Wednesday, February 10, 2010

महाराष्ट के गृह राज्य मंत्री रमेश द्वारा राहुल गांधी की चप्पल ढोना

राष्ट्र-चिंतन




महाराष्ट के गृह राज्य मंत्री रमेश द्वारा राहुल गांधी की चप्पल ढोना

कांग्रेसियो, शर्म करो, लोकतंत्र को चमचागीरी का पर्याय मत बनाओ

नारायण दत्त तिवारी और शंकर राव चव्हान भी संजय गांधी  की चप्पल ढोये थे।

विष्णुगुप्त



                                                 महाराष्ट के गृहराज्य मंत्री द्वारा राहुल गांधी की चप्पल ढोने की यह  अकेली घटना नहीं हैं। इसके पहले उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी और वर्तमान में महाराष्ट के मुख्यमंत्री अशोक चव्हान के पिता और तत्कालीन मुख्यमंत्री शंकर राव चव्हान ने संजय गांधी के चप्पल ढोये थे। तब संजय गांधी की कांग्रेस की राजनीति में तूती बोलती थी और राजनीति सोपान तय करने का एक मात्र रास्ता संजय गांधी की कृपा होती थी। सोनिया गांधी और राहुल गांधी भी पूरी तरह से चाटूकारों और चमचों की टोली से घिरे हुए हैं और गृहराज्य मंत्री रमेश जैसे चाटूकार इन्हें पंसद भी हैं।
                                                     ‘भारतीय राष्टीय कांग्रेस पार्टी‘ के विघटन की इच्छा महात्मा गांधी की थी। उनके पास कांग्रेस के विघटन के तर्क थे और दूरदृष्टि भी थी। इसलिए कि कांग्रेस के पास आजादी की धरोहर थी। कांग्रेस का मुख्य लक्ष्य आजादी था। 1947 में आजादी मिलने के बाद कांग्रेस का मुख्य लक्ष्य की प्राप्ति भी हो गयी थी। महात्मा गांधी ने यह महसूस किया था कि ‘कांग्रेस‘ के पास आजादी के इस धरोहर के साथ खिलवाड़ और नैतिकता के साथ ही साथ जनविरोधी राजनीति का पर्याय बनाया जा सकता है। इसलिए कांग्रेस का विघटन जरूरी है। महात्मा गांधी के इस इच्छा का समान न हुआ और जवाहर लाल नेहरू ने कांग्रेस को अपने परिवारिक सत्ता उत्थान का मोहरा बना दिया। आज कांग्रेस के अंदर घटने वाली धटनाएं यह कहने और बताने के लिए तत्पर हैं कि महात्ता गांधी की वह इच्छा कितनी सटीक और दूरदृष्टि से परिपूर्ण थी। राहुल गांधी के मुबंई दौरे के दौरान जिस तरह की नैतिकता का पतन और चाटूकारिता की अथाह गर्त मे गिरने की राजनीतिक पारिपार्टी-अपसंस्कृति देखी गयी, उससे भारतीय लोकतंत्र की जड़ें न तो मजबूत हो सकती है और न ही प्रेरणादायक हो सकती है। महाराष्ट के गृहराज्य मंत्री रमेश ने राहुल गांधी का न केवल चप्पल उठाया बल्कि चप्पल उठाकर चलते भी देखे गये। गृहराज्य मंत्री की इस चाटूकारिता पर राहुल गांधी को भी कोई कोप नहंी हुआ बल्कि राहुल गांधी अपना कुटिल मुस्कान बिखरते हुए मुकभाव से प्रंससित भी थे। जबकि राहुल गांधी बार-बार यह कहते हुए नहीं थकते हैं कि कांग्रेस में अब चाटूकारिता नहीं चलेगी, पंहुच भी नहीं चलेगी। जन से जुड़े हुए राजनीतिज्ञ ही कांग्रेस में सौपान लांघेंगे। क्या गृह राज्यमंत्री जैसे पद पर बैठे शख्सियत द्वारा चप्पल उठा कर चलना चाटूकारिता नहीं है? लोकतंत्र को शर्मशार करनेवाली ऐसी घटनाएं कांग्रेस का सिर्फ अंदरूणी चाटूकारिता की संस्कृति मानकर खारिज कर दिया जाना चाहिए? कदापि नहीं । इसलिए कि कांग्रेस के साथ आजादी की धरोहर जुड़ी हुई है।
