Wednesday, November 14, 2018


 

         राष्ट्र-चिंतन   
     
     जनता ने मतदान कर माओवादियों का सबक दिया
माओवाद देश का आईकॉन नहीं बन सकता
    
             विष्णुगुप्त

माओवाद को जनता ने नकार दिया। माओवादियों को कड़ा व सबककारी संदेश दिया गया है कि भारत में सत्ता माओत्से तुंग की बन्दूक की गोली के सिद्धांत से नहीं बल्कि मतदान से निकलती है। कहने का अर्थ है कि हमारी लोकतांत्रिक शक्ति और विचार की जीत हुई, विदेशी अवधारणा माओवाद की पराजय हुई जो अब चीन में भी विलुप्त हो गया है। छत्तीसगढ़ में माओवाद ग्रसित क्षेत्रों में माओवादियों के विरोध और धमकियों की बीच मतदान हुआ और मतदान में उत्साह के साथ जनता सक्रिय थी, मतदान का प्रतिशत भी ठीक-ठाक रहा। छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में माओवाद की कैसी हिंसा है, माओवाद की कैसी पकड़ है, यह कौन नहीं जानता है, माओवादी प्रभावित क्षेत्रों में पुलिस तक जाने से डरती है, अर्द्धसैनिक बलों पर हमले होते रहते हैं, विकास के सभी काम ठप पडे हुए हैं। माओवादियों के खिलाफ बोलने या फिर असहमति जताने वाले लोगों का रहना मुश्किल है, उन पर हिंसा बरपती है, माओवादियों की गोलियां उन पर चलती है। कुछ दिन पूर्व ही माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में लोकतंत्र के प्रति उत्साह को देखने-समझने गयी दूरदर्शन की टीम को माओवादियों ने कैसे निशाना बनाया था, दूरदर्शन के कैमरा मैन की किस प्रकार से हत्या हुई थी, यह भी जगजाहिर है। पत्रकारों को निशाना बनाने की हिंसा यह बताती है कि माओवाद कितना क्रूर, कितना हिंसक हैं, अगर ये पत्रकार तक की जान लेने में शर्मसार नहीं होते हैं तब ये आम जनता के साथ किस प्रकार से व्यवहार करते होंगे, आम जनता को किस प्रकार की हिंसा का ग्राह बनाते होंगे, इसकी कल्पना आसानी से की जा सकती है। 
      सबसे बडी बात यह है माओवादियों ने बडी-बडी सभाएं कर आम जनता को धमकियां पिलायी थी कि वोट करने वाले लोगों को सीधे गोलियां मिलेगी, इस क्षेत्र से खदेड़ दिया जायेगा। माओवादियों का इतिहास भी क्रूर है। पहले भी मतदान करने वाली जनता पर माओवादी कहर बन कर टूटते हैं। पर जनता के सामने अपने जनप्रतिनिधि चुनने की चुनौती थी,  निश्चित तौर पर जनता ने यह चुनौती स्वीकारी और मतदान के लिए कूद पडी। इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनप्रतिनिधि ही विकास और उन्नति के प्रतीक होते हैं, अगर आम जनता लोकतांत्रिक व्यवस्था से कट जाये तो फिर विकास और उन्नति को जनता कैसे हासिल कर सकती है। माओवाद कभी उन्नति और विकास का प्रतीक नहीं हो सकता है, माओवाद सिर्फ और सिर्फ तानाशाही और हिंसा के प्रतीक है।
मओवाद क्या भारतीय जनता का आईकॉन हो सकता है? माओवाद, मार्क्सवाद, लेनिनवाद, स्तालिनवाद आदि एक विदेशी मानसिकताएं जो दुनिया भर में निरर्थक, अप्रासंगिक हो गयी हैं। सोवियत संघ के पतन के बाद पूरी दुनिया से एक तरह से इन सभी वादों की विदाई हो चुकी है, गिन-चुने जिन राष्टों में ये सभी मानसिकताएं हैं तो पर इन मानसिकताओं के रूप-रंग बदले हुए हैं, इन सभी मानसिकताओं को पूंजी के प्रवाह से परहेज नहीं हैं, मजदूरवाद गौण हो चुका है, अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिए पूंजी को आवश्यक मान लिया गया है। आधुनिक दौर में जहां पर भी ऐसी मानसिकताओं का थोड़ा-बहुत अस्तित्व रहा है वहां पर खून-खराबा, तानाशाही और भूखमरी पसरी होती है, तानाशाही के प्रताड़ित और शोषित लोग अपने देश को छोड़कर पलायन करने के लिए मजबूर होते हैं। लैटिन अमेरिकी देश वेनेजुएला एक सशक्त और मजबूत अर्थव्यवस्था वाला देश था लेकिन 1999 में वहां पर हुगो चावेज नाम के एक व्यक्ति ने पूंजी के खिलाफ सत्ता पर बैठ गया। हुगो चावेज अमेरिका को समाप्त करने की कसमें खाता रहा। हुगो चावेज की इस सनकी भरी नीति पर दुनिया भर के कम्युनिस्ट तालियां बजाते थे और कहते थे कि दुनिया में माओवाद, मार्क्सवाद, लेनिनवाद, स्तालिनवाद की वापसी हो रहा है। दुष्परिणाम क्या हुआ? दुष्परिणाम बहुत ही दर्दनाक और भयानक हो गया। वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था चौपट हो गयी, महंगाई इतनी बढी कि आम आदमी त्राहिमाम किया। भूख और तंगहाली फैल गयी। भूख और तंगहाली से ग्रसित वेनेजुएला की जनता अपने देश से पलायन करने लगी। कई लाख जनता अपना देश छोडकर लैटिन अमेरिकी देशों में शरणार्थी बनने के लिए बाध्य हुई।
माओवाद तो चीन में भी दफन हो चुका हैं। चीन में कहने के लिए कम्युनिस्ट तानाशाही है पर चीन आज की तारीख में एक पंूजीवादी देश है, एक उपनिवेश्विक देश है। चीन की अर्थव्यवस्था पंूजी आधारित है। माओत्से तुंग की क्राति के अवशेष तक नहीं हैं। मजदूर-किसान गौण हो गये हैं। मजदूरों के हित की बात गौण हो गयी है। मजदूर प्राथमिकता सूची से बाहर हैं। चीन के अंदर में एक श्रम कानून बडा ही अमानवीय है। इस कानून का नाम ‘ हायर एंड फायर ‘ है। हायर एंड फायर कानून के तहत कोई भी कंपनी अपनी मनमर्जी से मजदूर रखेगा और अपनी मनमर्जी से मजदूर को निकाल बाहर कर सकता है। मजदूर अपनी हक के लिए आंदोलन कर नहीं सकते हैं। मजदूरों के आंदोलन करने पर कडी सजा है। चीन के अंदर मानवाधिकार की बात सोची तक नहीं जा सकती है। यही कारण है कि दुनिया भर की कपंनियां सस्ते मजदूर के लालच में चीन में अपर्नी इंकाइयां लगाती है। इसी कसौटी पर चीन के अंदर में दुनिया की नामी-नामी कंपनियों के उत्पादन ईकाइंयां लगी हुई है। अगर सस्ता श्रम व्यवस्था नहीं होती और श्रम तथा अन्य कानूनो से छूट नहीं मिली हुई होती तो चीन के अंदर में दुनिया भर की कपंनियां क्यों और किस लिए जाती? अधिकतम लाभ अर्जित करना पूंजी का सिद्धांत है।
माओवाद भारत की जनता का आईकॉन कभी नहीं बन सकता है? माओवाद भारत की जनता का आईकॉल क्यों नहीं बन सकता है? इसके पीछे कौन-कौन से अवरोधक विन्दु हैं, जिस पर विचार किया जाना चाहिए। सबसे पहली बात तो यह है कि माओवाद एक विदेशी अवधारणा है,  माओवाद चीन के अंदर ही दफन हो चुका है, माओवाद एक हिंसक अवधारणा है, एक शत्रु अवधारणा है।  भारत के माओवादी चाहे जिनता भी हिंसा कर लें, भारतीय माओवादी चाहे जितना भी खून बहा दें, आगे भी सालों-सालों तक जंगली क्षेत्रों में हाहाकार मचाते रहें पर भारत की जनता माओवाद को अपना नहीं सकती हैं। भारत में माओवाद तो उसी दिन दफन हो गया था जिस माओत्से तुंग ने भारत पर हमला किया था और जिस दिन माओवादियों तथा कम्युनिस्ट पार्टियों ने माओत्से तुग को अपना आईकॉन, अपना गौड फादर घोषित किया था और यह कहा था कि माओत्से तुंग माई चैयमैन यानी हमारा प्रधानमंत्री। चीनी सैनिकों के स्वागत में बैनर लगाये थे, भारतीय रक्षा उत्पादन कारखानों में हड़ताल करायी थी, ताकि भारतीय सैनिकों को हथियार उपलब्ध न हो सके और चीनी सैनिकों की जीत हो सके। भारत के माओवादियों ने माओत्से तुंग के बदलौत भारत में कम्युनिस्ट सरकार कायम करना चाहते थे। आज भी माओवादी और कम्युनिस्ट पार्टियां चीन को हमलावर या फिर माओत्से तुंग को रक्तपिसाचु मानने से इनकार करते हैं। माओत्से तुंग ने लगभग एक करोड गरीब जनता को अपने देश में भूखे मार दिया था। जिस माओत्से तंुग ने हमारे पांच हजार सैनिकों की हत्या की थी, जिस माओत्से तुंग ने हमारी 90 हजार वर्ग मील भूमि कब्जाई थी उस माआत्से तुग को देश की जनता कैसे स्वीकार कर सकती है?
नेपाल के माओवादियों से भी भारत के माओवादी सीख लेने के लिए तैयार नहीं हैं। नेपाल में माओवादियों ने तानाशाही को छोड़कर लोकतंत्र को अपना लिया। आज माओवादी संसदीय प्रणाली के वाहक हैं, संसदीय चुनाव लडते हैं, संसदीय चुनाव के माध्यम से सत्ता हासिल करते हैं। आज नेपाल में कम्युनिस्ट सत्ता बैठी हुई है। नेपाल की क्युनिस्ट सत्ता भी देशभक्ति और राष्टीयता की कसौटी पर चलती-बढती है। पर भारत के माओवादी देशभक्ति और राष्टीयता को बुरी चीज मानते हैं। अभी भी ये माओत्से तुंग के सिद्धांत से अलग हटने के लिए तैयार नहीं हैं। माओवादी जब हिंसा नहीं छोडेगे तब प्रतिहिंसा उन पर टूटती रहेगी। छत्तीसगढ की जनता की वीरता की प्रशंसा करनी चाहिए। राज्य सत्ता को भी चाकचौबंद रहना चाहिए ताकि मतदान करने वाली जनता को सुरक्षा मिले। माओवादी अपनी हिंसा का शिकार मतदान करने वाली जनता को बना सकते हैं।

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Saturday, November 3, 2018

                  राष्ट्र-चिंतन   

पाक को कंगाल होने से कौन बचायेगा ?

