय की उन्हें उम्मीद तो होगी पर संधर्ष भी कम नहीं होगा। सबसे अधिक चिंताजनक बात यह है कि न्यायिक मजिस्टेट के फैसले में मुख्य दोषी वारेन एडरसन पर कोई टिप्पणी नहीं है। एडरसन पर टिप्पणी न होना भी गैस पीड़ितों की पीड़ा और संधर्ष की राह मुश्किल करता है।
एडरसन को सजा क्यों न मिले..............................................
दुनिया में अन्य कोई जगह पर ऐसी नरसंहारक औद्योगिक त्रासदी हुई होती तो निश्चित मानिये की एडरसन इस तरह अबाधित और निश्चित होकर अपनी सक्रियता नहीं दिखा सकता था। उसकी जगह जेल होती। लेकिन भारत जैसे देश की सरकार जनता के प्रति नहीं बल्कि औद्योगिक घरानो के हित को साधने ज्याद तत्पर रहती है। भारत सरकार को अब अपनी सोच बदलनी चाहिए। भोपाल गैस कांड के पीड़ितों को न्याय मिलें। ऐसी सरकारी प्रक्रिया क्यों नहीं चलनी चाहिए? अमेरिका पर कूटनीतिक दबाव डालना चाहिए कि एडरसन को पकड़कर भारत को सौंपा जाये। अमेरिका भारत के साथ मधुर सबंधों की रट रोज लगाता है। लेकिन भोपाल गैस कांड के मुख्य आरोपी को उसने एक तरह से संरक्षण दिया हुआ है। हेडली का प्रकरण भी हमें नोट करने की जरूरत है। ऐसे में दोस्ती का क्या मतलब रह जाता है। भारत सरकार को खरी-खरी बात करनी होगी। अमेरिका से कहना होगा कि एडरसन भारतीय न्यायपालिका से फरार घोषित है। इसलिए उसकी जगह भारतीय जेल है। सीबीआई एडरसन पर तभी सक्रियता दिखा सकती है जब भारत सरकार ऐसी इच्छा रखेगी। क्या भारत सरकार एडरसन को भारत लाने के लिए कूटनीतिक पहल फिर से करेगी? शायद नहीं। ऐसी स्थिति में गैस पीड़तों की संघर्ष की राह और चौड़ी होगी।
सम्पर्क............
मोबाइल - 09968997060
न्याय की हत्या, दोषी सरकारी-न्यायिक प्रक्रिया ?
वारेन एडरसन पर मेहरबानी क्यों?
विष्णुगुप्त
महत्वपूर्ण यह नहीं है कि भोपाल गैस कांड के आठ अभियुक्तों को न्यायालय ने दोषी ठहराया है, उन्हें दो-दो साल की सजा सुनायी है या अब भोपाल गैस कांड के पीड़ितों को न्याय मिल ही गया। महत्पूर्ण यह है कि भोपाल गैस कांड के अभियुक्तों दंडित करने में 25 साल का समय क्यों और कैसे लगा। न्याय की इतनी बड़ी सुस्ती और कछुआ चाल। क्या गैस पीड़ितों की इच्छानुसार यह न्याय हुआ है? क्या सीजीएम कोर्ट के फैसले से गैस पीड़ितों के दुख-दर्द और हुए नुकसान की भरपाई हो सकती है। मुख्य आरोपी ‘ यूनियन कार्बाइड कम्पनी के चैयरमैन वारेन एडरसन पर न्यायालय द्वारा कोई टिप्पणी नहीं होने का भी कोई अर्थ निकलता है क्या। भोपाल जिला के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने मोहन तिवारी द्वारा यूनियन कर्बाइड के आठ तत्कालिन पदाधिकारियों को दो-दो साल की सजा जरूर सुनायी गयी पर यूनियन कार्बाइड के मालिक वारेन एडरसन पर कोई टिप्पणी नहीं हुई है। वारेन एडरसन पिछले 25 साल से फरार घोषित है। सीबीआई अबतक वारेन एडरसन का पत्ता ढुढ़ने में नाकामयाब रही है।
सजा नरसंहारक धाराओं से नहीं बल्कि लापरवाही की धाराओं से सुनायी गयी है। भारतीय कानून संहिता की धारा 304 ए के तहत सुनायी गयी है जो लापरवाही के विरूद्ध धारा है। लापरवाही नहीं बल्कि जनसंहारक जैसा अपराध था। भोपाल गैस पीड़ितों की मांग भी थी कि यूनियन गैस कर्बाइड के खिलाफ हत्या का मामला चलाया जाये पर पुलिस और सरकार का रवैया इस प्रसंग में यूनियन गैस कार्बाइड की पक्षधर वाली रही है। यही कारण है कि 25 सालों से फरार युनियन गैस कर्बाइड के मालिक वारेन एडरसन की गिरफ्तारी तक संभव नहीं हो सकी है। गैस पीड़ितों का संगठन इस फैसले से कतई खुश नहीं हैं और इनकी मांग दोषियों की फांसी की सजा मुकर्रर कराना है। गैस पीड़ितों की लडाई लड़ने वाले अब्दुल जबार ने इस फैसले को न्यायिक त्रासदी करार दिया है और न्यायिक मजिस्ट्रेट के फैसले के खिलाफ और अभियुक्तों को फांसी दिलाने के लिए उच्च न्यायालय का दरवाजा खट-खटाने का एलान किया है।
भारतीय सत्ता व्यवस्था एडरसन के हित को सुरक्षित रखने में कितना संलग्न था और पक्षकारी था। इतने बड़े नरसंहारक घटना के लिए मुख्य दोषी को रातोरात जमानत कैसे मिल जाती है? घटना के बाद पांच दिसम्बर 1984 को एडरसन भारत आया था। पुलिस उसे गिरफतार करती है पर एडरसन को जेल नहीं भेजा जाता है। गेस्ट हाउस में रखा जाता है। गैस हाउस से ही उसे जमानत मिल जाती है। इतना ही नहीं बल्कि भोपाल से दिल्ली आने के लिए भारत सरकार हवाई जहाज भेजती है। भारत सरकार के हवाईजहाज से एडरसन दिल्ली आता है और फिर अमेरिका भाग जाता है। अभी तक एडरसन अमेरिका में ही रह रहा है। ज्ञात तौर पर उसकी सक्रियता बनी हुई है। विभिन्न व्यापारिक और औद्योगिक योजनाओं में न केवल उसकी सक्रियता है बल्कि उसके पास मालिकाना हक भी है। इसके बाद सीबीआई वारेन एडरसन का पत्ता नहीं खोज पायी है। अभी तक वह भारतीय न्यायप्रकिया के तहत फरार ही है।
दुनिया की सबसे बड़ी औद्याोगिक त्रासदी...................................................
भोपाल गैस कांड दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी थी। 02 दिसम्बर 1984 को भोपाल की आबादी पर यूनियन गैस कार्बाइड का कहर बरपा था। घोर लापरवाही के कारण भोपाल गैस काबाईड से मिथाइल आइसोसायनाइट गैस का रिसाव हुआ था। मिथाइल आइसोसायनाइट के रिसाव ने न सिर्फ फैक्टरी के आस-पास की आबादी को अपने चपेट मे लिया था बल्कि हवा के झोकों के साथ दूर-दूर तक निवास करने वाली आबादी तक अपना कहर फैलाया था। गैस रिसाव से सुरक्षा का इंतजाम तक नहीं था। दो दिन तक फैक्टरी से जहरीली गैसो का रिसाव होता रहा। फैक्टरी के अधिकारी गैस रिसाव को रोकने के इंतजाम करने की जगह खुद भाग खड़े हुए थे। गैस का रिसाव तो कई दिन पहले से ही हो रहा था। फैक्टरी के आसपास रहने वाली आबादी कई दिनों से बैचेनी महसूस कर रही थी। इतना ही नहीं बल्कि उल्टी और जलन जैसी बीमारी भी घातक तौर पर फैल चुकी थी। उदासीन और लापरवाह कम्पनी प्रबंधन ने इस तरह मिथाइल गैस आधारित बीमारी पर गौर ही नहीं किया था।
मिथाइल आइसोसायनाइट गैस की चपेट में आने से करीब 15 हजार लोगो की मौत हुई थी। पांच लाख से अधिक लोग घायल हुए थे। जहरीली गैस के चपेट में आने से प्रभावित सैकड़ो लोग बाद में मरे हैं। इतना ही नहीं बल्कि आज भी हजारों पीड़ित ऐसे हैं जो जहरीली गैस के प्रभाव से मुक्त नहीं है। भोपाल गैस कर्बाइड की आस-पास की भूमि जहरीली हो गयी है। पानी में मिथाइल गैस का प्रभाव गहरा है। सबसे बड़ी बात यह है कि भोपाल गैस कांड के बाद में जन्म लेने वाली पीढ़ी भी मिथाइल गैस के प्रभाव से पीड़ित हैं और उन्हें कई खतरनाक बीमारियां विरासत में मिली हैं।
म्ुाुआबजा के नाम पर धोखाधड़ी....................................................................................
म्ुाुआबजा के नाम पर धोखाधड़ी हुई है। इस धोखाधड़ी में भारत सरकार और मध्य प्रदेश के तत्कालीन सरकारों के हाथ कालें हैं। यूनियन कार्बाइड कम्पनी के साथ सुप्रीम कोर्ट की मध्यस्थतता में मुआबजा के लिए एक समझौता हुआ था। समझौते में एक तरह से भोपाल गैस कांड के पीड़ितों के साथ अन्याय ही नहीं हुआ था बल्कि उनके संघर्ष और भविष्य पर भी नकेल डाला गया था। जबकि यूनियन कार्बाइड को कानूनी उलझन से मुक्त कराने जैसी शर्त को माना गया था। शर्त के अनुसार यूनियन कार्बाइड कारपोरेशन,यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड,यूनियन कार्बाइल हांगकांग और वारेन एडरसन के खिलाफ चल रही सभी अपराधिक न्यायिक प्रक्रिया को समाप्त मान लिया गया। इसके बदले में भोपाल गैस कांड के पीड़ितो को क्या मिला, यह भी देख लीजिए? 713 करोड़ रूपये मात्र मुआबजे के तौर पर यूनियन कार्बाइड कारपोरेशन ने दिये थे। दुनिया की सबसे बड़ी औधोगिक त्रासदी और 15 हजार से ज्यादा जानें छीनने वाली व पांच लाख से ज्यादा की आबादी को पीड़ित करने वाली इस नरसंहारक घटना की मुआबजा मात्र 713 करोड़ रूपये। भारत सरकार की अतिरूचि और यूनियन गैस कार्बाइड कारपोरेशन के प्रति अतिरिक्त मोह ने गैस पीड़ितों के संभावनाओं का गल्ला घोट दिया। सबसे बड़ी बात तो यह है कि इस नरसंहारक घटना में सैकड़ों लोग ऐसे मारे गये थे जिनके पास न तो कोई रिहायशी प्रमाण थे और न ही नियमित पत्ते का पंजीकरण था। ऐसे गरीब हताहतों के साथ न्याय नहीं हुआ। उन्हें मुआबजा भी नहीं मिला। सरकारी कामकाज के झंझटों के कारण भी मुआबजा की राशि दुर्बल और असहाय लोगों तक नहीं पहुंची।
एडरसन को मिला सरकारी रक्षाकवच..........................................................................