                                   चाटूकारिता और अनैतिकता कांग्रेस की खून में रची-बसी हुई है और उसकी राजनीतिक धमनियों में यह सब अनवरत बहती रहती है। चाटूकारिता और अनैतिकता की पौबारह बहाने का जिम्मेदार जवाहर लाल नेहरू थे। कांग्रेस में उन्होंने आजादी की धरोहर से जुड़े हुए राजनीति की धाराएं रोंकी और इसकी जगह चाटूकार और अनैतिकता से भरी हुई राजनीतिक शख्सियतों को स्थापित कराया। नेहरू ने चन्द्रभाणू गुप्त,विधानचंद्र राय, मोरार जी देशाई जैसे अनेकों आजादी की शख्सियतों को हासिये पर खदेड़ा। संसद और राज्य विधान सभाओं के साथ ही साथ सरकारों पर नेहरू की जाति ब्राम्हणों का आधिपत्य हुआ। परिवारवाद का वृक्षारोपण हुआ। इसका उदाहरण था नेहरू द्वारा अपनी पुत्री इंदिरा गांधी को अपना उतराधिकारी घोषित करना और कांग्रेस की अध्यक्ष पद पर बैठाना। उस समय इंदिरा गांधी की राजनीतिक कमाई इतनी भर थी कि वह जवाहर लाल नेहरू की पुत्री थी। कांग्रेस की अध्यक्ष के रूप में इंदिरा गांधी ने वरिष्ठ और नैतिकता वाले कांग्रेसियों को बाहर करने में कोई कंजूसी नहीं बरती। लाल बहादुर शास्त्री की असमय मृत्यु के बाद प्रधानमंत्री पद पर जा बैठी। अपने मनपंसद उम्मीदवार को राष्टपति का उम्मीदवार नहीं बनाये जाने पर इंदिरा गांधी ने अपनी पार्टी के राष्टपति पद के उम्मीदवार नीलम संजीवा रेड्डी को परास्त कराया और निर्दलीय बीबी गिरी को राष्टपति बनाया। लोकतंत्र में ऐसा उदाहरण और नहीं मिलेगा जिसमें प्रधानमंत्री खुद अपने दल द्वारा घोषित राष्टपति के उम्मीदवार को पराजित कराने की राजनीतिक चाल चली हो।
                    इंदिरा गांधी को जमीर और जनाधार वालेे राजनीतिज्ञों से चीड थी। इसलिए उन्होंने भारतीय राजनीति में चाटूकारिता और अनैतिकता से भरी शख्सियतों की धारा बहायी। देवकांत बरूआ की चाटूकारिता भारतीय राजनीति में हमेशा चर्चित रही है। देवकांत बरूआ ने इंदिरा गांधी की चमचागिरी में कहा था कि ‘इंदिरा इज ए इंडिया-इंडिया इज ए इंडिया ‘। इंदिरा गांधी के मुंह से निकलने वाला हर शब्द को सिरोधार्य माना जाने लगा। इंदिरा गंाधी ने केवल राजनीति में ही मोहरे बैठाये बल्कि संवैधानिक संस्थाओं में भी चाटूकारिता और अनैतिकता वाली शख्यितों को बैठाया। इसका परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस पूरी तरह से चाटूकारों के चंगुल में फंस गयी। विरोध प्रकट करने और लोकतंत्र की धारा रूक गयी। इंदिरा गंाधी निरंकुश हो गयी। 1971 में बांग्लादेश में हुई जीत ने इंिदरा गांधी की निरंकुशता और बढ़ गयी। चारो तरफ गुणगाण करने वालों की भीड़ लग गयी। ऐसी स्थिति बड़ी सी बड़ी राजनीतिक शख्सियत को भी सोचने-समझने की शक्ति समाप्त कर देती है। इंदिरा गाधी की आपातकाल इसी दृष्टिकोण का परिणाम था। आपातकाल ने हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर कैसी संकट खंडी थी, यह भी जगजाहिर है।
                           चप्पल उठाने और चाटूकारिता का नायाब नमूना पेश करने की यह न तो पहली घटना है और न ही आखिरी घटना के तौर पर देखी जानी चाहिए। कांग्रेस की राजनीति में ऐसी घटना पहले भी घटी थी और भविष्य में यह चमचागिरी रूकने वाली नहीं है। पूर्व में घटी घटनाएं और भी सवाल उठाती हैं। राहुल गांधी के चाचा और इंदिरा गाधी के सुपुत्र संजय गांधी की चप्पल उठाने वाले दो तत्कालीन मुख्यमंत्रियों के किस्से आज भी भारतीय राजनीति मे आम है। लखनउ में तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी और मुबंई में महाराष्ट के तत्कालीन मुख्यमंत्री शंकर राव चव्हान ने संजय गांधी के चप्पटल ढोये थे। शंकर राव चव्हान महाराष्ट के वर्तमान