मुद्रा कोश और सउदी अरब, पाकिस्तान को कंगाल होने से बचा सकते हैं पर डोनाल्ड ट्रम्प की धमकी के सामने ये दोनों भी डरे हुए हैं। कंगाल होने से बचने के लिए 1200 करोड अमेरिकी डाॅलर की जरूरत है। अब पाकिस्तान को समझ में आ जाना चाहिए कि दूसरों के घरों में आग लगा कर खुशी मनाने का दुष्परिणाम क्या होता है। जिस चीन के बल पर पाकिस्तान फूलता था वह चीन पाकिस्तान को कंगाल होने से बचाने के लिए क्यों नहीं आगे आ रहा है। पाकिस्तान को अमेरिका और मुद्रा कोश, सउदी अरब के सामने कटोरा लेकर क्यों दौडना पड रहा है? अगर पाकिस्तान अपना भविष्य सुरक्षित रखना चाहता है तो फिर उसे अमेरिका-भारत के साथ रिश्ते मुधर करने ही होंगे, चीनी हथकंडों से मुक्त होना ही होगा, हिंसा की आग पर पानी डालना ही होगा?


                   विष्णुगुप्त




पाक को कंगाल होने से कौन बचायेगा? यह प्रश्न न केवल पाकिस्तान की आतंरिक राजनीति को उथल-पुथल कर दिया है बल्कि मुस्लिम दुनिया और यूरोप-अमेरिका में भी ध्यान खींचा है, चर्चा का विषय बना हुआ है। मुस्लिम दुनिया और अमेरिका-यूरोप में चर्चा का विषय यह है कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में लगी आग में कौन अपना हाथ जलायेगा, कौन अपने हाथ और अपने हित को बलि देकर पाकिस्तान को कंगाल होने से बचायेगा, क्या ऐसे देश को कंगाल होने से बचाना जरूरी है जो देश अपनी आतंकवाद की आउटसोर्सिंग नीति से दुनिया की शांति और सदभाव को खतरनाक तौर पर विध्वंस करता हो और निर्दोष जिंदगियों को लहूलुहान कहरने की नीति पर चलता हो। जानना यह जरूरी है कि पाकिस्तान वर्तमान में कई तरह के संकटों से जूझ रहा है। एक तो उसकी अर्थव्यवस्था विध्वंस होने के कगार पर खडी है, अर्थव्यवस्था की गिरती रफतार को थामने की शक्ति पाकिस्तान की सरकार के अंदर में है नही, ंतो फिर अर्थव्यवस्था को विध्वंस होने से कैसे बचाया जा सकता है, विदेशी मुद्रा भंडार लगभग समाप्त हो गया है, कर्ज की अदायती की आर्थिक शक्ति नहीं है, पाकिस्तानी रूपये की कीमत लगभग 30 प्रतिशत घट गयी है। 
        जिन देशों और जिन संस्थानों से उम्मीद थी उन देशों ने और उन संस्थानों ने या तो हाथ खींच लिये हैं, आर्थिक मदद देने से इनकार कर दिये हैं या फिर उन देशों और उन संस्थानों ने ऐसी शर्ते थोपी हैं जिसकी पूर्ति संभव नहीं है, उन शर्तो को स्वीकार करना खतरनाक है, संप्रभुत्ता के साथ समझौता करना हो सकता है। पाकिस्तान के लिए सबसे बडी समस्या अमेरिका और डोनाल्ड ट्रम्प हैं। डोनाल्ड ट्रम्प पाकिस्तान को किसी भी परिस्थिति में सबक सीखाना चाहते हैं, पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था विध्वंस को सुनिश्चित होना देखना चाहते हैं। डोनाल्ड ट्रम्प ने मुद्रा कोश को सीधे तौर पर हडका दिया है कि अगर पाकिस्तान को आर्थिक सहायता दी तो फिर उसके दुष्परिणाम भयंकर होंगे? उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान सहायता के लिए मुद्रा कोश में बार-बार दस्तक दे रहा है और पाकिस्तान को उम्मीद है कि मुद्रा कोश ही उसकी अर्थव्यवस्था के विध्वंस को बचा सकता है।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की दिन-रात की नींद गायब है, उसके मंत्रिमंडल के सदस्यों की भी नींद हराम हो गयी है। कहने का अर्थ यह है कि इमरान खान और उसकी सरकार दिन-रात यही कोशिश में लगी हुई है कि किस संस्थान और किस देश से आर्थिक सहायता हासिल की जायें। सबसे बडी समस्या इमरान खान ही हैं, इमरान खान की साख ही नहीं है? अब यहां कोई प्रश्न कर सकता है कि इमरान खान की साख क्यों नहीं है? इसका उत्तर यह है कि इमरान खान मूल रूप से राजनीतिज्ञ नहीं हैं, इमरान खान मूल रूप से राजनीतिज्ञ होते तो उन्हें पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था, पाकिस्तान की संप्रभुत्ता और पाकिस्तान की आतंरिक रूढिंयों की समझ होती और इन सभी समस्याओं से निकलने की क्षमता भी होती। इमरान खान की छवि भी अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुसार फीट नहीं बैठती है। अंतर्राष्ट्रीय जगत में पहले से ही बात बैठी हुई है कि इमरान खान आतंकवाद के समर्थक हैं, आतंकवादियों को इमरान खान न केवल समर्थन देते हैं बल्कि संरक्षण भी देते हैं, आतंकवाद के बल पर चुनाव जीते हैं, सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि इमरान खान पाकिस्तान की सेना का मोहरा भी हैं। पाकिस्तान की सेना ने लोकतंत्र का हरण कर इमरान खान को प्रधानमंत्री बनवायी थी। यह आरोप पाकिस्तान की राजनीति में आम है, नवाज शरीफ ऐसे आरोप बार-बार लगाते हैं। अपनी छवि के लिए इमरान खान खुद जिम्मेदार हैं। इमरान खान ने चुनाव के दौरान अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की खूब खिल्लियां उठाया करते थे और कहा करते थे कि सत्ता में आने के तुरंत बाद अंतर्राष्ट्रीय समुदाय, अंतर्राष्ट्रीय नियामको और अतंराष्ट्रीय वित्त संस्थानों को पाकिस्तान की शक्ति दिखायी जायेगी, उनके छोटे-मोटे कर्ज को उनके मुंह पर मार दिया जायेगा, पाकिसतन को किसी की सहायता की जरूरत ही नहीं है। पर जब सत्ता में इमरान खान आये तब उन्हें दिन में ही तारे दिखायी देने लगे। पाकिस्तान की विध्वंस हो रही अर्थव्यवस्था इमरान खान के सिर पर भूत की तरह नाचने लगी।
कौन-कौन देश है और कौन-कौन संस्थाएं हैं जहां से पाकिस्तान की उम्मीद बनती है और पाकिस्तान आर्थिक सहायता के लिए हाथ-पैर मार रहा है? कोई एक नहीं बल्कि दर्जनों देशों से पाकिस्तान ने कोशिश की थी पर हर जगह उसे निराशा हीे मिला है। सिर्फ दो जगह ही बचे हैं जहां पर पाकिस्तान की उम्मीद बची हुई हैं और जहां से पाकिस्तान को आर्थिक सहायता की उम्मीद बनती है। एक सउदी अरब है और दूसरा मुद्रा कोश है। सउदी अरब से पाकिस्तान की दोस्ती पुरानी है, पाकिस्तान को बार-बार सउदी अरब ने सहायता की है। पर कुछ सालों से पाकिस्तान और सउदी अरब के रिश्तों में खटास आ गयी है। यमन पर हमले में पाकिस्तान ने सउदी अरब का साथ नहीं दिया था, जिस कारण सउदी अरब नाराज है। एक अडचन यह है कि सउदी अरब की अर्थव्ववस्था खुद ही खराब हो रही है, उसकी अर्थव्ववस्था में इतनी शक्ति नहीं है कि वह पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को उबार सके। सउदी अरब ने पाकिस्तान को 300 करोड़ डालर का देने का वायदा किया है, ऐसा कहना पाकिस्तान की इमरान खान सरकार का है। पाकिस्तान को अगर सउदी अरब 300 करोड़ डाॅलर दे भी देगा तो भी पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की समस्या दूर हो जायेगाी, ऐसा नहीं माना जा सकता है। वर्तमान संकट से निकलने के लिए पाकिस्तान को करीब 1200 करोड़ अमेरिकी डालर की जरूरत है। मुद्रो कोश ने इसके पहले 13 बार पाकिस्तान की मदद की है और पाकिस्तान को बेलआउट पैकेज दिया है। पर इस बार पाकिस्तान पर मुद्रा कोश की नजर टेढी है। मुद्रा कोश की शर्त काफी खतरनाक हैं और स्वीकार के लायक नहीं हैं। सबसे बडी बात यह है कि मुद्रा कोश ने चीनी कर्ज के संबंध में जानकारी मांगी है। मुद्रा कोश को आशंका है कि पाकिस्तान उसके वित्तीय सहायता का इस्तेमाल चीनी कर्ज की अदायगी में कर सकता है। यही कारण है कि मुद्राकोश ने पाकिस्तान से चीनी कर्ज से संबंधित सभी जानकारियां और वह भी तथ्य परख ढंग से मांगी है। जानना यह भी जरूरी है कि पाकिस्तान के लिए चीन की सहायता से चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा अब पाकिस्तान के लिए गले की हड्डी बन गयी है, चीनी निवेश आधारित आर्थिक गलियारे के निर्माण में पाकिस्तान को अंशदान करने में भारी समस्या हो रही है। मलेशिया से भी पाकिस्तान उम्मीद कर रहा है। मलेशिया से पाकिस्तान हर साल 200 करोड डाॅलर का व्यापार करता है, मलेशिया से पाकिस्तान खाद्य तेल पदार्थ खरीदता है। पर मलेशिया की कोई रूचि है या नहीं, यह स्पष्ट अभी तक नहीं हुआ है।
इमरान खान की सत्ता स्थापित होते ही पाकिस्तान में मूल्य वृद्धि सातवें आसमान पर पहुंच गया है। जन जरूरतों पर आधारित खाद्य वस्तुएं की कीमत काफी बढी हैं। आम आदमी त्राहिमाम कर रहा है, आम आदमी की क्रय शक्ति घट रही है। पाकिस्तान के अंदर कोई ऐसा उद्योग-घंधा भी नहीं है जो आम जनता की समस्याओं को कम कर सके।
इमरान खान के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प एक काल के समान खडे हैं। डोनाल्ड ट्रम्प यह नहीं चाहते हैं कि कोई पाकिस्तान की आर्थिक सहायता करें। पाकिस्तान को जो भी आर्थिक सहायता देगा उसे डोनाल्ड ट्रम्प के तांडव से अभिशप्त होना होगा। डोनाल्ड ट्रम्प आतंकवाद को लेकर पाकिस्तान की गर्दन को मरोडना चाहते हैं। सउदी अरब भी अंदर से डरा हुआ है। मुद्रा कोश को भी डोनाल्ड ट्रम्प की नाराजगी का भान है। अब पाकिस्तान को समझ में आ जाना चाहिए कि दूसरों के घरों में आग लगा कर खुशी मनाने का दुष्परिणाम क्या होता है। जिस चीन के बल पर पाकिस्तान फूलता था वह चीन पाकिस्तान को कंगाल होने से बचाने के लिए क्यों नहीं आगे आ रहा है। पाकिस्तान को अमेरिका और मुद्रा कोश, सउदी अरब के सामने कटोरा लेकर क्यों दौडना पड रहा है? अगर पाकिस्तान अपना भविष्य सुरक्षित रखना चाहता है तो फिर उसे अमेरिका-भारत के साथ रिश्ते मुधर करने ही होंगे, चीनी हथकंडों से मुक्त होना ही होगा, हिंसा की आग पानी डालना ही होगा?