यूनियन गैस कार्बाइड कारपोरेशन के मालिक वारेन एडरसन के साथ भारत सरकार का विशेषाधिकार जुड़ा हुआ था। पुलिस-प्रशासन और न्यायपालिका भी वारेन एडरसन के प्रति नरम रूख जताया था। पुलिस-प्रशासन, केन्द्र-मध्यप्रदेश की तत्कालीन सरकारें और न्यायपालिका का नरम रूख नहीं होता और पक्षकारी भूमिका नहीं होती तो क्या वारेन एडरसन भारत से भागने में सफल होता। ऐसे तथ्य हैं जिससे साफ झलकता है कि भारतीय सत्ता व्यवस्था एडरसन के हित को सुरक्षित रखने में कितना संलग्न था और पक्षकारी था। इतने बड़े नरसंहारक घटना के लिए मुख्य दोषी को रातोरात जमानत कैसे मिल जाती है? घटना के बाद पांच दिसम्बर 1984 को एडरसन भारत आया था। पुलिस उसे गिरफतार करती है पर एडरसन को जेल नहीं भेजा जाता है। गेस्ट हाउस में रखा जाता है। गैस हाउस से ही उसे जमानत मिल जाती है। इतना ही नहीं बल्कि भोपाल से दिल्ली आने के लिए भारत सरकार हवाई जहाज भेजती है। भारत सरकार के हवाईजहाज से एडरसन दिल्ली आता है और फिर अमेरिका भाग जाता है। अभी तक एडरसन अमेरिका में ही रह रहा है। ज्ञात तौर पर उसकी सक्रियता बनी हुई है। विभिन्न व्यापारिक और औद्योगिक योजनाओं में न केवल उसकी सक्रियता है बल्कि उसके पास मालिकाना हक भी है। इसके बाद सीबीआई वारेन एडरसन का पत्ता नहीं खोज पायी है। अभी तक वह भारतीय न्यायप्रकिया के तहत फरार ही है।
फैसले को न्यायिक त्रासदी दिया करार...................................
गैस पीड़ितों के लिए लडाई लड़ने वाले हरेक संगठन ने न्यायिक मजिस्ट्रेट के इस फैसले को न्यायिक त्रासदी करार दिया है। अव्दुल जबार कहते है कि पीड़ितों पर पहले औद्योगिक त्रासदी का नरसंहार हुआ और अब न्यायिक त्रासदी हुई है। जिम्मेवार और लापरवाह अभियुक्तों को फांसी मिलनी चाहिए थी लेकिन उन्हें मात्र दो-दो साल का जेल की सजा हुई है और एक-एक लाख का जुर्माना हुआ है। यह सजा कुछ भी नही है। क्या 15 हजार से ज्यादा गंवायी गयी जान और पांच लाख से ज्यादा हुए अपाहिज लोगों की पीड़ा को यह सजा कम कर पायेगी? इसका उत्तर कदापि में नहीं है। गैस पीडितों की नाराजगी समझी जा सकती है। गैस पीड़ित न्यायिक मजिस्ट्रेट के इस फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील करने का एलान कर चुके हैं। जहां से न्याय की उन्हें उम्मीद तो होगी पर संधर्ष भी कम नहीं होगा। सबसे अधिक चिंताजनक बात यह है कि न्यायिक मजिस्टेट के फैसले में मुख्य दोषी वारेन एडरसन पर कोई टिप्पणी नहीं है। एडरसन पर टिप्पणी न होना भी गैस पीड़ितों की पीड़ा और संधर्ष की राह मुश्किल करता है।
एडरसन को सजा क्यों न मिले..............................................
दुनिया में अन्य कोई जगह पर ऐसी नरसंहारक औद्योगिक त्रासदी हुई होती तो निश्चित मानिये की एडरसन इस तरह अबाधित और निश्चित होकर अपनी सक्रियता नहीं दिखा सकता था। उसकी जगह जेल होती। लेकिन भारत जैसे देश की सरकार जनता के प्रति नहीं बल्कि औद्योगिक घरानो के हित को साधने ज्याद तत्पर रहती है। भारत सरकार को अब अपनी सोच बदलनी चाहिए। भोपाल गैस कांड के पीड़ितों को न्याय मिलें। ऐसी सरकारी प्रक्रिया क्यों नहीं चलनी चाहिए? अमेरिका पर कूटनीतिक दबाव डालना चाहिए कि एडरसन को पकड़कर भारत को सौंपा जाये। अमेरिका भारत के साथ मधुर सबंधों की रट रोज लगाता है। लेकिन भोपाल गैस कांड के मुख्य आरोपी को उसने एक तरह से संरक्षण दिया हुआ है। हेडली का प्रकरण भी हमें नोट करने की जरूरत है। ऐसे में दोस्ती का क्या मतलब रह जाता है। भारत सरकार को खरी-खरी बात करनी होगी। अमेरिका से कहना होगा कि एडरसन भारतीय न्यायपालिका से फरार घोषित है। इसलिए उसकी जगह भारतीय जेल है। सीबीआई एडरसन पर तभी सक्रियता दिखा सकती है जब भारत सरकार ऐसी इच्छा रखेगी। क्या भारत सरकार एडरसन को भारत लाने के लिए कूटनीतिक पहल फिर से करेगी? शायद नहीं। ऐसी स्थिति में गैस पीड़तों की संघर्ष की राह और चौड़ी होगी।
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Friday, May 21, 2010
अफजल गुरू की फांसी, कानून व्यवस्था और तुष्टिकरण की सत्ता
कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टिकरण से लहूलुहान राष्ट्र की संप्रभुता
विष्णुगुप्त
विश्व में भारत एक मात्र ऐसा देश है जहां पर राष्ट्रहित-सुरक्षा पर तुष्टिकरण की राजनीति होती है। आतंकवाद जैसी आंच को बुझाने में भी वोट की राजनीति आड़े आती है। सत्ता ही नहीं बल्कि तथाकथित बुद्धीजीवी वर्ग भी देशद्रोहियों और आतंकवादियों के साथ खड़ा हो जाती है। अगर ऐसा नही ंतो फिर संसद हमले के दोषी अफजल गुरू की फांसी चार सालों से क्यों लटकी पड़ी हुई है। अफजल गुरू की फांसी पर क्या कांग्रेस तुष्टिकरण की राजनीतिक खेल खेल नहीं रही है? खासकर दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने अफजल गुरू की फांसी पर कानून व्यवस्था का सवाल उठाकर रोड़ा डाल दिया है। शीला दीक्षित ने अफजल गुरू की फांसी पर उप राज्यपाल तेजेन्द्र खन्ना को भेजे अपनी सिफारिश में कहा कि फांसी देने से पहले कानून व्यवस्था की स्थिति का आकलन किया जाना चाहिए। शीला दीक्षित के सिफारिश के दो अर्थ निकलते हैं। एक अर्थ में अफजल गुरू को फांसी पर लटकाने का समर्थन है तो दूसरे अर्थ में विरोध भी है। दूसरे अर्थ ने अपना कमाल दिखाया। इसका परिणाम देखिये। दिल्ली के उप राज्यपाल तेजेन्द्र खन्ना फांसी की फाइल को वापस भेजने के लिए मजबूर हुए। फिर वापस फांसी की फाइल शीला दीक्षित के पास आ गयी। अब शीला दीक्षित दुबारा कब फांसी की फाइल को उप राज्यपाल के पास भेजेगी, इस संबंध मे कुछ भी नहीं कहा जा सकता है। ऐसे भी शीला दीक्षित के सामने कोई संवैधानिक मजबूरी भी नहीं है। दिल्ली और केन्द्र में दोनों जगह कांग्रेस की सरकार है। इसलिए शीला दीक्षित के सामने कोई राजनीतिक संकट भी सामने नहीं आयेगा। कांग्रेस प्रारंभ से ही अफजल गुरू को फांसी पर लटकाने के प्रसंग पर ईमानदार नहीं रही है। तीखे आलोचनाओं और राजनीतिक विरोध के निशाने पर कांग्रेस के रहने के बाद भी अभी तक अफजल गुरू की फांसी स्थायी रूप से स्थगित होने की स्थिति में रखने का सीधा मकसद मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति है। कांग्रेस सत्ता नीति और मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति एक-दूसरे से गंभीरता के साथ जुड़ी हुई है। बाबरी मस्जिद के ढ़ाचे के ध्वस्तीकरण के बाद मुस्लिम जनमत कांग्रेस से अलग हो गया था। पिछले दो लोकसभा चुनावों में फिर से मुस्लिम जनमत कांग्रेस के साथ मजबूती के साथ जुड़ा। कांग्रेस को डर है कि अफजल गुरू को फांसी पर लटकाने में उसका मुस्लिम समर्थन दूर हो जायेगा। अफजल गुरू संसद हमले का दोषी है और उसे देश का सर्वोच्च न्यायालय ने फांसी की सजा दी है। राष्ट्रहित और राष्ट्र की सुरक्षा के मद्देनजर अफजल गुरू को फांसी पर लटकाने में देरी नहीं होनी चाहिए। सबसे बड़ी बात तो यह है कि अफजल गुरू के फांसी पर लटकाने पर आतंकवादियों और उसके आका पाकिस्तान को एक कड़ा संदेश व सबक मिलेगा। भारत के नरम राष्ट्र होने की गलत फहमी भी टूटती।
अफजल गुरू की फांसी वाली फाइल चार सालों तक किस मकसद से कांग्रेस दबा कर रखी। क्या यह जानने का अधिकार देश की जनता को नहीं है। इंदिरा गाधी के हत्यारों का नजीर हमारे सामने मौजूद है। शीला दीक्षित जैसा ही तर्क दिया जा रहा था कि सिख हत्यारों को फांसी पर लटकाने से देश की संप्रभुता खतरे में होगी, सिख फिर से पाकिस्तान के मोहरे बनेंगे, पंजाब में आयी शांति दूर हो जायेगी, पंजाब में फिर से आतंकवाद चरम पर होगा। विदेशों में बसे सिखों की धममियां अलग से थीं। इन सभी अशांकाओं से अलग हटकर इंदिरा गांधी के हत्यारों को फांसी दी गयी। कहीं से भी राष्ट्र की संप्रभुता पर कोई आंच नहीं आयी। इसी तरह अफजल गुरू को फांसी पर लटकाने पर शीला दीक्षत की चिंताएं कोई पहाड़ नहीं तोड़ पायेगी। कश्मीर जैसे जगहों पर कुछ विरोध चिंगारियां जरूर फुटेंगी। वहां पर ऐसे भी शांति कब रही है। देश के सभी भागों से मुस्लिम संवर्ग इस सवाल से आंदोलित होगा, ऐसा भी नहीं है।
चार साल बनाम 16 रिमाइंडर -
अफजल गुरू की फांसी की फाइल चार सालों तक दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की अलमारियों की धूल फांकती रही। चार साल पूर्व सुप्रीम कोर्ट ने संसद हमले में अफजल गुरू को फांसी की सजा सुनायी थी। जिस समय सुप्रीम कोर्ट ने अफजल गुरू को फांसी की सजा सुनायी थी उस समय भी अफजल गुरू देश की संप्रभुता के खिलाफ सरेआम आग उगला था। संसद हमले में अफजग गुरू के साथ ही साथ दिल्ली के एक कश्मीरी मूल के प्राध्यापक की भी संलिप्तता थी पर पुलिस की लचर जांच व्यवस्था का लाभ उसे मिला था। सुप्रीम कोर्ट ने उस प्राध्यापक को तो बरी किया था पर यह भी कहा था कि उस प्राध्यापक की भूमिका संदिग्ध जरूर थी। संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार अफजल गुरू ने फांसी की सजा पर माफी की मांग राष्ट्रपति से की थी। राष्ट्रपति ने केन्द्र सरकार से अफजल गुरू की फांसी पर राय मांगी। केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने दिल्ली सरकार को फांसी वाली फाइल भेजी। फांसी की फाइल पर शीला दीक्षित कुंडली मार कर बैठ गयी। कोई एक दो दिन नहीं बल्कि पूरे चार सालों तक वह फाइल को दबाये बैठी। इस दौरान गृहमंत्रालय ने 16 बार रिमाइंडर भेजी। 16 रिमाइंडरों पर शीला दीक्षित ने फांसी वाली फाइल दबाये जाने का कोई कारण नहीं बतायी। शीला दीक्षित की सिफारिश के कुछ दिन पूर्व ही केन्द्रीय गृहमंत्री पी चिदम्बरम ने इस पर नाखुशी जतायी थी। इस नाखुशी पर स्वयं शीला दीक्षित ने केन्द्रीय गृहमंत्री पी चिदम्बरम से मुलाकात की थी। जाहिर तौर पर पी चिदम्बरम ने शीला दीक्षित को फांसी की फाइल की सक्रियता बढ़ाने का निर्णायक सलाह दी होगी। शीला दीक्षित मजबूरी में फांसी वाली फाइल उप राज्य पाल को भेजी। यह राजनीतिक तौर पर प्रमाणित बात है।