मुख्यमंत्री अशोक चव्हान के पिता थे। उस समय संजय गांधी की तूती बोलती थी और पूरी कांग्रेस संजय गांधी के सामने नतमस्तक थी और राजनीतिक सौपान हासिल करने का एकमात्र माध्यम संजय गांधी की कृपा थी। शंकर राव चव्हान तो अब जिंदा नहीं हैं पर नारायण दत्त तिवारी जिंदा हैं। हाल ही में नारायण दत्त तिवारी ने आंध प्रदेश के राज्यपाल के रूप में अनैतिकता की कैसी परिभाषा गढ़ी हैं यह भी जगजाहिर है। सोनिया गंाधी भी यह दावा नहीं कर सकती है कि उसकी टीम में चाटूकारों और चमचों की भीड़ नहीं है।
                     राहुल गांधी का दोहरा चरित्र देख लिया जाना चाहिए? एक बार नहीं बार-बार राहुल गांधी यह कहते नहीं थकते कि कांग्रेस मेें दलाल संस्कृति नहीं चलेगी? चाटूकारिता के दिन लद गये। जन से जुड़े कार्यकर्ता ही कांग्रेस में आगे बढ़ेंगे। यह सुवचन सुनने मे अच्छा तो लग सकता है लेकिन असली सवाल अमल का है। सुवचन पर अमल भी तो होना चाहिए। राहुल गांधी का चप्पल जब महाराष्ट का गृहराज्य मंत्री रमेश चल रहा था तब राहुल इस पर उक्त गृहराज्य मंत्री टोकने या चाटूकारिता से बाज आने की पाठ पढ़ाने की जगह कुटिल मुस्कान बिखेर रहे थे। कांगेस के अंदर जन से जुड़े कार्यकर्ताओं की ऐसी संस्कृति में आगे बढ़ाने की कहीं से उम्मीद भी बचती है क्या?
                               क्या इसे कांग्रेस का अदंरूणी अपसंस्कृति और चाटूकारिता मानकर नजरअंदाज किया जाना चाहिए? क्या इस तरह संस्कृति से लोकतांत्रिक व्यवस्था के मान्य परमपराओं और सिद्धांतों के साथ खिलवाड़ नहीं हो रहा है? कांग्रेस अपने आप को आजादी की लड़ाई से जोड़ती है। आजादी की लड़ाई को अपनी विरासत मानती है। इसलिए आजादी की लड़ाई लड़ने वाले वीरों की भावनाएं कांग्रेस के साथ जुड़ी हुई है। आज हजारो आजादी के वीर जिंदा हैं जिन्हें यह दृश्य देखकर कितना आक्रोश आता होगा? क्या इसका भान कांग्रेस को है। कांग्रेस आज देश की सत्ता पर काबिज है, इसलिए लोकतंत्र की परमपराओ को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी भी कांग्रेस के उपर हैं। पिछले कई चुनावों में मिल रही जीत ने कांग्रेस को निरकुंश बना दिया है। राजनीति में चाटूकारिता की बढ़ती संस्कृति खतरनाक है। इसे रोकना जरूरी है पर हम सोनिया गांधी या राहुल गांधी से उम्मीद भी तो नहीं कर सकते है?

सम्पर्क:
मोबाइल- 09968997060

4 comments:

  1. बेहद सुन्दर लेख , विष्णु गुप्त जी, इन गुलाम मानसिकता के चाटुकारों को सच का आइना दिखाती हुई !

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  2. खैर साबित तो पहले से ही है कि चमचे ही आगे बढते है कांग्रेस की राजनीति मैं.....पिछले राष्ट्रपति के चुनाव से पहले हमारी महामहिम राष्ट्रपति महोदया के बारे मैं भी कुछ ऐसा ही लिखा था ...वे आज राष्ट्रपति वनी बैठी हैं...जबकि हत्या करवाने जैसा आरोप होने के बाद राष्ट्रपति वनने मैं एक प्रमुख योग्यता ये भी थी कि इन्होंने वक्त जरूरत पर इंदिरा गांधी के रसोई मैं रोटियां भी बेली हैं.....कुछ लोग रोटियां बेलने से वो सब पा जाते हैं जो बहुत से लोग पापङ बेलने से भी नहीं पा सकते......और कृपया ये वर्ड वेरिफिकैशन हटवादें जिससे टिप्पणियां देने मैं आसानी रहेगी,......

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  3. उपरोक्त बातें इंडिया टूडे के एडीशन मैं लिखी थी

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