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Tuesday, July 10, 2018

       
                        राष्ट्र-चिंतन
 
       तालिबानी संस्कृति की रही है सहचर / पाकिस्तानी डे का करती थी आयोजन
आसिया अंद्राबी की पाकिस्तानी परस्ती पर प्रहार
               
                   विष्णुगुप्त

 
आसियां अंद्राबी की गिरफ्तारी पर अलगाववादी, विखंडनकारी और पाकिस्तान परस्त बिलबिलाये पडे हैं, उल्टे-पुलटे आरोप जड रहे हैं, भारत सरकार को खलनायक बता रहे हैं, आसिया अंद्राबी को निर्दोष और अपने आप को पीडि़त भी बता रहे हैं, धमकियां दे रहे हैं, कि इसके खिलाफ दुष्परिणाम भयानक होंगे? उल्लेखनीय है कि पाकिस्तानी परस्ती और आतंकवाद का संरक्षण-समर्थन देने के आरोप में तालिबानी संगठन दुख्तरान ए मिल्लत की प्रमुख आसियां अद्राबी को एनआईए ने गिरफ्तार किया है। दुष्परिणाम भयानक क्या होंगे? अलगाववादी, विखंडनकारी और पाकिस्तान परस्त आतंकवादी आतंकवाद का कौन सा अवसर छोड़ते हैं, वे तो आतंकवाद व हिंसा का हर अवसर को लपकने के लिए तैयार होते हैं। उनके आरोप और उनकी चेतावनियां-धमकियां कोई ज्यादा असरकारी होंगी नहीं और न ही भारत सरकार अपना रूख बदलने वाली है, और न ही भारतीय सेना तथा अन्य भारतीय सुरक्षा एजेंसियां अलगाववादियों, विखंडनकारियों और पाकिस्तान परस्तों को कोई रियायत देने के लिए तैयार होंगी।मान-मनव्वल का समय समय समाप्त हो गया है, मान-मनव्वल के समय में अलगाववादियों, विखंडकारियों और पाकिस्तान परस्तों की हर मांग पर सहानुभूति पूर्वक विचार होता था, उनकी हर हिंसा को नजरअंदाज कर दिया जाता था। आखिर क्यों? इसलिए कि इन्हंें शंाति और वार्ता का अवसर दिया जाये। इसलिए सैकड़ों पत्थरबाजों को माफी दी गयी, रमजान के अवसर पर एक तरफा युद्ध विराम किया गया। पत्थरबाजों की माफी और रमजान के अवसर पर एक तरफा युद्ध विराम का दुष्परिणाम क्या निकला, यह कौन नहीं जानता है, आतंकवादी हिंसा बढी, पाकिस्तान की तरफ से फायरिंग बढी। विखंडकारी और पाकिस्तान परस्त यह खुशफहमी पाल रखे थे कि अब भारत सरकार तो कुछ करने ही वाली नहीं है।जब नाउम्मीदी उत्पन्न होती है तब सैनिक-पुलिस कार्यवाही का विकल्प बचता है, भारत सरकार इसी विकल्प का प्रयोग कर रही है। अब आतंकवादी समर्थक राजनीति कश्मीर में नहीं चल सकती है।
       जब-जब लोकतांत्रिक शासन कश्मीर के अंदर अस्तित्व में होता है-तब-तब आतंकवाद और हिंसा बढ जाती है, राष्ट्र विराधी अराजक हो जाते हैं, उनकी अराजकता शांति को भंग करती है, पुलिस और सेना पर हिंसक बन कर टूटती है। लोकतांत्रिक शासन में नरम रूख अख्यिार किया जाता है, सुधरने का अवसर दिया जाता है, इंतजार भी किया जाता है, समस्या के समाधन की पिच भी बनायी जाती है। पर कश्मीर का इतिहास यह कहता है कि जब-जब लोकतांत्रिक शासन ने कश्मीर समस्या के प्रति गंभीरता दिखायी है, समाधान के विन्दु तलाशे हैं, तब-तब पाकिस्तान की पैंतरेबाजी सामने आयी, पाकिस्तान की हिंसक कारस्तानी सामने आयी, पाकिस्तान ने अपने मोहरे संगठनों को हिंसक रूप से सक्रिय कर दिया, हिंसा और आतंकवाद की बर्बर सक्रियता दिखायी। भाजपा ने भी पीडीपी के साथ मिलकर लोकतांत्रित सरकार की स्थापना की थी। पीडीपी की करतूत और पीडीपी की हिंसक व विखंडन प्रक्रिया के साथ दोस्ती जगजाहिर थी , परन्तु भाजपा यह समझती भी थी कि पीडीपी और विखंडनकारियों की दोस्ती जल्द छूटने वाली नहीं है। फिर भी भाजपा ने पीडीपी के साथ मिल कर लोकतांत्रिक सरकार बनायी थी। भाजपा को उम्मीद थी कि अच्छी सरकार और अच्छा प्रशासन का लाभ उठाया जा सकता है, अच्छी सरकार और अच्छा प्रशासन देकर अलगाववादियों, विखंडनकारियों और पाकिस्तान परस्तों की सक्रियता तोडी जाये उनके समर्थन को तोड़ा जाये। पर पीडीपी के अघ्यक्ष महबूबा मुफ्ती की विखंडनकारी सोच टूटी नहीं। महबूबा की सोच हमेशा की तरह विखंडनकारियों के प्रति नरम रही। दरअसल पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती की सोच गलत थी, वह सोचती थी कि भाजपा की मजबूरी के कारण उसकी अराजकता और आतंकवादी समर्थक नीति चलती रहेगी। सेना के अधिकारियों पर मुकदमा चलने लगे, पुलिस और सेना के अधिकारियों का मनोबल तोडा जाने लगा। फलस्वरूप लोकतांत्रिक सरकार दफन हुई। मोदी पर आतंकवादी संगठनों और पाकिस्तान पर कड़ा प्रहार करने का दबाव था।
         आसिंया अंद्राबी जैसे हिंसक और विखंडनकारी और पाकिस्तान परस्त आतंकवादियों को तभी समझ में आ जाना चाहिए था जब भाजपा ने पीडीपी के साथ गठबंधन तोडा था और जम्मू-कश्मीर की सरकार गिरायी थी। नरेन्द्र मोदी सरकार के सामने और कोई दूसरा चारा भी नहीं था। अगर वह आतंकवादियों पर सख्त कार्रवाई करने के लिए तैयार नहीं होती तो फिर उनका आधार ही समाप्त हो जाता। खुद आतंकवादी अपने करतूतों से समर्थन नेटवर्क को जमींदोज किये हैं।आतंकवादी संगठन के पाकिस्तान परस्ती एक अहम प्रश्न है,पाकिस्तान परस्ती के कारण कश्मीर के आतंकवादी संगठनों की छवि हमेशा खराब रहती है। पाकिस्तान अब पहले की तरह मजबूत नहीं है, पहले की तरह वह अतंराष्ट्रीय स्तर पर भारत विरोधी भावनाएं नहीं भडका सकता है, क्योंकि उसकी छवि एक आतंकवादी देश की है, दुनिया यह जान चुकी है, दुनिया यह मान चुकी है कि पाकिस्तान दुनिया भर में आतंकवाद का आउटसोर्सिंग करता है, कश्मीर में पाकिस्तान ही आतंकवादी हिंसा की जड में है। भारत अब मजबूती के साथ दुनिया के नियामकों के अंदर में पाकिस्तान परस्त आतंकवाद का पोल खोलते रहा है और दुनिया को आईना दिखाता रहा है कि पाकिस्तान परस्त आतंकवाद सिर्फ भारत के लिए नहीं बल्कि पूरी मानवता के लिए खतरनाक है।
          आसियंा अंद्राबी के आतंकवादी कारनामें कोई छोटे नहीं है, इनके आतंकवादी कारनामे नजरअंदाज करने वाले नहीं हैं। इनके कारनामे बडे हिंसक है, इनके कारनामें बडे खतरनाक हैं, इनके कारनामे मानवता के शर्मसार करने वाले हैं, इनके कारनामे तालिबानी हैं। इनकी मानसिकता आईएस की है, इनकी मानसिकता अलकायदा की है।  इस्लाम की हिंसा भूत बन कर इनके सिर पर नाचता रहा है। कश्मीर के अंदर वह तालिबानी शासन लागू करना चाहती थी, इसके लिए वह हिंसा का सहारा लेती थी। बुर्का पहनना वह अनिवार्य करना चाहती थी, बुर्का के समर्थन में वह अभियान भी चलायी थी। वह किसी भी स्थिति में कश्मीर के अंदर कैफे संस्कृति विकसित नहीं होने देना चाहती थी, कैफे जाने वाली लड़कियों पर हमला कराने का आरोप भी उस पर लगा था। वह कहती थी कि हर स्त्री को बुर्का पहनना अनिवार्य है और इस्लाम के अनुसार स्वीकार है। बुर्का न पहनने वाली महिलाएं और लडकिया इस्लाम विरोधी हैं, वह यह भी कहती थी कि जो महिलाएं और जो लडकियां इस्लाम का आदेश न मानकर बुर्का नहीं पहनती है वे सभी महिलाएं और लडकियां सजा की लायक हैं। आसियां आद्राबी के अभियान से प्रेरित होकर कई युवकों ने बुर्का न पहलने वाली लडकियों पर हिंसा भी बरपायी थी। आसिया की इस तालिबानी करतूत की कश्मीर में बडी आलोचना भी हुई थी। उदार संस्कृति के पक्षधर लोगों के बीच आसिया आद्रांबी डर पैदा करती थी। 
           आसिया अंद्राबी पर पाकिस्तान परस्ती हमेशा हावी रहती है। वह कहती है कि उसे पाकिस्तान में मिलना है, उसका संघर्ष पाकिस्तान के लिए है। पाकिस्तान में उसे मजहबी शांति मिलेगी। वह भारत को काफिर देश कहती है। काफिर की मानसिकता क्या है? काफिर की मानसिकता बड़ा ही खतरनाक और जहरीली है। गैर मुस्लिमों को काफिर कहा गया है। इस्लाम में काफिर का नामोनिशान मिटाने का आदेश है। सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि वह हर साल पाकिस्तान डे मनाती है। पाकिस्तान डे पर वह न केवल पाकिस्तान की प्रशंसा करती है बल्कि भारत के खिलाफ आग उगलती है। भारत को वह हिंसक देश कहती है। 
          अब तक उसे पाकिस्तान डे मानाने की आजादी कैसे मिली? भारत सरकार की कमजोरी का लाभ उसने खूब उठाया है। भारत में रहकर पाकिस्तान परस्ती किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं है। एनआईए ने आसियां आद्राबी को गिरफ्तार कर प्रहारक संदेश दिया है। विखंडनकारी और हिंसक आतंकवादियों को इसके संदेश समझ लेना चाहिए। अब उनकी पाकिस्तान परस्ती चलने वाली नहीं है। दुनिया भी अब उनकी पाकिस्तान परस्ती पर संज्ञान लेने वाली नहीं है। दुनिया अब कश्मीर की आतंकवादी हिंसा की जड समझ चुकी है। कश्मीर में पाकिस्तान परस्त आतंकवादी संगठनों की सबसे बडी शक्ति भारत और दुनिया के मानवाधिकार संगठन रहे हैं। पर मानवाधिकार संगठन अब खूद ही संदेह के घेरे में हैं। दुनिया की जनमत मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्ट पर विश्वास नहीं कर रही है। मानवाधिकार संगठन यह कहते हैं कि आतंकवादियों के भी मानवाधिकार हैं पर दुनिया की जनमत अब कहती है कि आतंकवादियों द्वारा मारे गये निर्दोष लोगों और आतंकवादियों की हिंसा से प्रभावित लोगो के भी मानवाधिकार हैं। इसीलिए आसिया आद्राबी की गिरफ्तारी पर कोई बडा देश या बडा नियामक विरोध में सामने नहीं आये हैं।
सेना और पुलिस के दबाव से पाकिस्तान परस्त आतंकवादी संगठनों के हौसले पस्त हैं। कई कुख्यात आतंकवादी सरगानाए मारे गये हैं। भारत सरकार को अब किसी भी स्थिति में विखंडनकारियों को कोई अवसर नहीं दिया जाना चाहिए, क्योंकि ये विखंडनकारी शांति और सदभाव की बात सुनते ही नहीं है। अब पाकिस्तान परस्त आतंकवाद पर अंतिम कील ठोकने की जरूरत है। इसकी शुरूआत आसिया आद्राबी की गिरफ्तारी से हो चुकी है।