कानूनी अड़चनों से घबरायी सरकार-
कानूनी प्रावधानों का भी सवाल उठ खड़ा था। खासकर केन्द्रीय गृहमंत्रालय की परेशानी इस प्रसंग पर बढ़ी थी। विपक्षी दल भाजपा की बौखलाहट भी कम नहीं थी। भाजपा लोकसभा और राज्य सभा में कई बार तीखे प्रश्न उठा कर अफजल गुरू पर मुस्लिम तुष्टिकारण का कार्ड खेलने का आरोप लगायी थी। राष्ट्रपति जैसे गरिमापूर्ण पद पर लांछन लग रहा था। सुप्रीम कोर्ट मे भी अफजल गुरू की फांसी पर दया की मांग का प्रसंग जा सकता था। आखिर कितने दिनों तक कोई सरकार अपने सत्ता नीति और स्वार्थ में एक राष्ट्रद्रोही और आतंकवादी को फांसी पर चढ़ाने से रोक सकती है। कानून और संविधान में समयबद्धता का बंधन नहीं है पर सर्वोच्च न्यायालय का संविधान पीठ इस प्रसंग पर नयी व्याख्या दे सकती है। कई ऐसे मामले पहले भी आये जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने नयी व्यवस्था दी है। अगर यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में जाता तो यूपीए सरकार की फजीहत होती और उस पर मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति अपनाने जैसे आरोप लगते। ऐसी स्थिति से बचने के लिए ही कांग्रेस ने अफजल गुरू की फांसी वाली फाइल को सक्रिय करने के लिए तैयार हुई है। यह सही माना जाना चाहिए कि शीला दीक्षित ने जो कानून व्यवस्था का अड़चन डाला है वह भी कांग्रेस की एक सोची समझी नीति का हिस्सा है। ऐसा इसलिए कि कांग्रेस को अफजल की फांसी को अधर में लटकाने का और समय मिल जायेगा।
इंदिरा गांधी के हत्यारों की फांसी एक नजीर-
इंदिरा गाधी के हत्यारों का नजीर हमारे सामने मौजूद है। इंदिरा गांधी के हत्यारों को फांसी देने के समय भी कानून व्यवस्था का सवाल उठा था। सिख हत्यारों को फांसी पर लटकाने का देश भर में विरोध हुआ था। शीला दीक्षित जैसा ही तर्क दिया जा रहा था कि सिख हत्यारों को फांसी पर लटकाने से देश की संप्रभुता खतरे में होगी, सिख फिर से पाकिस्तान के मोहरे बनेंगे, पंजाब में आयी शांति दूर हो जायेगी, पंजाब में फिर से आतंकवाद चरम पर होगा। इत्यादि-इत्यादि। विदेशों में बसे सिखों की धममियां अलग से थीं। राजनीतिक बहादुरी दिखायी गयीं। इन सभी अशांकाओं से अलग हटकर इंदिरा गांधी के हत्यारों को फांसी दी गयी। कहीं से भी राष्ट्र की संप्रभुता पर कोई आंच नहीं आयी। संदेश गहरे थे और सबके कड़े थे। इस गहरे संदेश और सबक को सिख समाज ने सकारात्मक रूप से लिया। सिख समाज ने खुद आतंकवाद से लड़ने का काम किया। सिख समाज की बहादुरी से आज पंजाब फिर से देश का सिरमौर है। इसी तरह अफजल गुरू को फांसी पर लटकाने पर शीला दीक्षत की चिंताएं कोई पहाड़ नहीं तोड़ पायेगी। कश्मीर जैसे जगहों पर कुछ विरोध चिंगारियां जरूर फुटेंगी। वहां पर ऐसे भी शांति कब रही है। देश के सभी भागों से मुस्लिम संवर्ग इस सवाल से आंदोलित होगा, ऐसा भी नहीं है।
कड़े सबक-संदेश की जरूरत
भारत की छवि एक नरम राष्ट्र की है। पाकिस्तान और आतंकवादी यह समझते हैं कि भारत एक कायर और डरपोक राष्ट्र है। भारत सिर्फ बयानों और कागजों में ही वीरता दिखा सकता है। इस छवि छुटकारा पाना निहायत ही जरूरी है। हमने विगत मे आतंकवादियो को छोड़कर और उनसे समझौते कर एक राष्ट्र की सबलता-जीवंतता पर कुल्हाड़ी मारी है। खूखांर आतंकवादियों को काबूल ले जाकर छोड़ना हमारे राष्ट्र के उपर एक कंलक के समान है। इसीलिए हम आतंकवाद का आसान शिकार है और हमारी संप्रभुता लहूलुहान भी है। आतंक के बल पर कश्मीर छीनने की कोशिश जारी है। आतंकवादी यह मान बैठे हैं कि भारत की राजनीतिक स्थितियां और कमजोर कानून से उनका कुछ भी नहीं बिगड़ सकता है। आतंकवादियों के आका पाकिस्तान भी कुछ ऐसे दिलासे और आश्वासन आतंकवादियों को देता रहा है। अफजल गुरू को फांसी पर लटकाने से आतंकवादियों के बीच डर कायम होगा। भारत के खिलाफ अघोषित युद्ध और खूनी राजनीति पर अंकुश लगेगा। सही यह भी है कि हमें अपने घर के तथाकथित बुद्धीजीवियों का प्रबंधन करना होगा। देश का तथाकथित बुद्धीजीवी संवर्ग हमेशा राष्ट्रहित की कीमत परहित की फसल लहलहहाते हैं। आतंकवाद का समर्थन करने में भी इन्हें गुरेज नहीं होता। देश में आतंकवाद और पाकिस्तान समर्थक बुद्धीजीवियों की एक बड़ी फौज खड़ी हो गयी। बुद्धीजीवियों की इस फौज को उर्जा कहां से मिलती है। सिगरेट कहां से मिलती है? कीमती गाड़िया, जीन्स और पंचसितारा सुविधाएं कहां से मिलती हैं। अब इस पर भी गौर करना होगा। क्या कांग्रेस अफजल गुरू को फांसी पर लटकायेगी? असली सवाल यही है। कांग्रेस और यूपीए सरकार को इस प्रसंग में दबाव बनाने के लिए जनमत की सक्रियता की जरूरत होगी।
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कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टिकरण से लहूलुहान राष्ट्र की संप्रभुता
विष्णुगुप्त
विश्व में भारत एक मात्र ऐसा देश है जहां पर राष्ट्रहित-सुरक्षा पर तुष्टिकरण की राजनीति होती है। आतंकवाद जैसी आंच को बुझाने में भी वोट की राजनीति आड़े आती है। सत्ता ही नहीं बल्कि तथाकथित बुद्धीजीवी वर्ग भी देशद्रोहियों और आतंकवादियों के साथ खड़ा हो जाती है। अगर ऐसा नही ंतो फिर संसद हमले के दोषी अफजल गुरू की फांसी चार सालों से क्यों लटकी पड़ी हुई है। अफजल गुरू की फांसी पर क्या कांग्रेस तुष्टिकरण की राजनीतिक खेल खेल नहीं रही है? खासकर दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने अफजल गुरू की फांसी पर कानून व्यवस्था का सवाल उठाकर रोड़ा डाल दिया है। शीला दीक्षित ने अफजल गुरू की फांसी पर उप राज्यपाल तेजेन्द्र खन्ना को भेजे अपनी सिफारिश में कहा कि फांसी देने से पहले कानून व्यवस्था की स्थिति का आकलन किया जाना चाहिए। शीला दीक्षित के सिफारिश के दो अर्थ निकलते हैं। एक अर्थ में अफजल गुरू को फांसी पर लटकाने का समर्थन है तो दूसरे अर्थ में विरोध भी है। दूसरे अर्थ ने अपना कमाल दिखाया। इसका परिणाम देखिये। दिल्ली के उप राज्यपाल तेजेन्द्र खन्ना फांसी की फाइल को वापस भेजने के लिए मजबूर हुए। फिर वापस फांसी की फाइल शीला दीक्षित के पास आ गयी। अब शीला दीक्षित दुबारा कब फांसी की फाइल को उप राज्यपाल के पास भेजेगी, इस संबंध मे कुछ भी नहीं कहा जा सकता है। ऐसे भी शीला दीक्षित के सामने कोई संवैधानिक मजबूरी भी नहीं है। दिल्ली और केन्द्र में दोनों जगह कांग्रेस की सरकार है। इसलिए शीला दीक्षित के सामने कोई राजनीतिक संकट भी सामने नहीं आयेगा। कांग्रेस प्रारंभ से ही अफजल गुरू को फांसी पर लटकाने के प्रसंग पर ईमानदार नहीं रही है। तीखे आलोचनाओं और राजनीतिक विरोध के निशाने पर कांग्रेस के रहने के बाद भी अभी तक अफजल गुरू की फांसी स्थायी रूप से स्थगित होने की स्थिति में रखने का सीधा मकसद मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति है। कांग्रेस सत्ता नीति और मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति एक-दूसरे से गंभीरता के साथ जुड़ी हुई है। बाबरी मस्जिद के ढ़ाचे के ध्वस्तीकरण के बाद मुस्लिम जनमत कांग्रेस से अलग हो गया था। पिछले दो लोकसभा चुनावों में फिर से मुस्लिम जनमत कांग्रेस के साथ मजबूती के साथ जुड़ा। कांग्रेस को डर है कि अफजल गुरू को फांसी पर लटकाने में उसका मुस्लिम समर्थन दूर हो जायेगा। अफजल गुरू संसद हमले का दोषी है और उसे देश का सर्वोच्च न्यायालय ने फांसी की सजा दी है। राष्ट्रहित और राष्ट्र की सुरक्षा के मद्देनजर अफजल गुरू को फांसी पर लटकाने में देरी नहीं होनी चाहिए। सबसे बड़ी बात तो यह है कि अफजल गुरू के फांसी पर लटकाने पर आतंकवादियों और उसके आका पाकिस्तान को एक कड़ा संदेश व सबक मिलेगा। भारत के नरम राष्ट्र होने की गलत फहमी भी टूटती।
अफजल गुरू की फांसी वाली फाइल चार सालों तक किस मकसद से कांग्रेस दबा कर रखी। क्या यह जानने का अधिकार देश की जनता को नहीं है। इंदिरा गाधी के हत्यारों का नजीर हमारे सामने मौजूद है। शीला दीक्षित जैसा ही तर्क दिया जा रहा था कि सिख हत्यारों को फांसी पर लटकाने से देश की संप्रभुता खतरे में होगी, सिख फिर से पाकिस्तान के मोहरे बनेंगे, पंजाब में आयी शांति दूर हो जायेगी, पंजाब में फिर से आतंकवाद चरम पर होगा। विदेशों में बसे सिखों की धममियां अलग से थीं। इन सभी अशांकाओं से अलग हटकर इंदिरा गांधी के हत्यारों को फांसी दी गयी। कहीं से भी राष्ट्र की संप्रभुता पर कोई आंच नहीं आयी। इसी तरह अफजल गुरू को फांसी पर लटकाने पर शीला दीक्षत की चिंताएं कोई पहाड़ नहीं तोड़ पायेगी। कश्मीर जैसे जगहों पर कुछ विरोध चिंगारियां जरूर फुटेंगी। वहां पर ऐसे भी शांति कब रही है। देश के सभी भागों से मुस्लिम संवर्ग इस सवाल से आंदोलित होगा, ऐसा भी नहीं है।
चार साल बनाम 16 रिमाइंडर -
अफजल गुरू की फांसी की फाइल चार सालों तक दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की अलमारियों की धूल फांकती रही। चार साल पूर्व सुप्रीम कोर्ट ने संसद हमले में अफजल गुरू को फांसी की सजा सुनायी थी। जिस समय सुप्रीम कोर्ट ने अफजल गुरू को फांसी की सजा सुनायी थी उस समय भी अफजल गुरू देश की संप्रभुता के खिलाफ सरेआम आग उगला था। संसद हमले में अफजग गुरू के साथ ही साथ दिल्ली के एक कश्मीरी मूल के प्राध्यापक की भी संलिप्तता थी पर पुलिस की लचर जांच व्यवस्था का लाभ उसे मिला था। सुप्रीम कोर्ट ने उस प्राध्यापक को तो बरी किया था पर यह भी कहा था कि उस प्राध्यापक की भूमिका संदिग्ध जरूर थी। संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार अफजल गुरू ने फांसी की सजा पर माफी की मांग राष्ट्रपति से की थी। राष्ट्रपति ने केन्द्र सरकार से अफजल गुरू की फांसी पर राय मांगी। केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने दिल्ली सरकार को फांसी वाली फाइल भेजी। फांसी की फाइल पर शीला दीक्षित कुंडली मार कर बैठ गयी। कोई एक दो दिन नहीं बल्कि पूरे चार सालों तक वह फाइल को दबाये बैठी। इस दौरान गृहमंत्रालय ने 16 बार रिमाइंडर भेजी। 16 रिमाइंडरों पर शीला दीक्षित ने फांसी वाली फाइल दबाये जाने का कोई कारण नहीं बतायी। शीला दीक्षित की सिफारिश के कुछ दिन पूर्व ही केन्द्रीय गृहमंत्री पी चिदम्बरम ने इस पर नाखुशी जतायी थी। इस नाखुशी पर स्वयं शीला दीक्षित ने केन्द्रीय गृहमंत्री पी चिदम्बरम से मुलाकात की थी। जाहिर तौर पर पी चिदम्बरम ने शीला दीक्षित को फांसी की फाइल की सक्रियता बढ़ाने का निर्णायक सलाह दी होगी। शीला दीक्षित मजबूरी में फांसी वाली फाइल उप राज्य पाल को भेजी। यह राजनीतिक तौर पर प्रमाणित बात है।
कानूनी अड़चनों से घबरायी सरकार-
कानूनी प्रावधानों का भी सवाल उठ खड़ा था। खासकर केन्द्रीय गृहमंत्रालय की परेशानी इस प्रसंग पर बढ़ी थी। विपक्षी दल भाजपा की बौखलाहट भी कम नहीं थी। भाजपा लोकसभा और राज्य सभा में कई बार तीखे प्रश्न उठा कर अफजल गुरू पर मुस्लिम तुष्टिकारण का कार्ड खेलने का आरोप लगायी थी। राष्ट्रपति जैसे गरिमापूर्ण पद पर लांछन लग रहा था। सुप्रीम कोर्ट मे भी अफजल गुरू की फांसी पर दया की मांग का प्रसंग जा सकता था। आखिर कितने दिनों तक कोई सरकार अपने सत्ता नीति और स्वार्थ में एक राष्ट्रद्रोही और आतंकवादी को फांसी पर चढ़ाने से रोक सकती है। कानून और संविधान में समयबद्धता का बंधन नहीं है पर सर्वोच्च न्यायालय का संविधान पीठ इस प्रसंग पर नयी व्याख्या दे सकती है। कई ऐसे मामले पहले भी आये जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने नयी व्यवस्था दी है। अगर यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में जाता तो यूपीए सरकार की फजीहत होती और उस पर मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति अपनाने जैसे आरोप लगते। ऐसी स्थिति से बचने के लिए ही कांग्रेस ने अफजल गुरू की फांसी वाली फाइल को सक्रिय करने के लिए तैयार हुई है। यह सही माना जाना चाहिए कि शीला दीक्षित ने जो कानून व्यवस्था का अड़चन डाला है वह भी कांग्रेस की एक सोची समझी नीति का हिस्सा है। ऐसा इसलिए कि कांग्रेस को अफजल की फांसी को अधर में लटकाने का और समय मिल जायेगा।
इंदिरा गांधी के हत्यारों की फांसी एक नजीर-
इंदिरा गाधी के हत्यारों का नजीर हमारे सामने मौजूद है। इंदिरा गांधी के हत्यारों को फांसी देने के समय भी कानून व्यवस्था का सवाल उठा था। सिख हत्यारों को फांसी पर लटकाने का देश भर में विरोध हुआ था। शीला दीक्षित जैसा ही तर्क दिया जा रहा था कि सिख हत्यारों को फांसी पर लटकाने से देश की संप्रभुता खतरे में होगी, सिख फिर से पाकिस्तान के मोहरे बनेंगे, पंजाब में आयी शांति दूर हो जायेगी, पंजाब में फिर से आतंकवाद चरम पर होगा। इत्यादि-इत्यादि। विदेशों में बसे सिखों की धममियां अलग से थीं। राजनीतिक बहादुरी दिखायी गयीं। इन सभी अशांकाओं से अलग हटकर इंदिरा गांधी के हत्यारों को फांसी दी गयी। कहीं से भी राष्ट्र की संप्रभुता पर कोई आंच नहीं आयी। संदेश गहरे थे और सबके कड़े थे। इस गहरे संदेश और सबक को सिख समाज ने सकारात्मक रूप से लिया। सिख समाज ने खुद आतंकवाद से लड़ने का काम किया। सिख समाज की बहादुरी से आज पंजाब फिर से देश का सिरमौर है। इसी तरह अफजल गुरू को फांसी पर लटकाने पर शीला दीक्षत की चिंताएं कोई पहाड़ नहीं तोड़ पायेगी। कश्मीर जैसे जगहों पर कुछ विरोध चिंगारियां जरूर फुटेंगी। वहां पर ऐसे भी शांति कब रही है। देश के सभी भागों से मुस्लिम संवर्ग इस सवाल से आंदोलित होगा, ऐसा भी नहीं है।
कड़े सबक-संदेश की जरूरत
भारत की छवि एक नरम राष्ट्र की है। पाकिस्तान और आतंकवादी यह समझते हैं कि भारत एक कायर और डरपोक राष्ट्र है। भारत सिर्फ बयानों और कागजों में ही वीरता दिखा सकता है। इस छवि छुटकारा पाना निहायत ही जरूरी है। हमने विगत मे आतंकवादियो को छोड़कर और उनसे समझौते कर एक राष्ट्र की सबलता-जीवंतता पर कुल्हाड़ी मारी है। खूखांर आतंकवादियों को काबूल ले जाकर छोड़ना हमारे राष्ट्र के उपर एक कंलक के समान है। इसीलिए हम आतंकवाद का आसान शिकार है और हमारी संप्रभुता लहूलुहान भी है। आतंक के बल पर कश्मीर छीनने की कोशिश जारी है। आतंकवादी यह मान बैठे हैं कि भारत की राजनीतिक स्थितियां और कमजोर कानून से उनका कुछ भी नहीं बिगड़ सकता है। आतंकवादियों के आका पाकिस्तान भी कुछ ऐसे दिलासे और आश्वासन आतंकवादियों को देता रहा है। अफजल गुरू को फांसी पर लटकाने से आतंकवादियों के बीच डर कायम होगा। भारत के खिलाफ अघोषित युद्ध और खूनी राजनीति पर अंकुश लगेगा। सही यह भी है कि हमें अपने घर के तथाकथित बुद्धीजीवियों का प्रबंधन करना होगा। देश का तथाकथित बुद्धीजीवी संवर्ग हमेशा राष्ट्रहित की कीमत परहित की फसल लहलहहाते हैं। आतंकवाद का समर्थन करने में भी इन्हें गुरेज नहीं होता। देश में आतंकवाद और पाकिस्तान समर्थक बुद्धीजीवियों की एक बड़ी फौज खड़ी हो गयी। बुद्धीजीवियों की इस फौज को उर्जा कहां से मिलती है। सिगरेट कहां से मिलती है? कीमती गाड़िया, जीन्स और पंचसितारा सुविधाएं कहां से मिलती हैं। अब इस पर भी गौर करना होगा। क्या कांग्रेस अफजल गुरू को फांसी पर लटकायेगी? असली सवाल यही है। कांग्रेस और यूपीए सरकार को इस प्रसंग में दबाव बनाने के लिए जनमत की सक्रियता की जरूरत होगी।
मोबाइल - 09968997060
Wednesday, May 5, 2010
प्रेमी प्रियभांषु को सजा कौन दिलायेगा?
राष्ट्र-चिंतन
प्रेमी प्रियभांषु को सजा कौन दिलायेगा?
ऑनर किलिंग से बच सकती थी महिला पत्रकार निरूपमा
विष्णुगुप्त
सिर्फ प्रियभांषु को मालूम था कि निरूपमा ऑनर किलिंग का ग्रास बनने जा रही है। क्या उसने निरूपमा की जान बचाने के लिए पुलिस और हाईकोर्ट में गुहार लगायी ? वह चुपचाप निरूपमा को ऑनर किलिंग के ग्रास में जाते देखता रहा। कब चिल्लाया? वह महिला आयोग और पत्रकार संगठनों का दरवाजा कब खट-खटकाया? मीडिया में अपनी खतरनाक प्रेम कहानी कब खोली? जब निरूपमा की हत्या हो चुकी थी। निरूपमा के परिजनों को सजा हो ही जायेगी पर निरूपमा की जान वापस आयेगी क्या? विवाह पूर्व असुरक्षित-खतरनाक यौन संबंध का ी दोषी है प्रियभांषु।
ऑनर किलिंग से महिला पत्रकार निरूपमा बच सकती थी। निरूपमा पाठक और प्रियभांषु रंजन की खतरनाक, असुरक्षित, लापरवाह और गैरजिम्मवार प्रेम कहानी के कई ऐसे पत्रडाव थे जहां पर दिल नहीं दिमाग और नैतिकता सक्रिय होती तो ऑनर किलिंग की नौबत आती नहीं या फिर ऑनर किलिंग के रास्ते अपनाने से पहले ही उसके परिजनों को कानून का पाठ पत्रढाया जा सकता था। परिजनों के चुंगुल से निरूपमा मुक्त ी हो सकती थी। खतरनाक, असुरक्षित, लापरवाह, गैरजिम्मेदार और नैतिकहीन प्रेम कहानी की संज्ञा देने में यहां कोई पूर्वाग्रह नहीं है बल्कि यर्थाथ है, सच्चाई है। इस सच्चाई और यथार्थ में निरूपमा के प्रेमी पत्रकार प्रियभांषु ी कहीं न कहीं दोषी के रूप में खत्रडा है। हालांकि अ ी तक सच्चाई और यथार्थ के दृष्टिकोण से प्रेमी प्रिय ाषु रंजन ी दोषी है, मीडिया या अन्य चिंतक वर्ग ने ंिचंतन ही नहीं किया है। जबकि पूरे तथ्य इस प्रकरण में सूक्षमता और गहणता के साथ चिंतन की माग जरूर करता है। क्या महिला पत्रकार निरूपमा गर् वती नहीं थी। उसके गर् में एक-दो नहीं बल्कि चार माह से अधिक का शिशु पल रहा था। यह गर् जाहिरतौर पर असुरक्षित यौन संबध का परिणाम था। क्या नैतिकता शादी के पूर्व असुरक्षित यौन संबंध की इजाजत देती है?प्रियभांषु रंजन यह कहकर इस दोष से बच नहीं सकते हैं कि वह अज्ञानी था, मजदूर या अन्य अशिक्षित वर्ग का प्रतिनिधित्व करता था। प्रियभांषु रंजन देश का सबसे बत्रडी समाचार एजेन्सी में पत्रकार है। इसलिए वह समाज का सबसे बत्रडा जागरूक वर्ग से जुत्रडा हुआ है। रेडियो, टेलीविजन और अखबारों में असुरक्षित यौन संबंधों से संबंधित विज्ञापन और उसके परिणामों की चेतावनी सालों-साल से जारी है। यहां तक कि दीवार और होल्डिंगों पर ी ी यह चेतावनी नियमित प्रसारित होती है,अंकित होती है। क्या ऐसे विज्ञापन और चेतावनी एक पत्रकार के लिए कोई मायने नहीं रख्ता है तब हम समाज के अन्य कम जागरूक वर्ग से उम्मीद क्या कर सकते हैं? चार माह के गर् के बाद ी शादी का विकल्प क्यों नहीं चुना गया। यह कह देने मात्र से कि वह दोष से बरी नहीं हो सकता है कि निरूपमा के परिजन तैयार नहीं थे। कोर्ट मैरेज का विकल्प क्यो नहीं चुना गया। निरूपमा की जान खतरे में थी और वह धीरे-धीरे ऑनरकिलिंग की परिस्थितियों से धिर रही थी तब पुलिस और न्यायालय सहित मीडिया संस्थानों की सहायता क्यों नहीं ली गयी। पुलिस, न्यायालय और मीडिया संस्थानों के हस्तक्षेप से ऑनर किलिंग से निरूपमा बच सकती थी और वापस दिल्ली आ सकती थी।
निरूपमा अब इस दुनिया में नहीं है। इसलिए उसके प्रति प्रियभांषु कितना समर्पित था और ईमानादार था, इसे भी शक की निगाह से देखी जानी चाहिए। कही प्रियभांषु निरूपमा के साथ दोहरा खेल तो नहीं खेल रहा था। मोहरे से मोहरे लडाने में तो वह नहीं लगा था। निरूपमा के गर् को वह उसके घर वालों के माध्यम से ही निपटाना चाहता था क्या? क्योंकि गर् का प्रश्न हल हो जाने के बाद प्रियभांषु शादी के झमेले में पडने से ी बच सकता था। अगर ऐसी धारणा सही हो सकती है तो निरूपमा अपने परिजनों के साथ ही साथ अपने प्रेमी प्रियभांषु की भी साजिश का शिकार हुई है?