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Friday, October 28, 2011

वोट के चश्मे से सेना को देखना बंद करो

राष्ट्र-चिंतन
      
  सशस्त्र बल विशेष शक्तियां अधिनियम पर राजनीति क्यों?
वोट के चश्मे से सेना को देखना बंद करो
विष्णुगुप्त


अमेरिका विदेशी राष्टों-कूटनीतिज्ञों के जांच से परे होने का अंतर्राष्टीय अधिकार का सम्मान नहीं करता। विदेशी राष्टाध्यक्षों और कूटनीतिज्ञों को लाइन में खड़ा कर सुरक्षा जांच होती है। विदेशी कूटनीतिज्ञों को कपड़े उतारवा कर भी जांच होती है। तत्कालीन भारतीय रक्षा मंत्री जार्ज फर्नाडीस को अमेरिका के हवाई अड्डे पर कपड़े उतरवा कर सुरक्षा जांच हुई थी। अमेरिकी सेना कई विशेष अधिकार वाले कानूनों से लैश है। दुनिया भर में मानवाधिकारों के शोर के बाद भी अमेरिका की सुरक्षा नीति प्रभावित नहीं हुई। यही कारण है कि वल्र्ड ट्रेड सेंटर पर हुए अलकायदा के हमले के बाद आज तक अमेरिका में और कोई हमला नहीं हुआ है। आतंकवादियों और आतंकवादियों के संरक्षक संवर्ग के लिए मानवाधिकार का कवच क्यों? आतंकवादियों के हमले का शिकार होने वाले लोगों का कोई मानवाधिकार नहीं होता है क्या? हमारे देश में सेना और सेना के सशस्त्र बल विशेष शक्तियां अधिनियम को कोसने का एक ऐसा फैशन है जिसकी एक्सरसाइज कभी रूकती ही नहीं है।
दुनिया में भारत ही एक ऐसा देश है जहां पर सेना और देश की सुरक्षा को भी राजनीतिक वोट के नजरिये से देखा जाता हैं। इतना भर ही नहीं बल्कि वोट के नजरिये से सेना व देश की सुरक्षा को कोपभाजन बनाने और संकट में डालने की कोई कसर नहीं छोड़ी जाती है। राजनीतिक हमलों-साजिशों के बावजूद भी हमारी सेना न केवल अनुशासित है बल्कि दुनिया भर में शांति मिशनों की सफलता में सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। संयुक्त राष्टसंघ के शांति अभियानों में भारतीय सेना की भूमिका अद्वितीय है। दुनिया के संकटग्रस्त-हिंसाग्रस्त और गृहयुद्ध जैसी स्थिति से निपटने में सभी पक्षों द्वारा भारतीय सैनिकों की मांग यह साबित करती है कि हमारी सेना दुनिया के सभी सेना संवर्ग में सबसे अधिक शील और मानवाधिकारों के प्रति जवाबदेह है। पक्षपात जैसी ग्रंथिया हमारी सेना ढोती नहीं। दुनिया भर में अपने लिए अनुशासन और मानवाधिकार के प्रति जवाबदेही हासिल करने वाली हमारी सेना अपने घर में ही आलोचना और राजनीतिक साजिशों का शिकार रही है। जबकि हमारी भगोलिक सीमा पर कैसी संकट है यह भी जगजाहिर है। पड़ोसी देशों के प्रत्यारोपित आतंकवाद से हमारी सेना न केवल जूझ रही है बल्कि अनगिनित कुर्बानियों देकर राष्ट की एकता और अखंडता का बोझ ढो रही है। सेना के दबाव के सामने प्रत्यारोपित व आउटसोर्सिंग आतंकवाद जब-जब दम तोड़ते दिखता है तब तब सेना के हाथ-पांव बांध देने की राजनीति चलती है। शांति प्रक्रिया के नाम पर सेना के आतंकवाद विरोधी अभियानों पर ब्रजपात होता है तो कभी दुर्दांत आतंकवादियों को छोड़ने व उनका सम्मान करने की सत्ता राजनीति चलती है। ऐसे में सेना का पूरा तंत्र जोश और होश क्यों नहीं खोयेगा? सुखद स्थिति यह है कि इतनी राजनीति और साजिश के बाद भी भारतीय सेना ने जोश और होश अभी तक नहीं खोयी है। संवैधानिक लोकतंत्र के दायरे में सेना अपने आप को अराजकता से दूर और जवाबदेही से पूर्ण है।
हाल के दिनों में सशस्त्र बल विशेष शक्तियां अधिनियम के खिलाफ गंभीर चर्चा हो रही है। खासकर बुद्धीजीवी संवर्ग का निशाना है कि सशस्त्र बल विशेष शक्तियां अधिनियम मानवाधिकार हनन का हथकंडा बन गया है। सेना इस अधिनियम का दुरूपयोग करती है और निर्दोष नागरिकों के मानवाधिकार का हनन करती है। इसलिए इस अधिनियम को समाप्त कर देना ही सर्वोत्तम विकल्प है। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुला के बयानों से सशस्त्र बल विशेष शक्तियां अधिनियम को लेकर सेना और गृहमंत्रालय परेशानी में है। उमर अब्दुला ने कश्मीर के कुछ जिलों से सेना का यह विशेषाधिकार समाप्त करना चाहते हैं और इसकों लेकर उनका सार्वजनिक बयानबाजी कुछ ज्यादा ही तेज है। उमर अब्दुला ने सेना को आलोचना को शिकार भी बनाया। सेना के आपत्ति के बाद उमर अब्दुला सेना के पक्ष में बयानबाजी करने और आतंकवाद से लड़ने में सेना की भूमिका की प्रशंसा करने की नीति पर चलने को बाध्य हुए हैं। फिर भी उमर अब्दुला का सेना के इस विशेषाधिकार के खिलाफ अभियान जारी है। सेनाध्यक्ष वीके सिंह ने साफतौर पर कहा है कि सशस्त्र बल विशेष अधिनियम हटा लेने के बाद सीमा चैकियों और आतंकवाद ग्रस्त भूभागों की समस्याएं विकराल होगी। आतंकवाद ग्रस्त भूभागों में सेना की तैनाती का कोई अर्थ नहीं रह जायेगा। दम तोड़ता प्रत्यारोपित आतंकवाद फिर से सिर उठा कर देश की एकता को खंडित करने के लिए शक्ति हासिल करेगा। राजनीतिक संवर्ग को इस सच्चाई से अवगत कयों नहीं होना चाहिए? फिलहाल सेना अध्यक्ष वीके सिंह संतुति गृहमंत्रालय के पास विचाराधीन है। गृहमंत्रालय को यह निर्णय लेना है कि सेना के पास यह विशेषाधिकार रहना चाहिए या नहीं।
सर्वोत्तम स्थिति यह है कि सेना को हमेशा बैरकों में ही रहना चाहिए। आबादी वाले इलाकों में सेना की सक्रियता खतरनाक मानी जानी चाहिए? पर सवाल यहां यह है कि क्या हमारे देश की आतंरिक व वाह्य स्थितियां ऐसी है कि सेना और अन्य सुरक्षा बलों को उनके बैरकों तक ही सक्रियता सुनिश्चित रखी जानी चाहिए। ऐसा सभ्य समाज या आतंरिक-वाह्य चुनौतियों से दूर रहने वाले देशों में ही हो सकता है कि सेना सिर्फ बैरकों में ही अपनी गतिविधियां-सक्रियता सुनिश्चित रख सके। भारत जैसे हिंसाग्रस्त और आतंकवाद से घायल देश में यह संभव ही नहीं है कि सेना को बैरकों तक सीमित रख छोड़ा जाये। वाह्य -आतंरिक सुरक्षा की चुनौतियां हमारे सामने किस प्रकार की विकट है यह भी जगजाहिर है। जम्मू-कश्मीर में हम जहां पाकिस्तान प्रायोजित और आउटसोर्सिंग आतंकवाद के शिकार हैं वहीं पूर्वोत्तर का पूरा इलाका चीन जैसे खतरनाक पड़ोसियों की साजिशों के चक्रव्यूव में हमारी सुरक्षा नीति है। जम्मू-कश्मीर में सेना के अथक प्रयासों और बेहिसाब कुर्बानियों के बदौलत ही हम आतंकवाद पर अंकुश लगाने में कामयाब हुए हैं। आतंकवादियों की पूरी रणनीति सेना के दबाव मेें दम तोड़ रही है। जम्मू-कश्मीर में आतंकवादियों के हमले और आतंकवादियों की धुसपैठ में आयी कम इस बात का प्रमाण है कि सेना का चाकचैबंद कार्रवाइयां पड़ोसी देश के नापाक इरादों को कुचल रही हैं। यह स्थितियां कोई राजनीतिक पहल या कठोरता से नहीं बनी हुई हैं बल्कि सेना के सीमा की सुरक्षा और देश की सुरक्षा के प्रति समर्पण से बनी हुई हैं।जहां तक पूर्वोतर का सवाल है तो पूरा पूर्वोतर ही उग्रवाद के शिकंजे मे कैद है। जहां पर चीन की टेढी नजरें हमेशा सेना की चुनौतियां विकराल करती रही हैं।
हमनें नरम नीति या फिर पड़ोसियों पर भरोसा कर देख लिया है और इसके दुष्परिणामों को भी राष्ट ने भुगता है। जब-जब आतंकवाद दम तोड़ता दिखता है और पड़ौसियों के नापाक इरादे कैद में होते हैं तब-तब नरम नीति या फिर आतंकवादियों से शांति प्रक्रिया की समझ विकसित होती है। नरम नीति या फिर शांति की प्रक्रिया से आतंकवाद और मजबूत होकर खड़ा होता है। पड़ोसी देशों का कुचक्र और तेज होता है। अटल बिहारी वाजपेयी ने पाकिस्तान से दोस्ती की आस में सेना के हाथ बाध दिये थे। आतंकवादियों और आतंकवाद के आउटसोर्सिंग करने वाले देश के साथ शांति प्रक्रिया चलायी गयी। सीमा पर सेना के हाथ बांध कर रखे गये थे। फलस्वरूप राष्ट ने कारगिल जैसे हमले भुगते। कारगिल को मुक्त कराने के लिए सैकड़ो सैनिकों को कुर्बानियां देनी पड़ी थी। विकास के अरबों डालर रूपये कारगिल को पाकिस्तान सैनिकों से मुक्त कराने के लिए लगाये गये। दुनिया भर में आतंकवाद के खिलाफ आवाज तेज हो रही है और पाकिस्तान को कठघरे में खड़ा कर किया जा रहा है पर भारत पाकिस्तान के आतंकवाद के आउटसोर्सिंंग पर खामोश क्यों है?
    साखकर कश्मीर में सेना को किन विकट परिस्थितियों में काम करना पड़ता है उस पर भी गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। पत्थर फेंकने वाली बलवायी भीड़ सरेआम सरकारी प्रतिष्ठानों और सैनिकों के बैरकों में आग लगाती है। पड़ोसी देशों के झंडेु फहराये जाते हैं। सीमा पार कर आने वाले आतंकवादी आबादी में शरण लेकर अपनी खूनी कारवाइयों को अंजाम देते हैं। ऐसी स्थिति में सेना पर अतिरिक्त दबाव आना स्वाभाविक है। मानवीय भूल से कुछ निर्दोष लोग भी उत्पीड़न का शिकार होते हैं। यह सही है। फिर भी जिन स्थितियों में भारतीय सेना आतंकवाद से जूझ रही है उस स्थिति के मद्देनजर हमारी सेना सबसे अधिक शील और मानवाधिकारों के प्रति सचेत-समर्पित है।
हमारे राजनीतिक संवर्ग और सत्ता संस्थान को दुनिया के उन देशों से सबक लेना चाहिए जिन्होंने आतंकवाद से लड़ने के लिए अपने कानूनों को कठोर बनाया। पुलिस -सेना को विशेष अधिकारों से लैश किया। अमेरिका -ब्रिटेन आज अपने विशेष कानूनों के बल पर ही आतंकवादियों के नापाक इरादों से मुक्त है। अमेरिका में विदेशी राष्टाध्यक्षों को लाइन में खड़ा कर तलाशी ली जाती है। भारत को आतंकवाद और देश की सुरक्षा की कसौटी पर ही सशस्त्र बल विशेष शक्तियां अधिनियम को देखना चाहिए।