सिर्फ प्रियभांषु को मालूम था कि निरूपमा ऑनर किलिंग का ग्रास बनने जा रही है। क्या उसने निरूपमा की जान बचाने के लिए पुलिस और हाईकोर्ट में गुहार लगायी ? वह चुपचाप निरूपमा को ऑनर किलिंग के ग्रास में जाते देखता रहा। प्रियभांषु कब चिल्लाया? वह महिला आयोग और पत्रकार संगठनों का दरवाजा कब खट-खटकाया? मीडिया में अपनी खतरनाक प्रेम कहानी कब खोली? जब निरूपमा की हत्या हो चुकी थी। निरूपमा के परिजनों को सजा हो ही जायेगी पर निरूपमा की जान वापस आयेगी क्या? विवाह पूर्व असुरक्षित-खतरनाक यौन संबंध का ी दोषी है प्रियभांषु।
प्रेमी प्रियभांषु रंजन पर एक और गं ीर लापरवाही सामने आती है। प्रियभांषु के शब्दों में निरूपमा पाठक के परिजन किसी ी परिस्थिति में शादी नहीं होने देने के लिए कटिबद्ध थे। इसके लिए निरूपमा के परिजन प्यार, लोकलाज से लेकर इज्जत का ी हवाला देकर निरूपमा को प्रियभांषु से अलग करने की कोशिश हुई थी। निरूपमा पर उसके परिजनों ने कठोरता ी बरती थी।प्रियभांषु रंजन की ये स ी बातें सही हैं। ऐसी प्रक्रिया चली होगी। ऑनर किलिंग से पहले निरूपमा के परिजन ये स ी हथकंडे जरूर अपनाये होंगे। जो परिवार और जो घराना ऑनर किलिंग कर सकता है वह परिवार और घराना उसके पहले अपनी इज्जत का हवाला देकर कुछ ी कर सकता है। पिता द्वारा निरूपमा पाठक को लिखी गयी चिट्ठी ी इसकी गवाही देती है। यह सब यहां यह जताने के लिए तथ्य और ऑनर किलिंग की स्थितियां बतायी जा रही है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि निरूपमा खतरे से घिरी हुई थी। खतरा उसके परिजनों से ही था। यह ी ज्ञात हुआ है कि वह कई महीनों से घर नहीं गयी थी। इस खतरे को देखते हुए ी निरूपमा अपने मां-पिता से मिलने झारखंड की कोडरमा शहर अपने घर गयी और जाने दिया गया। आम समझ यह है कि जब निरूपमा पर खतरा था वह ी ऑनर किलिंग की स्थितियां उत्पन्न होने या फिर उसके ग्रास बनाये जाने की तब निरूपमा को दिल्ली से कडोरमा जाने ही क्यों दिया गया। तर्क यह दिया जा रहा है कि उसकी मां ने अपनी बीमारी की झूठी खबर देकर बुलायी थी। यह तो पहले से ही स्पष्ट था कि उसके परिजन किसी ी खतरनाक और लोमहर्षक प्रक्रिया को अपना सकते हैं। ऐसी स्थिति में प्रिय ांषु रंजन को निरूपमा को कोडरमा जाने से रोकना चाहिए था। यह ी स्पष्ट हुआ है कि निरूपमा के प्रिय ाषु के साथ प्यार और शादी के लिए जिद करने की जानकारी परिजनों को थी पर वह चार महीने की गर् वती थी यह जानकारी निरूपमा के घर आने पर ही उसके परिजनो को हुई होगी। गांवों और कस्बायी महिलाओं को एक-दो दिन के गर् के लकक्षण ी पता चल जाता है। वह तो चार माह की गर् वती थी।
निरूपमा ऑनर किलिंग की ग्रास बनने की ओर अग्रसर हो रही है। ऐसी जानकारियां निरूपमा अपने प्रेमी प्रियभांषु रंजन को देती रही थी। एसएमएस और मोबाइल कॉल के द्वारा। टेलीविजनों और प्रिंट मीडिया में ी निरूपमा द्वारा प्रिय ांषु रंजन को ेजे गये एसएमएस दिखाया गया। एसएमएस में निरूपमा लिखती है कि कोई एक्सटीम एक्शन मत लेना। यानी निरूपमा को अपनी हत्या की आशंका ही नहीं बल्कि पूरा विश्वास हो गया था। वह जान रही थी कि अब उसका बचना मुश्किल है। उसके ाई और ाई के दोस्त उस पर नजर रखे हुए थे। मां और पिता वापस दिल्ली आने देने के लिए किसी ी परिस्थिति में तैयार नहीं थे। जबकि निरूपमा दिल्ली आना चाहती थी और अपना कैरियर जारी रखना चाहती थी। ऐसी सूचना मिलने पर तत्काल उसे सहायता की जरूरत थी। पर निरूपमा को सहायता मिली नहीं। निरूपमा की जान खतरे में है यह जानकारी सिर्फ और सिर्फ प्रियभांषु रंजन को थी। प्रियभांषु ने निरूपमा को सुरक्षा दिलाने और उसकी जान बचाने की कोई कार्रवाई नहीं की। प्रियभांषु रंजन झा रंजनरखंड ओर कोडरमा पुलिस से निरूपमा की जान बचाने की गुहार लगा सकता था। प्रत्रकार संगठनों को एक महिला पत्रकार की जान बचाने के लिए तत्काल मुहिम शुरू करने के लिए कह सकता था। इसके अलावा वह हाईकोर्ट जैसे जगह पर प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कर निरूपमा को उसके परिजनों के चंगुल से मुक्त कराने का सफलतम प्रयास कर सकता था। क्या प्रियभांषु ने निरूपमा की जान बचाने के लिए पुलिस और हाईकोर्ट में गुहार लगायी? वह चुपचाप निरूपमा को ऑनर किलिंग के ग्रास में जाते देखता रहा। ऐसा मानो उसका निरूपमा से कोई वास्ता ही नहीं था।
प्रियभांषु कब चिल्लाया? वह महिला आयोग और पत्रकार संगठनों का दरवाजा कब खट-खटकाया? मीडिया कब अपनी खतरनाक प्रेम कहानी कब खोली? जब निरूपमा की हत्या हो चुकी थी। जब निरूपमा इस दुनिया में रही नहीं। ऐसी मुहिम का अब निरूपमा के लिए क्या मतलब? निरूपमा के परिजनों को सजा हो ही जायेगी पर निरूपमा की जान वापस आयेगी क्या? यह लापरवाही प्रियभांषु जान कर की है या अनजाने में। इस तथ्य का पता लगाना मुश्किल है। पर उसने खतरनाक त्रढग से लापरवाही बरती ही है।
जब घर वाले शादी के लिए राजी नहीं थे तब दोनों के पास कोर्ट मैरेज का विकल्प खुला था। हमारे जैसे अनेक लोगों का इस प्रकरण में राय यही बनी है कि अगर प्रियभांषु ने निरूपमा के साथ कोर्ट मैरेज कर लिया होता तो शायद यह हत्या नहीं होती। दिल्ली में आकर हत्या करने के लिए निरूपमा के परिजन सौ बार सोचते। ज्यादा से ज्यादा परिजन निरूपमा से नाता तोत्रड लेते। कई ऐसे उदाहरण सामने हैं जिसमें परिजनों के खिलाफ जाकर कोर्ट मैरिज हुई है और परिजनों से सुरक्षा के लिए कोर्ट ी खत्रडा हुआ है। अंतरजातीय ही नहीं बल्कि अंतधार्मिक शादियां धत्रडडले के साथ हो रही हैं और न्यायालय-प्रशासन सुरक्षा कवज के रूप में खत्रडा है। यह एक संवैधानिक जिम्मेदारी ी है।निरूपमा और प्रियभांषु दोनो वर्किग पत्रकार थे। दोनों अपने पैरों पर खत्रडे थे। इसके बाद ी यह विकल्प नहीं चुना जाना हैरतअंग्रेज बात है। जबकि दोनों के बीच 2007 से ही असुरक्षित प्रेम संबंध थे।
ऑनर किलिंग जैसी धटनाओ के लिए ारतीय समाज की विंसगतियां जिम्मेवार रही है। जातीय आधारित ारतीय समाज आज ी अपने को बदलने के लिए तैयार नहीं है। निरूपमा प्रकरण अकेली घटना नहीं है। अ ी हाल ही में न्यायालय ने हरियाणा में ऑनर किलिंग पर कत्रडी सजा सुनायी है। निरूपमा के हत्यारे परिजनों को कत्रडी सजा मिलनी चाहिए। इसके लिए पत्रकार संगठनों की सक्रियता जरूरी है। पत्रकार संगठनों और मीडिया ने निरूपमा को न्याय दिलाने के लिए सुर्खियां पर सुर्खियां बना रही है। इसी का परिणाम हुआ कि निरूपमा की मां जेल के अंदर हुई और उसके अन्य परिजन ी जेल जाने की प्रक्रिया में खत्रडे है। निरूपमा प्रकरण से ऑनर किलिंग मानसिकता को सबक मिलना चाहिए। पर हमें लापरवाह, गैर जिम्मेदार, असुरक्षित-खतरनाक यौन संबंध पर ी गौर करना चाहिए। लापरवाह, गैर जिम्मेदार, असुरक्षित-खतरनाक यौन संबंधों की प्रेम कहानी ने निरूपमा को मौत के मुंह में धकेला है और इसके लिए उसके प्रेमी प्रियभांषु रंजन ी जिम्मेदार है। इस गैर जिम्मेदार, लापरवाह, असुरक्षित और खतरनाक यौन संबंध की सजा क्या प्रियभांषु रंजन को मिलेगी।
mobile ---- 09968997060
प्रेमी प्रियभांषु को सजा कौन दिलायेगा?
ऑनर किलिंग से बच सकती थी महिला पत्रकार निरूपमा
विष्णुगुप्त
सिर्फ प्रियभांषु को मालूम था कि निरूपमा ऑनर किलिंग का ग्रास बनने जा रही है। क्या उसने निरूपमा की जान बचाने के लिए पुलिस और हाईकोर्ट में गुहार लगायी ? वह चुपचाप निरूपमा को ऑनर किलिंग के ग्रास में जाते देखता रहा। कब चिल्लाया? वह महिला आयोग और पत्रकार संगठनों का दरवाजा कब खट-खटकाया? मीडिया में अपनी खतरनाक प्रेम कहानी कब खोली? जब निरूपमा की हत्या हो चुकी थी। निरूपमा के परिजनों को सजा हो ही जायेगी पर निरूपमा की जान वापस आयेगी क्या? विवाह पूर्व असुरक्षित-खतरनाक यौन संबंध का ी दोषी है प्रियभांषु।
ऑनर किलिंग से महिला पत्रकार निरूपमा बच सकती थी। निरूपमा पाठक और प्रियभांषु रंजन की खतरनाक, असुरक्षित, लापरवाह और गैरजिम्मवार प्रेम कहानी के कई ऐसे पत्रडाव थे जहां पर दिल नहीं दिमाग और नैतिकता सक्रिय होती तो ऑनर किलिंग की नौबत आती नहीं या फिर ऑनर किलिंग के रास्ते अपनाने से पहले ही उसके परिजनों को कानून का पाठ पत्रढाया जा सकता था। परिजनों के चुंगुल से निरूपमा मुक्त ी हो सकती थी। खतरनाक, असुरक्षित, लापरवाह, गैरजिम्मेदार और नैतिकहीन प्रेम कहानी की संज्ञा देने में यहां कोई पूर्वाग्रह नहीं है बल्कि यर्थाथ है, सच्चाई है। इस सच्चाई और यथार्थ में निरूपमा के प्रेमी पत्रकार प्रियभांषु ी कहीं न कहीं दोषी के रूप में खत्रडा है। हालांकि अ ी तक सच्चाई और यथार्थ के दृष्टिकोण से प्रेमी प्रिय ाषु रंजन ी दोषी है, मीडिया या अन्य चिंतक वर्ग ने ंिचंतन ही नहीं किया है। जबकि पूरे तथ्य इस प्रकरण में सूक्षमता और गहणता के साथ चिंतन की माग जरूर करता है। क्या महिला पत्रकार निरूपमा गर् वती नहीं थी। उसके गर् में एक-दो नहीं बल्कि चार माह से अधिक का शिशु पल रहा था। यह गर् जाहिरतौर पर असुरक्षित यौन संबध का परिणाम था। क्या नैतिकता शादी के पूर्व असुरक्षित यौन संबंध की इजाजत देती है?प्रियभांषु रंजन यह कहकर इस दोष से बच नहीं सकते हैं कि वह अज्ञानी था, मजदूर या अन्य अशिक्षित वर्ग का प्रतिनिधित्व करता था। प्रियभांषु रंजन देश का सबसे बत्रडी समाचार एजेन्सी में पत्रकार है। इसलिए वह समाज का सबसे बत्रडा जागरूक वर्ग से जुत्रडा हुआ है। रेडियो, टेलीविजन और अखबारों में असुरक्षित यौन संबंधों से संबंधित विज्ञापन और उसके परिणामों की चेतावनी सालों-साल से जारी है। यहां तक कि दीवार और होल्डिंगों पर ी ी यह चेतावनी नियमित प्रसारित होती है,अंकित होती है। क्या ऐसे विज्ञापन और चेतावनी एक पत्रकार के लिए कोई मायने नहीं रख्ता है तब हम समाज के अन्य कम जागरूक वर्ग से उम्मीद क्या कर सकते हैं? चार माह के गर् के बाद ी शादी का विकल्प क्यों नहीं चुना गया। यह कह देने मात्र से कि वह दोष से बरी नहीं हो सकता है कि निरूपमा के परिजन तैयार नहीं थे। कोर्ट मैरेज का विकल्प क्यो नहीं चुना गया। निरूपमा की जान खतरे में थी और वह धीरे-धीरे ऑनरकिलिंग की परिस्थितियों से धिर रही थी तब पुलिस और न्यायालय सहित मीडिया संस्थानों की सहायता क्यों नहीं ली गयी। पुलिस, न्यायालय और मीडिया संस्थानों के हस्तक्षेप से ऑनर किलिंग से निरूपमा बच सकती थी और वापस दिल्ली आ सकती थी।
निरूपमा अब इस दुनिया में नहीं है। इसलिए उसके प्रति प्रियभांषु कितना समर्पित था और ईमानादार था, इसे भी शक की निगाह से देखी जानी चाहिए। कही प्रियभांषु निरूपमा के साथ दोहरा खेल तो नहीं खेल रहा था। मोहरे से मोहरे लडाने में तो वह नहीं लगा था। निरूपमा के गर् को वह उसके घर वालों के माध्यम से ही निपटाना चाहता था क्या? क्योंकि गर् का प्रश्न हल हो जाने के बाद प्रियभांषु शादी के झमेले में पडने से ी बच सकता था। अगर ऐसी धारणा सही हो सकती है तो निरूपमा अपने परिजनों के साथ ही साथ अपने प्रेमी प्रियभांषु की भी साजिश का शिकार हुई है?
सिर्फ प्रियभांषु को मालूम था कि निरूपमा ऑनर किलिंग का ग्रास बनने जा रही है। क्या उसने निरूपमा की जान बचाने के लिए पुलिस और हाईकोर्ट में गुहार लगायी ? वह चुपचाप निरूपमा को ऑनर किलिंग के ग्रास में जाते देखता रहा। प्रियभांषु कब चिल्लाया? वह महिला आयोग और पत्रकार संगठनों का दरवाजा कब खट-खटकाया? मीडिया में अपनी खतरनाक प्रेम कहानी कब खोली? जब निरूपमा की हत्या हो चुकी थी। निरूपमा के परिजनों को सजा हो ही जायेगी पर निरूपमा की जान वापस आयेगी क्या? विवाह पूर्व असुरक्षित-खतरनाक यौन संबंध का ी दोषी है प्रियभांषु।
प्रेमी प्रियभांषु रंजन पर एक और गं ीर लापरवाही सामने आती है। प्रियभांषु के शब्दों में निरूपमा पाठक के परिजन किसी ी परिस्थिति में शादी नहीं होने देने के लिए कटिबद्ध थे। इसके लिए निरूपमा के परिजन प्यार, लोकलाज से लेकर इज्जत का ी हवाला देकर निरूपमा को प्रियभांषु से अलग करने की कोशिश हुई थी। निरूपमा पर उसके परिजनों ने कठोरता ी बरती थी।प्रियभांषु रंजन की ये स ी बातें सही हैं। ऐसी प्रक्रिया चली होगी। ऑनर किलिंग से पहले निरूपमा के परिजन ये स ी हथकंडे जरूर अपनाये होंगे। जो परिवार और जो घराना ऑनर किलिंग कर सकता है वह परिवार और घराना उसके पहले अपनी इज्जत का हवाला देकर कुछ ी कर सकता है। पिता द्वारा निरूपमा पाठक को लिखी गयी चिट्ठी ी इसकी गवाही देती है। यह सब यहां यह जताने के लिए तथ्य और ऑनर किलिंग की स्थितियां बतायी जा रही है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि निरूपमा खतरे से घिरी हुई थी। खतरा उसके परिजनों से ही था। यह ी ज्ञात हुआ है कि वह कई महीनों से घर नहीं गयी थी। इस खतरे को देखते हुए ी निरूपमा अपने मां-पिता से मिलने झारखंड की कोडरमा शहर अपने घर गयी और जाने दिया गया। आम समझ यह है कि जब निरूपमा पर खतरा था वह ी ऑनर किलिंग की स्थितियां उत्पन्न होने या फिर उसके ग्रास बनाये जाने की तब निरूपमा को दिल्ली से कडोरमा जाने ही क्यों दिया गया। तर्क यह दिया जा रहा है कि उसकी मां ने अपनी बीमारी की झूठी खबर देकर बुलायी थी। यह तो पहले से ही स्पष्ट था कि उसके परिजन किसी ी खतरनाक और लोमहर्षक प्रक्रिया को अपना सकते हैं। ऐसी स्थिति में प्रिय ांषु रंजन को निरूपमा को कोडरमा जाने से रोकना चाहिए था। यह ी स्पष्ट हुआ है कि निरूपमा के प्रिय ाषु के साथ प्यार और शादी के लिए जिद करने की जानकारी परिजनों को थी पर वह चार महीने की गर् वती थी यह जानकारी निरूपमा के घर आने पर ही उसके परिजनो को हुई होगी। गांवों और कस्बायी महिलाओं को एक-दो दिन के गर् के लकक्षण ी पता चल जाता है। वह तो चार माह की गर् वती थी।
निरूपमा ऑनर किलिंग की ग्रास बनने की ओर अग्रसर हो रही है। ऐसी जानकारियां निरूपमा अपने प्रेमी प्रियभांषु रंजन को देती रही थी। एसएमएस और मोबाइल कॉल के द्वारा। टेलीविजनों और प्रिंट मीडिया में ी निरूपमा द्वारा प्रिय ांषु रंजन को ेजे गये एसएमएस दिखाया गया। एसएमएस में निरूपमा लिखती है कि कोई एक्सटीम एक्शन मत लेना। यानी निरूपमा को अपनी हत्या की आशंका ही नहीं बल्कि पूरा विश्वास हो गया था। वह जान रही थी कि अब उसका बचना मुश्किल है। उसके ाई और ाई के दोस्त उस पर नजर रखे हुए थे। मां और पिता वापस दिल्ली आने देने के लिए किसी ी परिस्थिति में तैयार नहीं थे। जबकि निरूपमा दिल्ली आना चाहती थी और अपना कैरियर जारी रखना चाहती थी। ऐसी सूचना मिलने पर तत्काल उसे सहायता की जरूरत थी। पर निरूपमा को सहायता मिली नहीं। निरूपमा की जान खतरे में है यह जानकारी सिर्फ और सिर्फ प्रियभांषु रंजन को थी। प्रियभांषु ने निरूपमा को सुरक्षा दिलाने और उसकी जान बचाने की कोई कार्रवाई नहीं की। प्रियभांषु रंजन झा रंजनरखंड ओर कोडरमा पुलिस से निरूपमा की जान बचाने की गुहार लगा सकता था। प्रत्रकार संगठनों को एक महिला पत्रकार की जान बचाने के लिए तत्काल मुहिम शुरू करने के लिए कह सकता था। इसके अलावा वह हाईकोर्ट जैसे जगह पर प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कर निरूपमा को उसके परिजनों के चंगुल से मुक्त कराने का सफलतम प्रयास कर सकता था। क्या प्रियभांषु ने निरूपमा की जान बचाने के लिए पुलिस और हाईकोर्ट में गुहार लगायी? वह चुपचाप निरूपमा को ऑनर किलिंग के ग्रास में जाते देखता रहा। ऐसा मानो उसका निरूपमा से कोई वास्ता ही नहीं था।
प्रियभांषु कब चिल्लाया? वह महिला आयोग और पत्रकार संगठनों का दरवाजा कब खट-खटकाया? मीडिया कब अपनी खतरनाक प्रेम कहानी कब खोली? जब निरूपमा की हत्या हो चुकी थी। जब निरूपमा इस दुनिया में रही नहीं। ऐसी मुहिम का अब निरूपमा के लिए क्या मतलब? निरूपमा के परिजनों को सजा हो ही जायेगी पर निरूपमा की जान वापस आयेगी क्या? यह लापरवाही प्रियभांषु जान कर की है या अनजाने में। इस तथ्य का पता लगाना मुश्किल है। पर उसने खतरनाक त्रढग से लापरवाही बरती ही है।
जब घर वाले शादी के लिए राजी नहीं थे तब दोनों के पास कोर्ट मैरेज का विकल्प खुला था। हमारे जैसे अनेक लोगों का इस प्रकरण में राय यही बनी है कि अगर प्रियभांषु ने निरूपमा के साथ कोर्ट मैरेज कर लिया होता तो शायद यह हत्या नहीं होती। दिल्ली में आकर हत्या करने के लिए निरूपमा के परिजन सौ बार सोचते। ज्यादा से ज्यादा परिजन निरूपमा से नाता तोत्रड लेते। कई ऐसे उदाहरण सामने हैं जिसमें परिजनों के खिलाफ जाकर कोर्ट मैरिज हुई है और परिजनों से सुरक्षा के लिए कोर्ट ी खत्रडा हुआ है। अंतरजातीय ही नहीं बल्कि अंतधार्मिक शादियां धत्रडडले के साथ हो रही हैं और न्यायालय-प्रशासन सुरक्षा कवज के रूप में खत्रडा है। यह एक संवैधानिक जिम्मेदारी ी है।निरूपमा और प्रियभांषु दोनो वर्किग पत्रकार थे। दोनों अपने पैरों पर खत्रडे थे। इसके बाद ी यह विकल्प नहीं चुना जाना हैरतअंग्रेज बात है। जबकि दोनों के बीच 2007 से ही असुरक्षित प्रेम संबंध थे।
ऑनर किलिंग जैसी धटनाओ के लिए ारतीय समाज की विंसगतियां जिम्मेवार रही है। जातीय आधारित ारतीय समाज आज ी अपने को बदलने के लिए तैयार नहीं है। निरूपमा प्रकरण अकेली घटना नहीं है। अ ी हाल ही में न्यायालय ने हरियाणा में ऑनर किलिंग पर कत्रडी सजा सुनायी है। निरूपमा के हत्यारे परिजनों को कत्रडी सजा मिलनी चाहिए। इसके लिए पत्रकार संगठनों की सक्रियता जरूरी है। पत्रकार संगठनों और मीडिया ने निरूपमा को न्याय दिलाने के लिए सुर्खियां पर सुर्खियां बना रही है। इसी का परिणाम हुआ कि निरूपमा की मां जेल के अंदर हुई और उसके अन्य परिजन ी जेल जाने की प्रक्रिया में खत्रडे है। निरूपमा प्रकरण से ऑनर किलिंग मानसिकता को सबक मिलना चाहिए। पर हमें लापरवाह, गैर जिम्मेदार, असुरक्षित-खतरनाक यौन संबंध पर ी गौर करना चाहिए। लापरवाह, गैर जिम्मेदार, असुरक्षित-खतरनाक यौन संबंधों की प्रेम कहानी ने निरूपमा को मौत के मुंह में धकेला है और इसके लिए उसके प्रेमी प्रियभांषु रंजन ी जिम्मेदार है। इस गैर जिम्मेदार, लापरवाह, असुरक्षित और खतरनाक यौन संबंध की सजा क्या प्रियभांषु रंजन को मिलेगी।
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Saturday, May 1, 2010
ललित मोदी क्यों बने बलि का बकरा?