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Sunday, September 18, 2011

मोदी विरोध की दुकानदारी



राष्ट्र-चिंतन


मोदी विरोध की दुकानदारी


विष्णुगुप्त

दोहरे चरित्र रखने वाले व अति हिन्दू विरोध से लथपथ देश के बुद्धीजीवियों व गैर तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक संवर्ग निश्चित तौर पर मुस्लिम आबादी के शुभचिंतक नहीं, उनके वोट बैंक पर कुदृष्टि डाले गिद्ध है औरगुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की असली शक्ति हैं। नरेन्द्र मोदी का जितना अधिक विरोध और उनके खिलाफ राजनीतिक/न्यायिक प्रक्रियाएं चलती हैं उतना ही गुजरात का जनमानस नरेन्द्र मोदी के साथ निकट चला आता है। गुजरात की जनता की अस्मिता के साथ गोधरा कांड से ही खिलवाड़ करने की राजनीतिक-सामाजिक प्रक्रिया चलती रही है। गुजरात दंगा निश्चित तौर पर एक गैरजरूरी प्रक्रिया थी। लेकिन यह क्यों भूला दिया जाता है कि गोधरा कांड के बाद तथाकथित दोहरे चरित्र रखने वाले और अति हिन्दू विरोध से लथपथ बुद्धीजीवियों-राजनीतिक पार्टियों ने सांप्रदायिक मानसिकता की आग लगायी थी। गोधरा कंाड के दोषियों को कानून का पाठ पढाने की जगह विवेचना-आलोचना का मकड़जाल हिन्दू विरोध पर आधारित थी। गुजराती अस्मिता गोधरा कांड के पूर्व से आहत थी और कई ऐसी प्रक्रियाएं थी जो सीधेतौर बहुसंख्यक गुजराती अस्मिता को कूचल रहीं थी। गुजरात दंगे के बाद नरेन्द्र मोदी ने विकास-उन्नति के रास्ते चुनने की काबलियत दिखायी। राजनीतिक/एनजीओ गठजोड़ से उपजी चुनौतियों से दूसरा कोई भी राजनीतिज्ञ विचलित होता और उसकी सत्ता विध्वंस को भी प्राप्त होती पर नरेन्द्र मोदी ने उन चुनौतियों का न केवल दृढ़ता के साथ सामना किया बल्कि भेदभाव रहित शासन व्यवस्था कायम की है। मोदी के विकास को विरोधी शक्तियां ही नहीं बल्कि मुस्लिम आबादी भी स्वीकार करती है और तारीफ करती है। विकास की जो श्रृंखलाएं बनती है उन श्रृंखलाओं का लाभ सभी संवर्ग को मिलता है। राजनीतिक तकरार तो चलती रहेगी पर इस राजनीतिक तकरार का मोहरा सिर्फ और सिर्फ मुस्लिम आबादी ही बनती हैं। गुजरात में ऐसी राजनीतिक-सामाजिक वातावरण की जरूरत है जिसमें सभी आबादी की श्रृंखलाओं में परस्पर सहयोग व सदभावना की उम्मीद बनती है।


मोदी का अतिविरोध करने वालों का दोहरा चरित्र कितना घिनौना है? कितना राष्ट की अस्मिता को धूल धूसरित करती है? इसका भी एक उदाहरण देख लीजिये। इस उदाहरण को देखने के लिए गुजरात दंगे से बाहर निकल कर देखना होगा। कश्मीरी पंडितों के अनुपात में गुजरात में कितने मुस्लिम समुदाय की आबादी आहत व प्रताड़ित हुई है? दस लाख कश्मीरी पंडितों को अपनी जन्मभूमि को छोड़कर भागने के लिए विवश किया गया। हजारों लोगों को आतंकवादियों ने मौत की नींद सुला दी। तर्क यही था कि कश्मीरी पंडित हिन्दू हैं, इसलिए इन्हें या तो इस्लाम स्वीकार करना होगा या फिर गोली-बम का शिकार होना होगा। आज कश्मीरी पंडित अपनी मातृभूमि से बेदखल होकर ठोकरे खा रहे हैं पर इनकी चिंता बुद्धीजीवियों को है? हुर्रियत के सभी नेता किसी न किसी काल खंड में आतंकवादी रहे है और वे कश्मीरी पंडितों के लहू पीने वाले पिशाच है। इन कश्मीरी पंडितो के रक्तपिशाचुओं के सम्मान में यही बुद्धीजीवी खड़ा रहते हैं। हुर्रियत के नेताओं को दिल्ली बुलाकार सेमिनारों में सम्मानित किया जाता है व राष्ट की संप्रभुता के साथ खिलवाड करने की अनवतरत प्रक्रिया चलती है। क्या हुर्रियत के नेता मोदी से कम विषैला हैं? क्या हुर्रियत के नेता कश्मीरी पंडितांे के रक्तपिशाचु नहीं हैं। हिन्दू और राष्ट के हितो के साथ खिलवाड़ करने पर बुद्धीजीवियों को आर्थिक व वैश्विक लाभ-सम्मान मिलता है। आईएसआई ने देश के अंदर राष्टविरोधी बुद्धीजीवियों की लम्बी कतार खड़ी है। ये बुद्धीजीवी आईएसआई के इसारों पर नाचते हैं। अमेरिका में आईएसआई एजेंट फई से पैसा लेने वाले और उसके निमंत्रण पर अमेरिका जाकर भारत विरोध की कूटनीति चलाने वाले बुद्धीजीवियों की पोल खुल गयी है।

तथाकथित बुद्धीजीवी संवर्ग और मोदी विरोधी राजनीतिक शक्तियां क्या मुस्लिम आबादी की हितैषी है? विश्लेषण का एक आधार भी यह होना चाहिए? तथाकथित बुद्धीजीवियो को अपनी दुकान चलानी है जबकि मोदी विरोधी राजनीतिक धारा को मुस्लिम वोट बैंक की चिंता है। इन दोनों धाराओं को यह मालूम है कि उनकी लाभार्थी होने की एकमात्र शर्त अति हिन्दू विरोध और मोदी के डर को कायम रखना है। इन बुद्धीजीवियों और राजनीतिक संवर्ग उस समय मुंह पर पट्टी लगाये क्यों बैठे थे जब गुजरात धधक रहा था। पूर्व सांसद जाफरी ने अपनी जान बचाने के लिए सोनिया गांधी से लेकर कांग्रेस के कई नेताओं को टेलीफोन किये थे। लेकिन जाफरी की किसी ने भी मदद नहीं की। जाफरी की जान बचाने के लिए आगे नहीं आने वाली कांग्रेस आज मुस्लिम आबादी का हमदर्द होने का नाटक रच रही है। यह भी बात होती है कि मुस्लिम आबादी आज पिछड़ी हुई है और उसके साथ राजनीतिक बेईमानी हुई है। यह बात तो सच्ची है पर इसके लिए जिम्मेदार कौन है? क्या मोदी जिम्मेदार है? कांग्रेस ने सिर्फ और सिर्फ मुस्लिम आबादी को एक वोट बैंक के तौर पर देखा। वोट लेकर मुस्लिम आबादी को हाशिये पर ढकलने जैसी राजनीतिक प्रक्रिया चलायी गयी। हिन्दूवाद का विरोध-मोदी का विरोध ही वह शक्ति है जिससे कांग्रेस को सत्ता संग्रहित करने का अवसर मिलता है। कांग्रेस की इस राह पर वामपंथी सहित पिछड़ी व दलित राजनीतिक पार्टियां भी चलती हैं।