ललित मोदी क्यों बने बलि का बकरा?
विष्णुगुप्त
सरकार की एजेंसियां अगर चाकचौबंद,निष्पक्ष-दबावहीन जांच करें तो बड़े-बडे राजनीतिज्ञ, अधिकारी और उझोगपतियो की जगह जेलों में होगी। ललित मोदी को आनन-फानन में इसलिए चलता किया गया ताकि काली और बेनामी संपतियों के उजागर होने से बचाया जा सके और बीसीसीआई के खिलाफ उठा राजनीतिक तूफान को शांत किया जा सके। बीसीसीआई ने एक तरह से देश में सामानंतर सत्ता व्यवस्था कायम कर रखी थी।यह भी छानबीन करना होगा कि फ्रैचायजी टीमों में लगी संपत्तियां कहीं राष्ट्रविरोधी तो नहीं हैं?े बीसीसीआई-आईपीएल का पूरा तंत्र अलोकतांत्रिक और फर्जीवाड़ा से जकड़ा हुआ है।
आईपीएल के कमिशनर ललित मोदी दोषी हैं या नहीं? उस स्थिति में जब ललित मोदी अपने बयानों मे बार-बार दोहरा रहे हैं कि अब तक जितने फैसले हुए हैं वे सभी सामूहिम जिम्मेदारी के तहत ही लिये गये हैं और आईपीएल गवर्निंग बोर्ड की स्वीकृति उनके पास है। ललित मोदी कितना सच बोल रहे है-कितना झूठ बोल रहे है? इस पर तत्काल कुछ भी कहना संभव नहीं है। पर सच यह है कि ललित मोदी को जिस तरह से आनन-फानन में निलम्बित किया गया उसके निहितार्थ गंभीर है और बीसीसीआई की नीयत पर प्रश्न चिन्ह खड़ा होता है। बीसीसीआर्इ्र न सिर्फ लीपापोती के माध्सम से उठा तूफान को शांत करने के फिराक में है बल्कि बड़े खेलबाजों को बचाने की नीतियां बुन रही है। यह जाहिर हो चुका है कि फ्रैचायजी टीमों के शेयरों में बड़े-बड़े घोटाले हुए हैं, बेनामी सम्पतियां लगी हुई है और वे सम्पतियां राष्ट्रविरोधी भी हो सकती है? बीसीसीआई से जुड़े अधिकारियों और नेताओं की भी ब्लैकमनी फ्रैचायजी टीमो में लगी हुई है। नेताओं और अध्किारियों के पजिजनों की पहले शेयरों से सबंधित इनकार की सफाई और उसके बाद चुप्पी साध लेने पर शक की सुई और नुकुली हुई है। बीसीसीआई अब तक क्रिकेट के विकास के नाम पर आयकर, सर्विस टैक्स सहित अन्य करो का लाभ उठाता रहा है। क्रिकेट के विकास के नाम पर बीसीसीआई के खेलबाज अपनी-अपनी झोलियां ही भरी हैं। क्रिकेट गुलामीकाल की देन है और देशी खेलों के विकास पर कील। सरकार के पास अवसर है। सरकार बीसीसीआई की पूरी अनियमिताएं और फर्जीबाड़ा को सामने लाये और देश के कानूनो के घेरे में बीसीसीआई-आईपीएल की पूरी सक्रियता रहे। सरकार की एजेसिंया बड़े खेलबाजो की गर्दन मरोड़ सकेंगी? असली सवाल यही है?
बीसीसीआई-आईपीएल को सामानंतर सत्ता व्यवस्था बनाने की पूरी छूट मिली ही क्यों? क्या यूपीए-मनमोहन सिंह सरकार ने बीसीसीआई-आईपीएल को देश के कानूनाों से खेलने और राष्ट्रवाद की भावना को दफन बरने की छूट नहीं दी थी। क्या बीसीसीआई-आईपीएल ने देश में एक तरह से सामानंतर सत्ता व्यवस्था कायम नहीं कर रखी थी। बीसीसीआई ने यह नहीं कहा था कि खिलाड़ी भारत के लिए नही बल्कि बीसीसीआई के लिए खेलते है? क्या पिछले लोकसभा चुनावों के दौरान भारत सरकार के सुरक्षा मुहैया कराने पर मना करने पर आईपीएल-2 को दक्षिण अफ्रीका नहीं ले जाया गया था। आईपीएल-2 को दक्षिण अफ्रीका ले जाने का अर्थ भारत सरकार को आईना दिखाना था। यह भी अहसास करना था कि हम भारत सरकार के दया पर निर्भर नहीं है। सार्वजनिक जगहो पर धूम्रपान करना मना है। इसके अलावा सार्वजनिक जगहों पर अश्लीलता फैलना भी कानूनी तौर पर अपराध है। आईपीएल मैचों के दौरान स्टेडियमो में खुलकर शराब बेची गयी। चीयर्स रीडरों ने अश्लीलता आधारित कानूनों को धजियां उड़ाने की कोई कसर नहीं छोड़ी। स्टेडियमों में सरेआम शराब परोसने और चीयर्स रीडरों के अश्लील नाच से देश भर में आक्रोश पनपा था। पर बीसीसीआई-आईपीएल ने भारतीय कानूनों की धजियां उड़ाने से बाज नहीं आयी और न ही सरकार ने बीसीसीआई-आईपीएल को ऐसा करने से रोका। ऐसे में बीसीसीआई-आईपीएल को ममनर्जी फैलाने और अराजक होने में प्रोत्साहन ही मिला।
बीसीसीआई और आईपीएल का पूरा तंत्र अलोकतांत्रिक और फर्जी बाड़ा पर निर्भर है। आईपीएल चैयरमैन ललित मोदी का निलंबन का प्रश्न भी कम गंभीर नहीं है? जाहिरतौर पर ललित मोदी पर पहले इस्तीफा देने का दबाव बनाया गया। ललित मोदी के इस्तीफा नहीं देने पर सीधेतौर पर उन्हें निलम्बित कर दिया गया। जबकि ललित मोदी को निलम्बन के पहले नोटिस दिया जाना चाहिए था। नोटिस दिया नहीं गया। खुद ललित मोदी ने अपने उपर अलिखित तौर पर उठाये गये आरोपों के जबाव के लिए पांच दिन का समय मांगा था। वे आईपीएल के गवर्निंग बोर्ड की बैठक में हिस्सा लेने के लिए तैयार थे। आईपीएल के चैयरमैन की हैसियत से ललित मोदी ने बैठक का एजेन्डा भी जारी कर दिया था। आधी रात में ही बिना कोई बैठक किये ही निलम्बन का ईमेल भेज दिया गया। अब यहां सवाल यह उठता है कि आईपीएल की गवर्निंग बोर्ड की बैठक में मोदी को हिस्सा लेने से क्यो रोका गया? बीसीसीआई और अन्य आईपीएल बोर्ड के सदस्यों की परेशानी क्या थी। जबकि फ्रैचायजी टीमें सीधे तौर पर मोदी के समर्थन में थी। जाहिरतौर पर मोदी अगर आईपीएल गवर्निंग बोर्ड की बैठक में होते तो अपने उपर लगे आरोपों का जवाब दे सकते थे और सबकी पोल खोल कर रख सकते थे। ऐसी स्थिति में बीसीसीआई की और बदनामी होती।
बीसीसीआई के अध्यक्ष शंशाक मनोहर का एक बयान काफी कुछ कह देता है। शंशाक मनोहर ने अपने एक बयान में कहा कि ललित मोदी ने शशि थरूर के शेयरों की बात उजागर कर गलती की है और आईपीएल के नियमों को तोड़ा है। शशि थरूर की अप्रत्यक्ष हिस्सेदारी की बात उजागर होने के बाद ही आईपीएल के खिलाफ देश की राजनीति में उफान उठा था और शथि थरूर को मंत्री पर गंवानी पड़ी थी। विदेश राज्य मंत्री जैसे जिम्मेवार पद पर रहने के बावजूद शशि थरूर द्वारा ललित मोदी पर दबाव डालना एक बड़ा अपराध था। अगर ललित मोदी चुप बैठ गये होते तो शायद आईपीएल के अंदर खाने में क्या कुछ हो रहा है यह बात भी सामने नहीं आती। शंशाक मनोहर के उक्त बयान का सीधा अर्थ यह है कि ललित मोदी ने शशि थरूर के कोच्चि टीम में अप्रत्यक्ष हिस्सेदारी का प्रश्न उठाकर बीसीसीआई को संकट में डाला है। इसलिए ललित मोदी दंड के अधिकारी हैं।
बीसीसीआई पर कब्जा किये लोगों पर आप एक नजर डाल लीजिये। शरद पवार जैसे राजनीतिज्ञ के कब्जे में पूरी तरह से बीसीसीआई है। शरद पवार ने अपनी राजनीतिक ताकत और फर्जीबाड़ा कर जगमोहन डालमिया से बीसीसीआई को कब्जे में लिया था। जगमोहन डालमियां ही वह शख्त थे जिन्होंने बीसीसीआई को मालोमाल किया। इतना ही नहीं बल्कि डालमिया ने क्र्रिकेट पर अग्रेजों के प्रभाव को महत्वहीन किया था। शरद पवार ने बीसीसीआई को अपने अनुसार जमकर नचाया और बाजारू बनाया। शरद पवार ने अपना टर्म पूरा होने पर बीसीसीआई को अपने लट्टु शंशाक मनोहर को सौंप दिया। शंशाक मनोहर पूरी तरह से शरद पवार के छत्रछाया में बीसीसीआई को संचालित कर रहे हैं। आईपीएल के गड़बड़ झाला में शरद पवार भी दूध को धोये हुए नहीं हैं। शरद पवार की बेटी सुप्रीया के पति पर आईपीएल की एक फ्रैचायजी टीम के शेयर होने के आरोप हैं। शरद पवार की पार्टी के मंत्री प्रफुल्ल पटेल पहले ही आईपीएल विवाद में फंस चुके हैं। प्रफुल्ल पटेल की बेटी पूर्णा पटेल ने अपने पिता के मंत्री पद का नाजायत लाभ उठाया है और अधिकारों का दुरूप्रयोग किया है।
ललित मोदी को आनन-फानन में इसलिए चलता किया गया ताकि बड़े खेलबाजों को बचाया जा सके। बड़े खेलबाज राजनीतिज्ञों, उघोगपतियों और अधिकारियों के कालेधन के उजागर होने से बचाया जा सके। शशि थरूर प्रकरण उठने के बाद आये राजनीतिक तूफान ने मनमोहन सरकार को घेरा। जन दबाव में आकर मनमोहन सिंह सरकार सक्रिय हुईं। सरकार की विभिन्न एजेसिंयों से जांच कराने की सक्रियता भी बढ़ी। आयकर विभाग, पर्वतन निदेशालय के साथ ही साथ गृह मंत्रालय की आईपीएल घोटाले की जांच कर रहा है। संसद में आईपीएल घपलेबाजी की पूरी तह खोलने की वायदा भी मनमोहन सरकार कर चुकी है। प्रारंभिक जांच में यह साबित हो चुका है कि आयकर की चोरी हुई है। सर्विस टैक्स सहित अन्य टैक्सों पर अनियमितता बरती गयी है। खिलाडियों के शर्तनामे भी विवादास्पद हैं। ललित मोदी के निलम्बन मात्र से मनमोहन सरकार को संतुष्ट नहीं होना चाहिए बल्कि बीसीसीआई और आईपीएल की फ्रैचायजी टीमों के बैनामी हिस्सेदारी और लगी ब्लैकमनी को उजागर करना चाहिए। यह भी छानबीन करना होगा कि फ्रैचायजी टीमों में लगी संपत्तियां कहीं राष्ट्रविरोधी तो नहीं हैं?े
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विष्णुगुप्त