गुजरात की बहुसंख्यक अस्मिता हमेशा से तथाकथित बुद्धजीवियों और धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक पार्टियों की तुष्टीकरण से कुचली गयी हैं। गुजरात ही नहीं बल्कि देश की बहुसंख्यक अस्मिता इस बात को लेकर व्यथित रहती है कि उन्हे तुष्टीकरण के परिणामों का शिकार तो बनाया ही जाता है इसके अलावा उन पर लांक्षणा की प्रक्रिया भी चलती रहती है। बहुसंख्यक अस्मिता शांति और सदभाव का समर्थक हैं। इसलिए बहुसंख्यक मान्यताओं पर खिल्ली उड़ाने वाली प्रक्रिया बेधड़क चलती रहती है। कभी राम की तो कभी कृष्ण पर कीचड़ उछाली जाती है। पर कभी गैर हिन्दू मान्यताओं पर तथाकथित बुद्धीजीवी और राजनीतिक श्रृंखलाएं खिल्ली उड़ा सकती है। कभी नहीं। आनन-फानन में इनकी हेकड़ी ग्राह हो जायेगी? गोधरा-गुजरात के पहले एक खास संवर्ग की गुंडागर्दी चरम पर थी। इस गुंुडागर्दी की मानसिकताएं वैसी ही थी जैसी कि इस्लामिक आतंकवादी श्रृंखलाओं की रही है।

उपवास और सदभावना की नीति का अतिविरोध भी एक तरह से नरेन्द्र मोदी के राजनीतिक शक्ति का ही परिचायक है। नरेन्द्र मोदी लगातार तीन बार से निर्वाचित हो रहे हैं। कांग्रेस और सभी विरोधी संवर्गों की पूरी की पूरी नीति धरी की धरी रह जाती हैं। नरेन्द्र मोदी की लगातार जीत ने साबित कर दिया है कि वे गुजरात की बहुसंख्यक अस्मिता के प्रतीक हैं। प्रशासनिक क्षमता का उन्होंने बेमिसाल उदाहरण दिया है। वीजा देने से इनकार करने वाला अमेरिका भी अब नरेन्द्र मोदी का प्रशंसक है। इसलिए कि नरेन्द्र मोदी ने विकास की प्रक्रिया चलायी। लगातार विरोधों के बाद भी विकास की सर्वश्रेष्ठ लौ जलाने की उपलब्धि ऐसी है जो मोदी को विकास मसीहा की पदवि देती है। विकास कार्यो में उन्होंने कहीं से भी न तो अन्याय किया और न ही उन्होंने पक्षपात किया। मुस्लिम आबादी आज खुद मोदी के विकास का गुणगान करती है। गुजरात के मुस्लिम सवर्ग के चिंतन में गुणात्मक बदलाव आया है। अब वे यह समझ गये हैं कि राजनीतिक तकरार या हिंसा की बात करने से लाभ नही होने वाला है। शांति-सदभाव से ही उन्नति की राह आसान हो सकती है। अलगाव और वैमनस्यता को हवा देने वाले राजनीतिक दल और बुद्धीजीवी मुस्लिम आबादी की भलाई नहीं चाहते हैं। नरेन्द्र मोदी न केवल गुजरात की बहुंसख्यक अस्मिता का प्रतीक है बल्कि देश की बहुसंख्यक आबादी के बीच भी उनकी साख और विश्वसनीयता सर्वश्रेष्ठता की श्रेणी में खड़ी है। भाजपा में उन्हें प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप देखा जाने लगा है। क्या नरेन्द्र मोदी भाजपा का नेतृत्व करने की शक्ति हासिल कर सकते हैं और भाजपा को फिर से केन्द्र की सत्ता पर बैठा सकते हैं। भविष्य की राजनीति में नरेन्द्र मोदी की संभावनाएं सर्वश्रेष्ठ है।
 
 
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Saturday, August 13, 2011

........ तब राजदीप सरदेसाई की जगह जेल होती

राष्ट्र-चिंतन
                        
                            कैश फॉर वोट कांड
 .... तब राजदीप सरदेसाई की जगह जेल होती
विष्णुगुप्त

आईबीएन सेवन के सर्वेसर्वा राजदीप सरदेसाई अगर ब्रिटेन या अन्य यूरोपीय देशों में होते तो निश्चित मानिये कि उनकी जगह जेल होती और उनके न्यूज चैनल आईबीएन सेवन पर ताला जड़ गया होता। सामाजिक जलालत अलग से झेंलनी पड़ती। कानूनों की घेरेबंदी में इनकी ईमानदारी के पचखडे उड़ गये होते। इनकी पेज थ्री संस्कृति जमींदोज हो जाती। सड़कों पर चलने के दौरान इनके उपर अंडे-टमाटरों की बरसात होती। इनकी ज्ञात और अज्ञात संपति भी अपराध की श्रेणी में खड़ी होती। अनैतिक/पतनशील और भ्रष्ट सत्ता वाली व्यवस्था के अंतर्गत ही राजदीप सरदेसाई जैसी संस्कृति जन्म ले सकती है और फल-फूल सकती है। इतना ही नहीं बल्कि चोरी और सीना जोरी वाली कहावत को सच में बदल सकती है।
इसलिए कि कैश फॉर वोट कांड में राजदीप सरदेसाई एक अपराधी के तौर पर खड़े हैं। एक साथ इन्होंने कई अपराधिक षडयंत्रों को रचा और संबंधित कानूनों के पचखड़े उड़ाये। प्रसारण नियमावली का उल्लंधन किया। दर्शकों और पाठको के कानूनी/नैतिक और परम्परागत अधिकार से वंचित किया। राजदीप सरदेसाई को न्यूज दबाने के षडयंत्र के लिए प्रसारण लाइसेंस दिये गये थे क्या? पत्रकारिता के मूल्यों और जिम्मेदारियों की ऐसी हताश प्रक्रिया के उदाहरण रचकर पत्रकारिता की विश्वसनीयता और लोकतांत्रिक ढाचे पर कलंक का बीज बोया गया है। मीडिया की थोड़ी सी भी समझ रखने वाली देश की आबादी स्पष्ट तौर पर राजदीप सरदेशाई के उस कुकृत्य को अपराध की श्रेणी में ही नहीं मानता है बल्कि चैनल चलाने के निहित जरूरी अहर्ताओं का उल्लंघन भी मानता है। मीडिया स्टडी ग्रुप के शोध में दिल्ली और छोटे-छोटे शहरों के पत्रकारों की राय एकमत रूप से आईबीएन सेवन और इनके कर्ताधर्ता राजदीप सरदेसाई को अप्रत्यक्ष नहीं बल्कि प्रत्यक्षतौर पर दोषी माना है और प्रसारण लाइसेंस का उल्लंधन भी।
अगर आईबीएन सेवन ने समाचार दबाने का षडयंत्र नहीं किया होता और ईमानदारी दिखायी होती तो निश्चिततौर पर मनमोहन सिंह /उनके मैनजरों तथा अमर सिंह एंड पार्टी का काला चेहरा उसी समय उजागर हो गया होता जिस समय परमाणु मुद्दे पर सरकार बचाने के लिए सांसदों के जमीर को खरीदा गया था और लोकतंत्र को पैसों की शक्ति से कुचला गया था। किस उ्देश्य से समाचार प्रसारण रोकने का षडयंत्र हुआ था। कही कांग्रेस/ मनमोहन सत्ता और आईबीएन सेवन के बीच पैसे की शक्ति तो काम नहीं कर रही थी। कही सांसदों को पैसे के बल पर खरीदने जैसी प्रक्रिया कांग्रेस और उसके मैनजरों ने आईबीएन सेवन के साथ तो नहीं चलायी थी? यही खोज का विषय है। पुलिस इस पर निष्कर्ष स्थापित कर सकती है। पत्रकारिता में चोर-चोर मसौरे भाई की संस्कृति हावी हो गयी है। इसीलिए जब टू जी स्पेक्टरम में बरखा दत्त पत्रकारिता को बेचती है तब राजदीप सरदेसाई जैसे पत्रकार समर्थन में खड़ा होकर बरखा दत्त को जलालत झेलने और कानून का ग्राह बनने से बचाने के लिए कलम-आवाज उठाते हैं। जब राजदीप सरदेसाई केश फॉर वोट कांड को दबाता है तब पत्रकारिता के अन्य मठाधीश अपनी आवाज बक्से में बंद कर देते हैं। यह चोर-चोर मसौरे भाई की ही लूट,चोरी और भ्रष्टाचार की कहानी है।
रूपर्ट मर्डाेक का उदाहरण.............
जो लोग आईबीएन सेवन और राजदीप सरदेसाई एंड कंपनी को सत्यवादी हरिश्चंद से भी बड़ा सत्यवादी मानते हैं और इनके कुकत्यों को पत्राकारिता के ज्ञात और परम्परागत यथार्थों के विपरीत नहीं मानते उन्हें मीडिया सुलतान रूपर्ट मर्डोंक के प्रकरण को आत्मसात करना चाहिए। ब्रिटेन ही नहीं बल्कि दुनिया का मशहूर अखबार ‘न्यूज ऑफ द वर्ल्ड ‘ और मीडिया सुलतान रूपर्ट मर्डोक के हश्र का उदाहरण हमारे सामने है। न्यूज ऑफ द वर्ल्ड का प्रकाशन सदा के लिए बंद कर दिया गया। न्यूज ऑफ द वर्ल्ड ने समाचार की खोज में निजी तौर पर टेलीफोन टेप का अपराध किया था। यह अपराध उसने न्यूज को दबाने या फिर ब्लैकमैलिंग के उद्देश्य से नहीं किये गये थे। खोजी पत्रकारिता और पाठकों के बीच विशेष समाचार सामग्री देने की होड़ में न्यूज आफ द वर्ल्ड ने ब्रिटेन की राजशाही सहित अन्य प्रमुख हस्तियों के टेलीफोन टेप कर सनसनी समाचार पाठकों के बीच परोसे थे। जैसे ही यह प्रकरण सामने आया वैसे ही ब्रिटेन की कैमरून सरकार सकते में आ गयी और कैमरून के मीडिया सलाहकार सहित न्यूज ऑफ द वर्ल्ड के टॉप अधिकारी जेल के अंदर पहुंच गये। मर्डोक के खिलाफ संज्ञान लिया गया और उन्हें ब्रिटेन की संसदीय समिति के सामने कई दिनों तक हाजिरी लगानी पड़ी। इस दौरान मर्डोक पर हमले भी हुए। न्यूज आफ द वर्ल्ड से जुड़े टॉप मीडियाकर्मियों को जनाक्रोश की जलालत झेलनी पड़ रही है और वे सड़कों पर बाधा रहित घूम भी नहीं सकते। उन्हें अंडो और टमाटरों की अपने उपर बरसात होने का डर है। जबकि न्यूज आफ द वर्ल्ड का अपराध आईबीएन सेवन की तुलना में कहीं भी नहीं ठहरता है। न्यूज आफ द वर्ल्ड का हश्र इसलिए हुआ कि ब्रिटेन की सामाजिक और सत्ता व्यवस्था में अभी भी नैतिकता है।
आईबीएन सेवन का स्टिंग आपरेशन..................अमेरिका के साथ परमाणु 123 करार पर वामपंथी जमात के समर्थन खींच लेने के कारण मनमोहन सिंह सरकार अल्पमत आ गयी थी। सांसदों की खरीद के बिना मनमोहन सिंह की सत्ता बचती और न ही अमेरिका के साथ 123 परमाणु करार संसद में पास होता। सांसदों की खरीद के लिए कांग्रेस के मैनेजर तो थैली खोलकर बैठे ही थे, इसके अलावा अमर सिंह और मुलायम सिंह एंड पार्टी भी सांसदों के खरीद में लगे हुए थे। अमेरिका की परमाणु कंपनियां और देश के कांग्रंेसी सत्ता समर्थक उद्योगपति धन की वर्षा कर रहे थे। भाजपा सहित अन्य अन्य विपक्षी दलों के सांसदो पर पैसे की शक्ति का लालच दिया गया था। भाजपा के सांसदों ने इसकी शिकायत आलाकमान से की थी। भाजपा आलाकमान ने आईबीएन सेवन और राजदीप सरदेसाई से सांसदों की खरीदने की कांग्रेसी और अमर-मुलायम एंड पार्टी की करतूत का स्टिंग आपरेशन करने के लिए संपर्क्र किया था। भाजपा से आईबीएन सेवन और राजदीप सरदेसाई ने वायदा किया था कि आपरेशन चाकचौंबद होगा और कांग्रेस की पैसे की शक्ति से उनकी ईमानदारी नहीं डिगेगी। सच को उजागर कर मनमोहन सत्ता का खेल बेपर्दा होगा।
नोट लहराने की बेबसी................
आईबीएन सेवन ने ईमानदारी नहीं दिखायी। स्टिंग आपरेशन तो किया पर उसने स्टिंग आपरेशन को दिखाने से साफ इनकार कर दिया। अमान्य और प्रत्यारोपित तर्क प्रस्तुत किये गये। भाजपा राजदीप सरदेसाई एंड कंपनी विश्वास कर ठगी गयी। सांसदों को खरीदने की कांग्रेसी/अमर-मुलायम एंड पार्टी की करतूत पर पर्दा उठने की उम्मीद बेकार साबित हो गयी थी। हारकर भाजपा सांसदों ने अमर सिंह-मुलायम सिंह एंड पार्टी द्वारा दिये गये एक करोड़ रूपये को संसद में लहराना पड़ा। संसद में रिश्वत के रूप में दिये गये एक करोड़ रूपये लहराने की यह पहली घटना थी। कायदे से इस करतूत का पर्दाफाश आईबीएन सेवन को करना चाहिए था। अगर आईबीएन सेवन नोट की शक्ति से सांसदों की जमीर खरीदने का खेल प्रसारित कर दिया होता तो संसद में मनमोहन सरकार बेपर्दा हो जाती।
22 जुलाई से 11 अगस्त के बीच कौन सा खेल हुआ......................
22 अगस्त 2008 को कैश फॉर वोट कांड की करतूत सामने आयी थी। लोकतंत्र की इस हत्या पर लोकतांत्रिक समाज-व्यवस्था हतप्रथ थी। देश का लोकतांत्रिक संवर्ग और आम आबादी इस कंाड की असली सच्चाई जानने की उम्मीद आईबीएन सेवन से कर रहा था। आईबीएन सेवन कभी ंिस्टंग आपरेशन को अधूरा होने तो कभी तस्वीर साफ नहीं होने और कैश फॉर वोट कांड में संलग्न लोगों की शख्सियत अज्ञात होने जैसे रक्षा कवज बनाता रहा। इस दौरान उसकी कांग्रेस-मनमोहन सिंह सत्ता या फिर अमर सिंह-मुलायम सिंह एंड पार्टी से आईबीएन सेवन-राजदीप सरदेसाई एंड पार्टी के बीच कौन सा खेल हुआ। कही पैसे की शक्ति से आईबीएन सेवन भी तो प्रभावित नहीं हुआ? इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता है। सच तो यह है आईबीएन सेवन और कांग्रेस मनमोहन सिंह सरकार के बीच सैकड़ो करोड़ की डील हो सकती है। ऐसे ही कोई नामी-गिरामी न्यूज चैनल अपनी विश्वसनीयता नहीं खो सकता है। ऐसे समय में जब कांग्रेस-मनमोहन सरकार और अमर-मुलायम अपनी साख बचाने और कैश फॉर वोट कांड पर पर्दा डालने के लिए कोई/कैसी भी हदें पार कर सकतंे थे। पत्रकारिता संवर्ग की इस आशंका को झुठलाया नहीं जा सकता है कि राजदीप सरदेसाई स्टिंग आपरेशन को दबाने और सत्यता छुपाने की कीमत भी करोड़ों में वसूली होगी। मीडिया स्टटी ग्रुप के सर्वेक्षण में पत्रकारिता संवर्ग ने ऐसी ही राय प्रकट की थी।
चोरी-चोरी दिखाया क्यो?.............
इलेक्टानिक्स मीडिया का इतिहास खंगाल लीजिये और राजदीप सरदेसाई की चोरी और पत्रकारिता बेचने की कहानी की नीयत भी पकड़ लीजिये। जब कोई सनसनी या विशेष समाचार का खुलासा होता तो चैनल कई दिनों से इसकी सूचना बार-बार देते हैं और सनसनी खेज समाचारों की फूटेज भी दिखाते हैं। विज्ञापन बटोरने का खेल भी खेलते हैं इसकी मिसाल शायद आपको याद हो जब लालू प्रसाद यादव रेलमंत्री थे तब लालू यादव के क्षेत्र से एक खबर इसी चैनल पर फ्लैश की जा रही थी कि लालू ने कितने ही लोगों की जमीन हथिया ली है लेकिन उस जमीन के बारे में कोई खुलासा नहीं हुआ, दो दिन तक लालू द्वारा जमीन हथियाने की पट्टी समाचार चलाने के बाद उस खबर की सच्चाई सदा के लिए जमींदोज कर दिया गया था। उसी तरह कैश फॉर नोट कांड का प्रसारण राजदीप एंड कंपनी ने बेहद गोपनीय ढंग से और बिना पूर्व सूचना के 11 अगस्त 2008 को कर दिया। सनसनी खेज और विशेष समाचारों के प्रसारण बार-बार दिखाये जाते हैं। दर्शकों की प्रतिक्रिया लेने के लिए चैनलों के रिर्पोटर खाक छानते हैं। 19 दिनों तक इस स्टिंग आपरेशन को दबा कर रखा जाता है क्यों? अगर देश भर में मीडिया कर्मियों और बुद्धिजीवियों में हो हल्ला नहीं मचता तो 19 दिन बाद भी कैश फॉर वोट कांड को नहीं दिखाता। चर्चा में कई सवाल है। इन सवालों में अमर सिंह और अहमद पटेल के घर में किये गये स्टिंग आपरेशन को गोलमाल करना भी है।
बेशर्मी की हद भी देखिये.....................
विकीलीक्स ने खुलासा किया था कि कैश फॉर वोट कांड में मनमोहन सिंह और कांग्रेस ने सांसदों की जनमत खरीदा था। विकीलीक्स के खुलासे में ऐसी कोई नयी बात नही थी जो राजनीतिक-पत्रकारिता संवर्ग से ओझल थी। जैसे ही विकीलीक्स का खुलासा सामने आया वैसे ही आईबीएन सेवन की सनसनी शुरू हो गयी। आईबीएन सेवन पर विकीलीक्स के खुलासे का जिक्र तो हुआ पर गर्व के साथ समाचार दिखाया गया कि सबसे पहले आईबीएन सेवन ही इस कांड को दिखाया था और इसकी पोल खोली थी। गर्व और वीरता का ऐसा भाव दिखाया गया जैसा कि सही में आईबीएन सेवन कैश फॉर वोट कांड में सत्यता सामने लाया है। 19 दिनों तक क्यो छुपा कर रखा स्टिंग आपरेशन को। अमर सिंह और अहमद पटेल के घरों में किये गये स्टिंग आपरेशन का गोलमाल क्यों हुआ? यह सब कौन बतायेगा?
न्याय प्रक्रिया की जिम्मेदारी...........
मनमोहन सरकार प्रारंभ से ही इस कांड को दफन करने में लगी है। इसलिए पुलिस अमर सिंह एंड कंपनी और अहमद पटेल सहित राजदीप सरदेसाई एंड कंपनी को बचा रही है। पुलिस के माध्यम से सच का सामने आना मुश्किल है। इसलिए पुलिस जांच की निगरानी ही सर्वश्रेष्ठ प्रक्रिया होगी। अगर न्यायालय अपनी निगरानी में पुलिस को चाकचौबंद/दबाव रहित और निष्पक्ष जांच करने के लिए बाध्य करेगा तभी सभी सच्चाई की हम उम्मीद कर सकते हैं। पुलिस-न्यायालय द्वारा आईबीएन सेवन/राजदीप सरदेसाई की गर्दन क्यों नही नापी जानी चाहिए? ब्रिटेन के मशहूर अखबार ‘न्यूज ऑफ वर्ल्ड‘ के हस्र और मीडिया सुलतान रूपर्ट मर्डोंक की कानूनी घेरेबंद व उनके खिलाफ ब्रितानी समाज उपजा जनाक्रोश की कसौटी जैसा ही व्यवहार और काूननी कार्रवाई आईबीएन सेवन/राजदीप सरदेसाई एंड कंपनी के खिलाफ होना जरूरी है। आज राजीव सरदेसाई जैसा पत्रकार रातो रात चैनल मालिक कैसे हो जाता है। चैनल चलाने के लिए आया धन कही आईएसआई एजेंड गुलाम नवी फई जैसा तो नहीं है? इसकी जांच कौन करेगा? मीडिया जगत को भी अपनी छवि बचाने के लिए राजदीप सरदेसाई जैसे पत्रकारों पर गहणता के साथ विचार करना होगा। अगर नही ंतो फिर पत्रकारिता जगत अपने आप को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ होने का दावा कैसे कर सकता है?