सरकार की एजेंसियां अगर चाकचौबंद,निष्पक्ष-दबावहीन जांच करें तो बड़े-बडे राजनीतिज्ञ, अधिकारी और उझोगपतियो की जगह जेलों में होगी। ललित मोदी को आनन-फानन में इसलिए चलता किया गया ताकि काली और बेनामी संपतियों के उजागर होने से बचाया जा सके और बीसीसीआई के खिलाफ उठा राजनीतिक तूफान को शांत किया जा सके। बीसीसीआई ने एक तरह से देश में सामानंतर सत्ता व्यवस्था कायम कर रखी थी।यह भी छानबीन करना होगा कि फ्रैचायजी टीमों में लगी संपत्तियां कहीं राष्ट्रविरोधी तो नहीं हैं?े बीसीसीआई-आईपीएल का पूरा तंत्र अलोकतांत्रिक और फर्जीवाड़ा से जकड़ा हुआ है।
आईपीएल के कमिशनर ललित मोदी दोषी हैं या नहीं? उस स्थिति में जब ललित मोदी अपने बयानों मे बार-बार दोहरा रहे हैं कि अब तक जितने फैसले हुए हैं वे सभी सामूहिम जिम्मेदारी के तहत ही लिये गये हैं और आईपीएल गवर्निंग बोर्ड की स्वीकृति उनके पास है। ललित मोदी कितना सच बोल रहे है-कितना झूठ बोल रहे है? इस पर तत्काल कुछ भी कहना संभव नहीं है। पर सच यह है कि ललित मोदी को जिस तरह से आनन-फानन में निलम्बित किया गया उसके निहितार्थ गंभीर है और बीसीसीआई की नीयत पर प्रश्न चिन्ह खड़ा होता है। बीसीसीआर्इ्र न सिर्फ लीपापोती के माध्सम से उठा तूफान को शांत करने के फिराक में है बल्कि बड़े खेलबाजों को बचाने की नीतियां बुन रही है। यह जाहिर हो चुका है कि फ्रैचायजी टीमों के शेयरों में बड़े-बड़े घोटाले हुए हैं, बेनामी सम्पतियां लगी हुई है और वे सम्पतियां राष्ट्रविरोधी भी हो सकती है? बीसीसीआई से जुड़े अधिकारियों और नेताओं की भी ब्लैकमनी फ्रैचायजी टीमो में लगी हुई है। नेताओं और अध्किारियों के पजिजनों की पहले शेयरों से सबंधित इनकार की सफाई और उसके बाद चुप्पी साध लेने पर शक की सुई और नुकुली हुई है। बीसीसीआई अब तक क्रिकेट के विकास के नाम पर आयकर, सर्विस टैक्स सहित अन्य करो का लाभ उठाता रहा है। क्रिकेट के विकास के नाम पर बीसीसीआई के खेलबाज अपनी-अपनी झोलियां ही भरी हैं। क्रिकेट गुलामीकाल की देन है और देशी खेलों के विकास पर कील। सरकार के पास अवसर है। सरकार बीसीसीआई की पूरी अनियमिताएं और फर्जीबाड़ा को सामने लाये और देश के कानूनो के घेरे में बीसीसीआई-आईपीएल की पूरी सक्रियता रहे। सरकार की एजेसिंया बड़े खेलबाजो की गर्दन मरोड़ सकेंगी? असली सवाल यही है?
बीसीसीआई-आईपीएल को सामानंतर सत्ता व्यवस्था बनाने की पूरी छूट मिली ही क्यों? क्या यूपीए-मनमोहन सिंह सरकार ने बीसीसीआई-आईपीएल को देश के कानूनाों से खेलने और राष्ट्रवाद की भावना को दफन बरने की छूट नहीं दी थी। क्या बीसीसीआई-आईपीएल ने देश में एक तरह से सामानंतर सत्ता व्यवस्था कायम नहीं कर रखी थी। बीसीसीआई ने यह नहीं कहा था कि खिलाड़ी भारत के लिए नही बल्कि बीसीसीआई के लिए खेलते है? क्या पिछले लोकसभा चुनावों के दौरान भारत सरकार के सुरक्षा मुहैया कराने पर मना करने पर आईपीएल-2 को दक्षिण अफ्रीका नहीं ले जाया गया था। आईपीएल-2 को दक्षिण अफ्रीका ले जाने का अर्थ भारत सरकार को आईना दिखाना था। यह भी अहसास करना था कि हम भारत सरकार के दया पर निर्भर नहीं है। सार्वजनिक जगहो पर धूम्रपान करना मना है। इसके अलावा सार्वजनिक जगहों पर अश्लीलता फैलना भी कानूनी तौर पर अपराध है। आईपीएल मैचों के दौरान स्टेडियमो में खुलकर शराब बेची गयी। चीयर्स रीडरों ने अश्लीलता आधारित कानूनों को धजियां उड़ाने की कोई कसर नहीं छोड़ी। स्टेडियमों में सरेआम शराब परोसने और चीयर्स रीडरों के अश्लील नाच से देश भर में आक्रोश पनपा था। पर बीसीसीआई-आईपीएल ने भारतीय कानूनों की धजियां उड़ाने से बाज नहीं आयी और न ही सरकार ने बीसीसीआई-आईपीएल को ऐसा करने से रोका। ऐसे में बीसीसीआई-आईपीएल को ममनर्जी फैलाने और अराजक होने में प्रोत्साहन ही मिला।
बीसीसीआई और आईपीएल का पूरा तंत्र अलोकतांत्रिक और फर्जी बाड़ा पर निर्भर है। आईपीएल चैयरमैन ललित मोदी का निलंबन का प्रश्न भी कम गंभीर नहीं है? जाहिरतौर पर ललित मोदी पर पहले इस्तीफा देने का दबाव बनाया गया। ललित मोदी के इस्तीफा नहीं देने पर सीधेतौर पर उन्हें निलम्बित कर दिया गया। जबकि ललित मोदी को निलम्बन के पहले नोटिस दिया जाना चाहिए था। नोटिस दिया नहीं गया। खुद ललित मोदी ने अपने उपर अलिखित तौर पर उठाये गये आरोपों के जबाव के लिए पांच दिन का समय मांगा था। वे आईपीएल के गवर्निंग बोर्ड की बैठक में हिस्सा लेने के लिए तैयार थे। आईपीएल के चैयरमैन की हैसियत से ललित मोदी ने बैठक का एजेन्डा भी जारी कर दिया था। आधी रात में ही बिना कोई बैठक किये ही निलम्बन का ईमेल भेज दिया गया। अब यहां सवाल यह उठता है कि आईपीएल की गवर्निंग बोर्ड की बैठक में मोदी को हिस्सा लेने से क्यो रोका गया? बीसीसीआई और अन्य आईपीएल बोर्ड के सदस्यों की परेशानी क्या थी। जबकि फ्रैचायजी टीमें सीधे तौर पर मोदी के समर्थन में थी। जाहिरतौर पर मोदी अगर आईपीएल गवर्निंग बोर्ड की बैठक में होते तो अपने उपर लगे आरोपों का जवाब दे सकते थे और सबकी पोल खोल कर रख सकते थे। ऐसी स्थिति में बीसीसीआई की और बदनामी होती।
बीसीसीआई के अध्यक्ष शंशाक मनोहर का एक बयान काफी कुछ कह देता है। शंशाक मनोहर ने अपने एक बयान में कहा कि ललित मोदी ने शशि थरूर के शेयरों की बात उजागर कर गलती की है और आईपीएल के नियमों को तोड़ा है। शशि थरूर की अप्रत्यक्ष हिस्सेदारी की बात उजागर होने के बाद ही आईपीएल के खिलाफ देश की राजनीति में उफान उठा था और शथि थरूर को मंत्री पर गंवानी पड़ी थी। विदेश राज्य मंत्री जैसे जिम्मेवार पद पर रहने के बावजूद शशि थरूर द्वारा ललित मोदी पर दबाव डालना एक बड़ा अपराध था। अगर ललित मोदी चुप बैठ गये होते तो शायद आईपीएल के अंदर खाने में क्या कुछ हो रहा है यह बात भी सामने नहीं आती। शंशाक मनोहर के उक्त बयान का सीधा अर्थ यह है कि ललित मोदी ने शशि थरूर के कोच्चि टीम में अप्रत्यक्ष हिस्सेदारी का प्रश्न उठाकर बीसीसीआई को संकट में डाला है। इसलिए ललित मोदी दंड के अधिकारी हैं।
बीसीसीआई पर कब्जा किये लोगों पर आप एक नजर डाल लीजिये। शरद पवार जैसे राजनीतिज्ञ के कब्जे में पूरी तरह से बीसीसीआई है। शरद पवार ने अपनी राजनीतिक ताकत और फर्जीबाड़ा कर जगमोहन डालमिया से बीसीसीआई को कब्जे में लिया था। जगमोहन डालमियां ही वह शख्त थे जिन्होंने बीसीसीआई को मालोमाल किया। इतना ही नहीं बल्कि डालमिया ने क्र्रिकेट पर अग्रेजों के प्रभाव को महत्वहीन किया था। शरद पवार ने बीसीसीआई को अपने अनुसार जमकर नचाया और बाजारू बनाया। शरद पवार ने अपना टर्म पूरा होने पर बीसीसीआई को अपने लट्टु शंशाक मनोहर को सौंप दिया। शंशाक मनोहर पूरी तरह से शरद पवार के छत्रछाया में बीसीसीआई को संचालित कर रहे हैं। आईपीएल के गड़बड़ झाला में शरद पवार भी दूध को धोये हुए नहीं हैं। शरद पवार की बेटी सुप्रीया के पति पर आईपीएल की एक फ्रैचायजी टीम के शेयर होने के आरोप हैं। शरद पवार की पार्टी के मंत्री प्रफुल्ल पटेल पहले ही आईपीएल विवाद में फंस चुके हैं। प्रफुल्ल पटेल की बेटी पूर्णा पटेल ने अपने पिता के मंत्री पद का नाजायत लाभ उठाया है और अधिकारों का दुरूप्रयोग किया है।
ललित मोदी को आनन-फानन में इसलिए चलता किया गया ताकि बड़े खेलबाजों को बचाया जा सके। बड़े खेलबाज राजनीतिज्ञों, उघोगपतियों और अधिकारियों के कालेधन के उजागर होने से बचाया जा सके। शशि थरूर प्रकरण उठने के बाद आये राजनीतिक तूफान ने मनमोहन सरकार को घेरा। जन दबाव में आकर मनमोहन सिंह सरकार सक्रिय हुईं। सरकार की विभिन्न एजेसिंयों से जांच कराने की सक्रियता भी बढ़ी। आयकर विभाग, पर्वतन निदेशालय के साथ ही साथ गृह मंत्रालय की आईपीएल घोटाले की जांच कर रहा है। संसद में आईपीएल घपलेबाजी की पूरी तह खोलने की वायदा भी मनमोहन सरकार कर चुकी है। प्रारंभिक जांच में यह साबित हो चुका है कि आयकर की चोरी हुई है। सर्विस टैक्स सहित अन्य टैक्सों पर अनियमितता बरती गयी है। खिलाडियों के शर्तनामे भी विवादास्पद हैं। ललित मोदी के निलम्बन मात्र से मनमोहन सरकार को संतुष्ट नहीं होना चाहिए बल्कि बीसीसीआई और आईपीएल की फ्रैचायजी टीमों के बैनामी हिस्सेदारी और लगी ब्लैकमनी को उजागर करना चाहिए। यह भी छानबीन करना होगा कि फ्रैचायजी टीमों में लगी संपत्तियां कहीं राष्ट्रविरोधी तो नहीं हैं?े
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