लेखक परिचय.......................
समाजवादी और झारखंड आंदोलन सक्रिय भूमिका रही है। मूल रूप से समाजवादी चिंतक हैं। पिछले 25 सालों से हिन्दी पत्रकारिता के योद्धा हैं। ‘झारखंड जागरण‘ रांची, ‘स्टेट टाइम्स‘ जम्मू और न्यूज एजेंसी एनटीआई के संपादक रह चुके है। वर्तमान में वरिष्ठ राजनीतिक टिप्पणीकार है। संपर्क नम्बर - 09968997060

Sunday, July 31, 2011

भारतीय बुद्धीजीवियों की राष्ट्रद्रोही निष्ठा


राष्ट्र-चिंतन

आईएसआई मनीगॉड है इनके लिए

भारतीय बुद्धीजीवियों की राष्ट्रद्रोही निष्ठा

विष्णुगुप्त



ग्रेट ब्रिटेन से जुड़ा एक अनोखा व प्ररेक घटना है। ब्रिटेन वासी एक सज्जन के यहां एक चोर घुस आया। चोर को पकड़ने के लिए उस सज्जन ने अनोखा रास्ता निकाला। उसने अपने देश के राष्टगान का टेप लगा दिया। राष्टगान की आवाज सुनकर चोर सम्मान में सावधान की मुद्रा में खड़ा हो गया फलस्वरूप वह पकड़ा गया पर उसने अपने देश के राष्टगान के प्रति प्ररेक सम्मान दर्शाया। जापानियों के संबंध में एक कहावत आम है कि जब वे अपनी धरती पर कदम रखते हैं तो वे सिर झुका कर अपनी धरती का सम्मान करते हैं। अमेरिका की मूल आबादी ‘रेड इंडियन‘ और कोलबंस की संस्कृति की आबादी कभी भी अपने देश के प्रति कोई भी उदासीनता या फिर असम्मान/ परसप्रंभुता को तुष्ट करने वाली नीति पसंद नहीं करती है। यह सही है कि मजहबी मानसिकता से ग्रसित होकर बाहर से आयी आबादी जरूर अमेरिकी राष्टवाद की प्रति अप्रत्यक्ष-प्रत्यक्ष गतिविधियां चलाती हैं। ग्रेट ब्रिटन अपनी आबादी की इसी ग्रेट राष्टभक्ति के कारण दुनिया पर राज किया था और जापान द्वितीय विश्वयुद्ध में विध्वंस के बाद भी पुर्नर्निमाण से दुनिया की सर्वश्रेष्ठ आर्थिक शक्ति बना। दुनिया अमेरिका को अराजक या फिर आर्थिक लुटेरा कहता रहे पर आम अमेरिकियों को अपने देश की सामरिक शक्ति पर नाज है। उर्पयुक्त विषयक विमर्श पर जब हम अपने देश की आबादी को राष्ट भक्ति की कसौटी पर देखते है तो कहीं से भी प्ररेणादायी समर्पण का भाव वैसा नहीं है जैसा अमेरिका,ब्रिटेन और जापान के नागरिकों को अपने देश के प्रति राष्टभक्ति है। देश की आम नागरिकों पर नुक्ताचीनी नहीं करना ही बेहतर होगा पर खासकर बुद्धीजीवी संवर्ग नोट के चंद टुकड़ों के लिए परसंभुता के हित साधते हैं और देश के मान-सम्मान को परराष्टो को बेचते हैं ताकि उन्हें पेजथ्री टाइप की सुविधाएं चाहिए/विदेशी दौरे का आमंत्रण और सहायता चाहिए। इस निमित ये देश को बेचने से नहीं चुकते। नौकरााही/व्यापारी सवंर्ग पहले से ही पूरी तरह से राष्टभक्ति के मूल्यों पर पैसे/ पद को प्राथमिकता देते हैं और संरक्षण में नीतियां चलाते हैं। राजनीतिक संवर्ग भी इस कसौटी पर चाकचौबंद होने का दावा नहीं कर सकता है। अंग्रेजों की गोलियां खाकर चन्द्रोखर आजाद और फांसी पर चढ़कर सरदार भगत सिंह ने देश को आजाद कराया था। लेकिन आज की युवा पीढी और बुद्धीजीवियों का आजादी के इस सरोकार से निष्ठुर होना दुर्भाग्य ही माना जायेगा।
                  आईएसआई एजेंट गुलाम नवी फई की गिरफ्तारी से जिस तरह के राज खुले हैं उससे जयंचंदों की पूरी कहानी आम आबादी को न केवल ंिचंतित कर रही है बल्कि विचार का केन्द्रीत विषय यह हो गया है कि आखिर जयचंदों की राष्टविरोधी गतिविधियां किस प्रकार से नियंत्रित होगी और कब तक हमारे देश के तथाकथित बुद्धीजीवी और धर्मनिरपेक्ष संवर्ग नोट के चंद टूकडो के लिए आईएसआई और परसंप्रभुता के इशारों पर नाचती रहेगे? कब तक विदेशी पूंजी से देश में राष्टद्रोह जैसी प्रक्रिया चलाती रहेगी? आईएसआई एजेंड गुलाम नवी फई की गिरफ्तारी से यह राज जाहिर हुआ है कि वह भारत विरोधी जनमत बनाने के लिए अमेरिकी राजनीतिक प्रक्रिया को प्रभावित कर रहा था।इतना ही नहीं बल्कि उसने भारतीय बुद्धीजीवियों और अन्य सवंर्ग के लोगों को पैसे की ताकत के बल पर प्रभावित कर छोडा था। गुलाम नवी फई के आमंत्रण पर अमेरिका का सैर करने वाले नामी-गिरामी हस्तियों में कुलदीप नैयर/दिलीप पडगावकर/वेद भसीन/हरजिंदर बावेजा /राजेंद्र सच्चर /गौतम नवलखा और अरूंधती राय जैसे पत्रकार और बुद्धीजीवी भी हैं। गुलाम नवी फई पर कश्मीर में पत्थरबाजों को आर्थिक सहायता देने के साथ ही साथ पत्थर बाजी की पूरी नीति बनाने और भारत को दुनिया भर में बदनाम करने का भी प्रमाणिक आरोप है। गुलाम नवी फई अमेरिका में कश्मीर के मुद्दे को हवा देने के लिए करोड़ों डालर कहां से लाकर खर्च कर रहा है और उसके पैसे से भारतीय बुद्धीजीवी किस प्रकार से देश का स्वाभिमान बेच रहे हैं? यह सबकी जानकारी भारतीय गुप्तचर एजेंसियों को कैसे नहीं होगी? आईएसआई और पाकिस्तान सरकार कश्मीर को हड़पने के लिए करोड़ो डालर हर साल खर्च करती है। सिर्फ फई ही नहीं बल्कि और कई संस्थाएं और शख्सियत हैं जो अमेरिका में बैठकर भारतीय बुद्धीजीवियों को खरीदते हैं।
                    फिर इन जयंचदों को नीति निर्धारण /जनमत निरीक्षण-परीक्षण जैसे महत्वपूर्ण दायित्वो को जिम्मेदारी कैसे दी गयी। खासकर दिलीप पडगावकर को कश्मीर समस्या के समाधान का मुख्य वार्ताकार क्यों बनाया गया। जिन लोगों की निष्ठा आईएसआई और परसंप्रभुताओं की पैरबीकार की होती है उन्हें देश के भाग्य विधाता बनाने की नीति क्यों होती है। यही कारण है कि हमारी संप्रभुता बार-बार अपमानित होती है/लहुलूहान होती है। फिर भी हमारे देश में राष्ट के प्रति जिम्मेदारी और वीरता का निर्णायक स्थितियां बनती नहीं है। कारण स्पष्ट है। जब भी आईएसआई या फिर चीन द्वारा खतरों की बात उठती है और निर्णायक नीतियां बनाने व कार्यान्वयन का समय आता है तब ऐसे ही बुद्धीजीवी किंतु-परंतु का सवाल उठाकर पानी डालने का काम करते हैं। कश्मीर में ऐसे जमात को आईएसआई और पाकिस्तान की कारस्तानियां नजर नहीं आती पर भारत को बदनाम करने का उन्हें कोई भी अवसर जाया करना स्वीकार नहीं है। गौतम नवलखा और अरूंधती राय कश्मीर को अलग करने की बात करते हैं और भारत को अपराधी के तौर पर खड़ा करने की स्वयं सेवी राजनीति चलाते हैं। क्या गौतम नवलखा और अरूधंती राय कश्मीर और पाकिस्तान जैसे मजहबी मानसिकता से ग्रसित व्यवस्था में रह सकते हैं? गौतम नवलखा और अरूंधती राय जैसों को भारत जैसी उदार व्यवस्था में ही पर संप्रभुता को साधने का खेल चल सकता है।
                   1971 में जब बांग्लादेश का निर्माण हुआ था और 90 हजार पाकिस्तानी सैनिक हमारे कब्जे में थे उसी समय कश्मीर समस्या का हल हो सकता था। कमसे कम हम अपनी सेना को मैदानी भागों तक ले जा सकते थे। पर वामपंथी बुद्धीजीवियों ने इंदिरा गांधी को गुमराह किया था और तर्क दिया गया था कि अब पाकिस्तान कभी भी भारत के खिलाफ सर नहीं उठा सकता है।चीन ने 1962 में हमला कर हमारी 90 मील भूमि कब्जाई और पांच हजार से अधिक सैनिकों को मौत का घाट उतार दिया। वामपंथी और धर्मनिरपेक्ष बुद्धीजीव वर्ग आज भी चीन को हमलावर नहीं मानता है। हमारी कब्जाई 90 हजार मील भूमि में से चीन एक इंच भी भूमि छोड़ने के लिए तैयार नहीं है बल्कि अब वह अरूणाचल प्रदेश और सिक्किम को भी हड़पना चाहता है फिर भी बुद्धीजीवियों के एक बड़े संवर्ग द्वारा चीन से चमत्कृत है और चीन से स्वहितो की कीमत पर भी संबधों की पैरबी होती है। शरीयत आतंकवाद को जस्टीफाई ठहराने के लिए सरदार भगत सिंह को भी आंतकवादी कहा जाने लगा है। धर्मनिरपेक्ष बुद्धीजीवियों द्वारा तैयार किये गये स्कूली पाठ्यक्र्रमों में सरदार भगत सिंह को आतंकवादी करार दिया गया है।
                   देश के अंदर में विदेशी पूंजी से जनमत प्रभावित करने और राष्टवाद की जगह पर संप्रभुता का गुनागान करने की राजनीतिक-सामाजिक प्रक्रिया चलती है। स्वयं सेवी संस्थाओं के माध्यम से हमारी संप्रभुता की विरोधी शक्तियां अपना खेल खेलती रहती हैं और हमारी एकता-अखंडता को भी इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है। आज देश में जितने भी बड़ी शख्सियत हैं उनका कोई न कोई पॉकेट स्वयं सेवी संस्था है जिनके माध्यम से उनका विदेशी भ्रमण और पेज थ्री सुविधाएं उठाते हैं। इस तरह के बुद्धीजीवियों को न तो कोई उद्योग धंधें होते है और न ही बड़ी नौकरियां होती है उनके पास। सिर्फ एनजीओ से उनका धंधा चलता रहता है और महीने में दस-बीस दिन विदेश में गुजारते हैं। एनजीओ को नियंत्रित किये बिना राष्टद्रोही अभिव्यक्ति को नियंत्रित नहीं किया जा सकता है। एनजीओ को मिलने वाले विदेशी धन पर चाकचौबंद निगरानी जरूरी क्यों नहीं है?
              जयचंद की संस्कृति ने भारत को गुलाम बनाया था। जयंचदी संस्कृति के कारण ही आज भारत का स्वाभिमान कुचला जाता है। गुलाम नवी फई के इसारे पर नाचने वाले बुद्धीजीवी अब नायाब तर्क दे रहे हैं। इनका कहना यह है कि फई से संबंधित जानकारी उन्हें नहीं थी। फिर उनके पैसों पर अमेरिका गये क्यों? ऐसे जयंचदों पर जनता की धृणा और क्रोधता का डंडा चलना जरूरी है तभी इनके राष्टद्रोह जैसी प्रक्रिया बंद हो सकती है।

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